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गुरुवार, 16 सितंबर 2021

संप्रेषण बुनियादी व स्वाभाविक प्रवृत्ति

संप्रेषण हर प्राणी की बुनियादी व स्वाभाविक प्रकृति एवं जरूरत है। इसके जरिये हम जानकारियों, भावनाओं एवं अभिव्यक्तियों का आदान-प्रदान करते हैं। संप्रेषण में ध्वनियों, भाषा एवं चित्रों का काफी महत्व होता है। संप्रेषण मानव उत्पत्ति से चली आ रही एक अनवरत प्रक्रिया है, इसका स्वरूप व माध्यम जो भी हो। जन्म लेते ही बच्चा रोकर अपनी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। संचार शास्त्री डेनिस मैकवेल मानव संप्रेषण को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक अर्थ पूर्ण संदेशों के आदान-प्रदान के रूप में देखते हैं। इनका विचार है कि संचार ही मानव समाज की संचालन प्रक्रिया को सफल बनाता है। इसी मानवीय जिज्ञासु प्रवृत्ति ने पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का उद्भव किया है।

         पत्रकारिता में समय-समय पर परिवर्तनों का दौर आता रहा है। यही एक मात्र पेशा है जिसमें शामिल लोग अपने कार्य क्षेत्र को ही प्रयोगशाला मानकर नये-नये प्रयोग करते रहे हैं, और नई-नई प्रवृत्तियों को जन्म देते रहे हैं । बीसवीं सदी के अंतिम दशक में जब सूचना प्रौद्योगिकी अपने विकास के चरम पर पहुँची तो ऐसे ही प्रयोगों की संख्या अचानक बढ़ गयी। नतीजा यह हुआ कि इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ में ही एक साथ कई-कई नई प्रवृत्तियों ने जन्म ले लिया और अत्यंत प्रभावी ढंग से न केवल पत्रकारिता का रंग-ढंग बदला बल्कि सामाजिक व्यवस्था एवं लोगों के चाल-चलन में व्यापक बदलाव हुआ। इस दौर में पत्रकारिता के दोनों महत्त्वपूर्ण स्वरुप प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक अर्थात मुख्य धारा का मीडिया अपने-अपने खेमे में भी डरा सहमा नज़र आया। वर्तमान समय में प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रानिक मीडिया को ओल्ड मीडिया एवं नागरिक पत्रकारिता, सोशल मीडिया, इंटरनेट आधारित मीडिया, वेब पोर्टल आदि पत्रकारिता के वैकल्पिक स्वरुप को न्यू मीडिया के नाम से जाना जाता है। मोबाइल, डिजिटल कैमरा, लैपटाप व इंटरनेट इत्यादि का आज सूचना संकलन व संप्रेषण में अधिकाधिक योगदान हो रहा है। आज वैकल्पिक मीडिया के द्वारा लोग अपनी अभिव्यक्ति को अभिव्यक्त कर रहे हैं।

         भारतीय पत्रकारिता के इतिहास को देखें तो एक तरह से यह ठीक ही लगता है कि जीवंत समाज के अभिन्न अंग की तीव्र वैचारिकता के प्रतिफल का नाम ही पत्रकारिता है। प्रसिद्ध संचारविद मार्शल मैक्लुहान का कथन है कि संचार क्रांति के दौर में जब सम्पूर्ण विश्व एक गांव में तब्दील हो गया है। संचार के क्षेत्र में हर दिन कोई न कोई उपलब्धि हासिल की जाती है । ऐसे में मीडिया ने भी अपनी रंगत बदली है।आज पत्रकारिता के आयामों में बदलाव तो हुआ ही साथ ही उसके शस्त्र और औजारों में भी परिवर्तन हुआ है। दुनिया भर में इक्कीसवीं सदी में एक खास मीडिया का प्रादुर्भाव हुआ जिसे वैकल्पिक मीडिया के नाम से जाना जाता है।

         वैकल्पिक मीडिया से आशय ऐसी मीडिया (समाचार पत्र-पत्रिका, रेडियो, टीवी सिनेमा व इंटरनेट आदि) से है, जो मुख्यधारा की मीडिया के प्रतिपक्ष में वैकल्पिक जानकारी प्रदान करती है। वैकल्पिक मीडिया को मुख्यधारा की मीडिया से हटकर देखा जाता है। मुख्यधारा की मीडिया वाणिज्यिक, सार्वजनिक रूप से समर्थित या सरकार के स्वामित्व वाली है। वैकल्पिक मीडिया के अंतर्गत उन खबरों को प्रसारित किया जाता है, जिन्हें मुख्यधारा मीडिया की मीडिया में स्थान नहीं दिया जाता और वे जन सरोकारों से पूर्णतः जुड़ी होती हैं। प्राचीन काल में डुग्गी व मुनादी के माध्यम से खबरों का प्रसारण किया जाता था। विज्ञान व औद्योगिक विकास ने संचार का चेहरा बदल दिया है, जिसमें मुनादी, डुग्गी आज की शैली में पम्फ्लेट, पोस्टर व दीवार लेखन (भित्ति चित्र) में बदल गये हैं। आज जब भी हम मीडिया की बात करते हैं, त्यों ही हमारे जेहन में चौबीस घंटे वाचाल (पोपट) की तरह बोलने वाले तमाम समाचार चैनल, व्यवसायिक निहितार्थ वाले अखबार घूम जाते हैं, जो दिन भर एक्सक्लूसिव के नाम पर अपना राग अलापते रहते हैं। इस भागमभाग की स्थिति ने हमें तमाम समाचारों से वंचित कर दिया है। यही आज मुख्यधारा की मीडिया कहलाती है। मुख्यधारा की मीडिया आज सारे समाज पर छायी हई है, किन्तु नीतिगत मसलों पर इसमें गंभीर सामग्री का एक सिरे से अभाव है। नीतिगत मसलों को मेनस्ट्रीम मीडिया सतही रूप में पेश करता है, जबकि गैर-मुनाफे से चलने वाले मीडिया संगठनों के प्रकाशनों का नीतिगत मसलों पर गंभीर विश्लेषण मिलता है। 

स्वतंत्रता पूर्व वैकल्पिक मीडिया के रूप में साहित्यिक पत्रिका की गणना की जाती थी किन्तु आज इस दायरे में अन्य मीडिया भी आ गए हैं।  असल में विकल्प का अभिप्राय तुलनात्मक है। मीडिया में भी प्रवत्ति के विकल्प का निर्माण किया जा सकता है। जगदीश्वर चतुर्वेदी ने पुस्तक डिजिटल युग में मास और विज्ञापन में लिखा है कि समस्या विकल्प के निर्माण की नहीं है बल्कि समस्या यह है कि क्या वैकल्पिक मीडिया अपने पैरों पर खड़ा हो पायेगा ? वैकल्पिक मीडिया का वही रूप प्रभावी रहा जिसने असरदार तरीके से अपने को आत्मनिर्भर बनाया है अर्थात वैकल्पिक मीडिया के रूप का गठन प्रत्येक मीडिया में संभव है। प्रत्येक मीडिया अपने आप में विकल्प को समेटे है। कहने का तात्पर्य है कि वैकल्पिक मीडिया की धुरी है वैकल्पिक नजरिया, मीडिया इसमें गौण है। प्रत्येक दौर में वैकल्पिक मीडिया अपने तरीके से जन्म लेता आ रहा है।

         वैकल्पिक मीडिया को व्यापक रूप में फैलाने में मुख्यधारा के मीडिया की अहम भूमिका है। जब मुख्यधारा की मीडिया में जन सामान्य की बात को भुलाया जाने लगा और मसालेदार, औचित्यविहीन ख़बरें परोसी जाने लगी और साथ ही साथ जनता की अभिव्यक्ति को जन माध्यम में रोका जाने लगा। अखबारी खबरों पर संदेह किया जाने लगा, तब शनैः शनैः वैकल्पिक मीडिया का उत्थान इस सूचना युग में हुआ। यह वह संचार माध्यम का स्वरूप हो गया जो बार-बार मुख्यधारा की मीडिया के साथ खड़ा होने की कोशिश करता है।

         वैकल्पिक मीडिया हमारे विकास के साथ बढ़ा है। स्वतंत्रता के समय लोग पर्चे छापकर अपने विरोध को दर्ज करते थे। अपनी बात लोगों तक पहुँचाते थे। तब भी अखबार थे। लेकिन उसमें ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नहीं लिखा जा सकता था। आज वही मुख्यधारा के मीडिया से कट जाने वाली खबरें वैकल्पिक मीडिया के द्वारा अपनी अलग पहचान बना रही हैं। मुख्यधारा के टीवी चैनल और अखबार जैसे संचार माध्यमों की जगह अब सच्चे जन पक्ष का निर्माण करने में लघु पत्रिकाओं और सामुदायिक रेडियो बड़ी भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। किसी विशेष व्यवस्था परिवर्तन के उद्देश्य को लेकर अनेक पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित की जा रही हैं, जो एक बेहतर जनपक्ष के वैकल्पिक मीडिया के रूप में उभर रही  हैं।

         इंटरनेट के माध्यम से वेबसाइट, फेसबुक, ट्वीटर और सोशल नेटवर्किंग साइट्स तेजी से विकसित हो रही ह हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सामुदायिक रेडियो बड़ी तेजी से पुष्पित एवं पल्लवित हो रहा है। किसी विशेष समुदाय में विभिन्न प्रकार से लोगों को वैकल्पिक संचार माध्यमों द्वारा जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है। अफ्रीका, मिश्र व मध्य पूर्व देशों में तानाशाही और स्वयं भू व्यवस्थाओं के खिलाफ हुए विद्रोह, वैकल्पिक मीडिया की ही देन है। तमिल गीत “कोलावरी डी” की दुनिया भर में शोहरत के लिए भी वैकल्पिक मीडिया ही श्रेय का हकदार है। पंचायतों में जहाँ पहले महिलाएं प्रतिनिधि पर या पति आश्रित हुआ करती थीं। वहीं आज महिलाएं पंचायतों में साहस पूर्वक राजनीति कर रहीं हैं। बैनर, पोस्टर, होर्डिंग, दीवारों पर लिखे वक्तव्य, कैटलॉग, कार्टून, मेले में लगी प्रदर्शनी, सामुदायिक रेडियो आदि सभी कुछ वैकल्पिक मीडिया का अंग है। इंटरनेट और मोबाइल के विकास ने इसे द्रुत गति प्रदान किया है।

         वर्तमान में जब हम वैकल्पिक पत्रकारिता की बात करते हैं तो हमारे जेहन में गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रेमचन्द जैसे संपादक और विशाल भारत, विप्लव, हंस जैसी पत्रिकाएं आ जाती हैं । तब यह भले ही लगभग मुख्यधारा के अखबार व पत्रिकाएं थीं पर इनके सामाजिक सरोकार, इनकी प्रतिबद्धता और अभिव्यक्ति की आजादी वैकल्पिक पत्रकारिता सरीखी थी। धर्मयुग, हिन्दुस्तान साप्ताहिक, सारिका, दिनमान जैसी पत्रिकाएं बड़े प्रतिष्ठानों से निकलने के बावजूद एक बड़े वर्ग के पाठक तक पहुँच रखती थीं। उस समय इन सभी पत्रिकाओं का जोश व उत्साह चरम पर था। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के बुन्देलखंड से ग्रामीण महिलाओं द्वारा निकलने वाला समाचार पत्र खबर लहरिया एक पाक्षिक समाचार पत्र है, जो वहां की समस्याओं को प्रकाशित करता है।  यह अखबार वैकल्पिक पत्रकरिता के प्रतिमान प्रतिस्थापित करता है। इन सभी वैकल्पिक पत्रिकाओं ने समाज में एक नई सोंच व समझ विकसित की है एवं पुरानी रूढ़िवादी विचारधारा को परिवर्तित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। आज अधिकांश अनियतकालीन पत्रिकाएं तो सिर्फ इसलिए निकाली जाती हैं, ताकि जब विज्ञापनों का जुगाड़ हो जाये समाचार सामग्री के साथ अंक बाज़ार में चला जाय। वैकल्पिक मीडिया के माध्यम से आज ग्रामीण जनपक्ष की आवाज बुलंद हो रही है। लोग विभिन्न वैकल्पिक माध्यमों द्वारा अपनी अभिव्यक्ति को जाहिर कर रहे हैं । वैकल्पिक संचार के माध्यम से लोगों में सामाजिक व राजनैतिक स्तर पर जागरूकता का प्रादुर्भाव हो रहा है।


बुधवार, 8 जनवरी 2020

एजेंडा तय करने में सोशल मीडिया की उपादेयता


एजेंडा तय करने में सोशल मीडिया की उपादेयता

डॉ. रामशंकर विद्यार्थी
संपादक
दी एशियन थिंकर,
पीयर रिव्यूड बाइलिंगुअल रिसर्च जर्नल
सोशल मीडिया से आशय एक ऐसी मीडिया (सोशल नेटवर्किंग साईट, ब्लॉग, पोर्टल, मेल और एस.एम.एस. आदि) से है जिसे मुख्य धारा की मीडिया से हटकर देखा जाता है, सोशल मीडिया वैकल्पिक जानकारी प्रदान करती है। मुख्य धारा की मीडिया वाणिज्यिक, सार्वजानिक रूप से समर्थित व सरकार के स्वामित्व वाली होती है। जबकि सोशल मीडिया के अंतर्गत उन ख़बरों को भी प्रसारित किया जाता है जिसे मुख्य धारा की मीडिया में स्थान नहीं दिया जाता। सोशल मीडिया में प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता होती है। यह उस दिन और भी प्रभावशाली हो जायेगा जब यह देश के प्रत्येक नागरिक तक पहुँच जायेगा। परन्तु इस सोशल मीडिया के कंटेट समाज में जो प्रभाव छोड़ते है वह बहुत महत्वपूर्ण होता है। वर्तमान में सोशल मीडिया ने देश व दुनियाभर में चल रहे आन्दोलनों को नयी दिशा प्रदान की है पर वहीँ सोशल मीडिया के द्वारा आज नित नये मुद्दों (एजेंडा) का निर्माण भी किया जाता है। तो इसका आकलन करना उतना ही कठिन हो जाता है जितनी तीव्रता से यह किसी विषय को प्रचारित और प्रसारित करता है। इसी एजेंडा निर्माण की चर्चा वाल्टर लिपमैन ने 1922 में अपनी चर्चित पुस्तक‘पब्लिक ओपिनियन’ में एजेंडा सेटींग का बुनियादी चिंतन इस रूप में व्यक्त किया था। एजेंडा सेटिंग की अवधारणा के अंतर्गत मीडिया द्वारा मुद्दों का निर्माण किया जाता है मीडिया लोगों को सूचित करता है कि कौन सा मुद्दा महत्वपूर्ण व कौन सा गौण है। एजेंडा सेटिंग मूल रूप से मज़बूत मीडिया के प्रभाव का ही सिद्धांत है। प्रस्तुत शोध सोशल मीडिया फेसबुक और ट्विटर के विशेष सन्दर्भ में है। इस शोध में तथ्य संकलन के लिए प्राथमिक व द्वितीयक स्रोत का प्रयोग किया गया है। प्रथमिक स्रोत मे तथ्यों को संकलित करने के लिए प्रश्नावली व अनुसूची का प्रयोग किया गया है।
प्रसिद्व संचार विद् मार्शल मैक्लुहान कहते है कि संचार क्रान्ति के दौर में जब सम्पूर्ण विश्व एक गांव के रूप में तब्दील हो गया है और संचार के क्षेत्र में हर दिन कोई न कोई उपलब्धि हासिल की जा रही है ऐसे में मीडिया ने भी अपनी रंगत बदली है।’’आज प्रिंट मीडिया तथा इलेक्ट्रानिक मीडिया को ओल्ड मीडिया तथा वेब आधारित मीडिया जिसे हम वेब मीडिया के नाम से जानने लगे हैं। आज सम्प्रेषण के नए विचार मंच के रूप में उभरा है।
          सोशल मीडिया वास्तव में कई तरह की वेबसाइट का समूह है जहाँ हम अपने विचारों को प्रकट करते हैं सोशल मीडिया न्यू मीडिया का ही एक अंग है जहाँ अलग-अलग तरह की वेब साइट होती है। संचार का वह संवादात्मक (Interactive) स्वरूप है जिसमें इंटरनेट का उपयोग करते हुए हम पॉडकास्ट , आर एस एस फीड , सोशल नेटवर्क (फेसबुक, माई स्पेस और ट्विटर आदि), ब्लाग्स, विक्किस, टैक्सट मैसेजिंग इत्यादि का उपयोग करते हुए पारस्परिक संवाद स्थापित करते हैं। यहाँ एक व्यक्ति द्वारा तैयार किया एक तरह का समूह (नेटवर्क) है यह संवाद माध्यम बहु-संचार संवाद का रूप धारण कर लेता है जिसमें पाठक/दर्शक/श्रोता तुरंत अपनी टिप्पणी न केवल लेखक/प्रकाशक से साझा कर सकते हैं, बल्कि अन्य लोग भी प्रकाशित/प्रसारित/संचारित विषय-वस्तु पर अपनी टिप्पणी दे सकते हैं। यह टिप्पणियां एक से अधिक भी हो सकती है अर्थात बहुधा सशक्त टिप्पणियां परिचर्चा में परिवर्तित हो जाती हैं। उदाहरणत: फेसबूक पर यदि आप कोई संदेश प्रकाशित करते हैं और बहुत से लोग आपकी विषय-वस्तु पर टिप्पणी देते हैं तो कई बार पाठक-वर्ग परस्पर परिचर्चा आरम्भ कर देते हैं और लेखक एक से अधिक टिप्पणियों का उत्तर देता है।
सोशल मीडिया में द्विपक्षी संचार (Two way communication) होता है। इसी सोशल मीडिया का एक अंग है सोशल नेटवर्किंग साइट परंतु लोगों में यह भ्रांतियाँ हैं कि सोशल मीडिया ही सोशल नेटवर्किंग साइट होती है अर्थात सोशल मीडिया की सूची मे नेटवर्किंग साइट ही मात्र है, परंतु इसकी सूची मे अन्य वेब सेवाएँ भी मौजूद होती है। जैसे ब्लॉग, वेबलॉग, यूट्यूब आदि। जो अपको सारी दुनिया से जोड़ देती है और एक नई आभासी दुनिया की ओर ले जाती है। सोशल मीडिया जनता के बीच जितनी तीव्रता से प्रचलित हो रहा है संचार के अन्य माध्यम भी नहीं हुए। नेता, अभिनेता और राजनीतिक पार्टियां इसका इस्तेमाल बखूबी जानते हैं। राजनीतिक पार्टियां तो अपने नेताओं की लोकप्रियता का आंकलन भी सोशल मीडिया में उपस्थित फ़ालोवर की संख्या के अनुसार ही करते हैं। और इसका प्रभाव सोशल मीडिया से मुख्यधारा की मीडिया पर होता है। सोशल मीडिया पर होने वाली चर्चा मुख्यधारा की मीडिया का शीर्षक बनती है और यह समाज में मुख्य मुद्दों को गौण कर नित नए मुद्दों को प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त होती है।
एजेंडा सेटिंग की अवधारणा
एजेंडा सेटिंग सिद्धांत का विचार सर्वप्रथम अमेरिकी पत्रकार वाल्टर लिपमैन ने 1922 में अपनी चर्चित पुस्तक पब्लिक ओपिनियनमें दिया, जो इस प्रकार है- लोग वास्तविक जगत की घटनाओं पर नहीं, बल्कि उस मिथ्या छवि के आधार पर प्रतिक्रिया जाहिर करते है, जो हमारे मस्तिष्क में बनाई गई है। मीडिया हमारे मस्तिष्क में ऐसी छवि बनाने तथा एक मिथ्या- परिवेश निर्मित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।सन् 1944 में लेजर्स फेल्ड ने  भी पॉवर टू स्ट्रक्चर इश्यूजके आधार पर एजेंडा सेटिंग की अवधारणा प्रस्तुत की है।
मैक्सवेल ई. मैकाम्ब एवं डोनाल्ड एल.शा ने 1972 में किया। उन्होंने 1968 में अमेरिका में हुए राष्ट्रपति के चुनाव के सम्बन्ध में एक अध्ययन किया। इस अध्ययन में उन्होंने यह सिद्ध किया कि समाज में सभी मुद्दों का अलग-अलग महत्व होता है, किन्तु मुद्दों के महत्व का निर्धारण बहुमत द्वारा किया जाता है और मीडिया इस प्रक्रिया का एक सूत्र होता है। इसे ही एजेंडा सेटिंग कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार जन-माध्यम समाज के मुद्दों को प्रभावित करते है। यह एजेंडा सेटिंग के सिद्धांत को समझने का पहला सुव्यवस्थित अध्ययन था जो नॉर्थ कैरोलिना के चैपलहिल में मतदाताओं के बीच किया गया था। इसीलिए इसे चैपलहिल स्टडी के नाम से भी जाना जाता है। इस अध्ययन में सौ मतदाताओं से अमेरिका के प्रमुख मुद्दों एवं समस्याओं के बारे में जानकारी ली गई थी तथा इसके साथ ही पांच समाचार पत्रों, दो पत्रिकाओं और दो टेलीविजन नेटवर्क के समाचारों का अंतर्वस्तु विश्लेषण किया गया था। इसमें मीडिया एजेंडा तथा पब्लिक एजेंडा में जबरदस्त सह-संबंध पाया गया।  इनके लिखे दि एजेंडा सेटिंग फंक्शन ऑफ मास मीडिया’ (1972) और स्ट्रक्चरिंग दी अनसीन एनवायरनमेंट’ (1976) शीर्षक निबन्धों में इस सिद्धांत का विस्तृत विवेचना किया है ।
सोशल मीडिया और एजेंडा सेटिंग
इस अध्याय में मैंने अपने शोध विषय से संबन्धित तथ्यों को निकाला है। अपने शोध क्षेत्र की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए मैंने सिर्फ दो सोशल नेटवर्किंग साइट का अध्ययन किया है जो ज़्यादातर इस्तेमाल की जा रही है। जिसमें फेसबुक और ट्विटर की सामग्रियों का अध्ययन किया है। इस शोध के अंतर्गत समाज में मुद्दों का निर्माण करने में सोशल मीडिया की भूमिका का अध्ययन किया गया है। कभी-कभी सोशल मीडिया द्वारा उठाए गए मुद्दों को मुख्य धारा की मीडिया में प्रमुखता से उठाया जाता है। देखते ही देखते यह एक राष्ट्रीय मुद्दे का रूप ले लेता है, जो समाज  को एक नई दिशा देने में सहायक सिद्ध होता है। इस शोध में यह भी जानने का प्रयास किया गया है कि किस तरह से सोशल मीडिया द्वारा समाज में छद्म वातावरण तैयार किया जाता है और आम लोगों को भ्रमित भी किया जाता है। यहाँ हर व्यक्ति पत्रकार की भूमिका निभा रहा है जिसके पास स्वतंत्र कलम है और सबके अपने विचार हैं।भारत में हो रहे महिलाओं के ऊपर अत्याचार, बलात्कार, सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार, घूसखोरी, लाल-फीताशाही, सरकारी योजनायें और जमीनी हकीकत को आम जनता के बीच लाने के लिएलोग सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं।
शोध में प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार वर्ष 2012 में भारत में राजनीतिक एवं आर्थिक चुनौतियों के बीच लोगों ने सोशल मीडिया की बढ़त और परिपक्वता को नज़दीक से महसूस किया। जब मुख्य धारा की व्यावसायिक मीडिया तथा अन्य आयामों से लोग निराश हो जाते हैं तो सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं। इस वर्चुअल मीडिया के विश्वव्यापी प्रभावों के कारण हमें अपने प्रयासों में सफलता भी मिलती है।सोशल मीडिया बीते कुछ वर्षों में सामाजिक, राजनीतिक एवं अन्य प्रमुख विषयों पर मुद्दे का निर्माण करने के माध्यम के रूप में उभरा है। तहरीर चैक, न्यूयार्क के वाल स्ट्रीट घेरो आंदोलन से लेकर दिल्ली के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों एवं दामिनी गैंगरेप के खिलाफ आंदोलनों को स्फूर्त करने में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह सोशल मीडिया युवाओं के लिए क्रांति का हथियार बना है।
एन. के. सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार ईटीवी, साधना न्‍यूज समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रह चुके हैं। हिंदुस्तान में “सोशल मीडिया के जरिए खड़े आंदोलन क्‍या वास्‍तव में जन आंदोलन है”शीर्षक से प्रकाशित लेख में लिखते हैं कि “टेलीकास्ट लाइसेंस या अखबार का रजिस्ट्रेशन व्यक्ति के नाम होता है औरवह देश के तमाम कानूनों से बंधा होता है। जो कुछ भी कहा, लिखा या दिखाया जा रहा है, उसकी पूरी-पूरी जिम्मेदारी संपादक पर होती है। सोशल मीडिया पर इस तरह की कोई जिम्मेदारी नहीं होती। वह न तो मूर्त होता है, और न ही उस पर अंकुश लगाए जा सकते हैं। ऐसा नहीं है कि दिल्ली में बलात्कार की घटना को पूरी तरह सोशल मीडिया ने ही उठाया। पहले इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया ने अपनी सार्थकता और प्रतिबद्धता दिखाते हुए इसे दो दिनों तक जबर्दस्त रूप से छापा और दिखाया। तब जाकर सोशल मीडिया के जरिये इस पर प्रतिक्रियाएं आने लगीं। लेकिन जिस तरह सोशल मीडिया के जरिये एक इतना बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ उससे अब और ज्यादा सतर्क होने की जरूरत महसूस होने लगी है।” अपने दूसरे लेख में एन. के. सिंह लिखते हैं “यह भी सही है कि मिस्र हीं नहीं समूचे अरब में फैले जनांदोलन के पीछे सोशलमीडिया की अहम् भूमिका रही। यही नहीं भारत में पहली बार बलात्कार को लेकरउपजे युवा आन्दोलन में भी इस मीडिया की भूमिका जबरदस्त थी। लेकिन आज ज़रुरतइस बात को तौलने की है कि क्या बगैर स्थापित मीडिया के हम तर्क सम्मत औरसभी तथ्यों और उनके परिणामों को समझे बिना जनमत बनाना खतरे से खाली नहींहोगा? और क्या महज एक ऐसे मीडिया के जरिये जिसका मूल हीं अमूर्त हो याजिसमे किरदार की पहचान न हो सके । हमें  राजपथ घेरने पहुँचना चाहिए?”सोशल मीडिया को जिस तरह से दरकिनार कर इन्होंने उसके खुलेपन के खतरे से भी सतर्कता की बात की है, साथ ही इस बात से भी इंकार नहीं किया है कि सोशल मीडिया का आंदोलन कोई योगदान नहीं था।
            अनिल चमड़िया अपने लेख “सोशल मीडिया का भ्रम” में लिखते हैं कि“व्यापक समाज सुधार का काम सोशल मीडिया के जरिये नहीं किया जा सकता है।” पत्रकारिता के दिग्गज आज भी सोशल मीडिया के प्रभाव को लेकर अभी तक साफ नहीं हुए हैं। भड़ास 4 मीडिया के संपादक यशवंत सिंह का कहना है कि भड़ास4मीडिया शुरू करने का उद्देश्य मीडिया को बीट मानकर उसके अंदर के स्याह सफेद को उदघाटित करना है। यही एक ऐसा माध्यम है, जहां मुख्यधारा की मीडिया पर्दे से बेपर्दा होती है। रवीश कुमार जहां सोशल मीडिया को मुख्य धारा की मीडिया से ज्यादा आगे मानते हैं तो वहीं एन. के. सिंह और अनिल चमड़िया इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। मीडिया का वैकल्पिक माध्यम एक नया इतिहास लिखे जा रहा है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि मुख्यधारा की मीडिया को अब इसका डर होने लगा है कि उसका सिंहासन कोई और न छीन ले।
            सोशल मीडिया ने जहां भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ लोगों की सोच को एक आम सोच बनाया वहीं दूसरी ओर इस तकनीक का फायदा उठाते हुए कुछ अराजक लोगों ने भड़काऊ कंटेंट और तस्वीरें डालकर देश की अखंडता पर ही चोट करने की कोशिश की। आजकल सोशल मीडिया एक ऐसे सूखे जंगल की तरह हो चुकी है जिसमें थोड़ी चिंगारी लगने की देर है आग अपने आप पूरे जंगल में फैल जाएगी। असम में दो समुदायों के बीच झड़पों की घटनाओं की गूंज इन्हीं सोशल मीडिया वेबसाइटों पर भी दिखाई दी जिसकी लपट आगे चलकर मुंबई, बंगलुरू, चेन्नई और हैदराबाद में भी दिखी। जिस तरह से बहुत बड़ी मात्रा में आपत्तिजनक तस्वीरें और कंटेंट सोशल मीडिया पर जारी किए गए उससे तो इसके अस्तिव पर ही सवाल खड़े हो चुके हैं।
संदर्भ सूची
1.      MarshallMcLuhan,Understanding MediaThe extensions of man, Part-I, Chapter-1.
2.      Wankel, Charles, Educating Educators with Social Media, Emerald Group Limited, Howard House, Wangon Lane, Bingley, UK.
3.      Simon, Lee, Social Media Dangers, 2011, Xlibric Corporation.
4.      Bozarth, Jane, Social Media for Trainers : Techniques for Enhancing and Extending Learning, An Imprint of Wiley, San Francisco, CA.
5.      Walter Lippman, Public Opinion, http://books.google.co.in/books
6.      Hana, S. Noor Al-Deen, John Allen Hendricks, Social Media Usage and Impact, Lexington Books, Lanham, Maryland-20706..
इंटरनेट वेबसाइट एवं यू. आर. एल. -
(यह लिंक 2 जनवरी 2013 को देखी गई)
9.      इंटरनेट वर्ल्ड डाटा रिपोर्ट, 2012,अध्याय- 2.
            (यह सभी लिंक दिसंबर 2012 से जनवरी 2013 के बीच देखे गए )


रविवार, 18 अक्टूबर 2015

नारी सशक्तीकरण और वैकल्पिक मीडिया




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(ICSSR M‚DVksjy fjlpZ Qsyks] egkRek xka/kh varjjk"Vªh; fganh fo'ofo|ky;] o/kkZ] bZesy&ramshankarpal108@gmail.com)

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

हिंदी को समृद्ध करती वैकल्पिक पत्रकारिता

fganh dks le`) djrh oSdfYid i=dkfjrk
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¼ys[kd egkRek xkaèkh varjjk"Vªh; fganh foÜofo|ky;
esa tulapkj fo"k; esa ih,p-Mh- 'kksèkkFkÊ ,oa ICSSR M‚DVksjy fjlpZ Q+syks gSaA
bZesy&ramshankarpal108@gmail-com½

  

        fganh esa oSdfYid i=dkfjrk dk ç'u jk"VªHkk"kk vkSj [kM+h cksyh ds fodkl ls Hkh lacafèkr jgk gSA fganh Hkk"kk fodkl dh iwjh çfØ;k esa fganh i=dkfjrk ds Hkk"kk fo'ys"k.k ds ekè;e ls le>h tk ldrh gSA bl fodkl esa Hkk"kk ds çfr tkx:d oSdfYid i=dkjksa dk viuk viuk ;ksxnku fganh dks feyrk jgk gSA ;s i=dkj fganh Hkk"kh Hkh Fks vkSj blds vykok vU; Hkk"kh Hkh FksA buesa ls dbZ fganh cksyh {ks=ksa ds Fks] dqN igys lkfgR;dkj Fks] ckn esa i=dkj cus] rks dqN us i=dkfjrk ls 'kq: djds lkfgR; txr esa viuk LFkku cuk;kA bu lHkh us vf[ky Hkkjrh; Lrj ij cksyh vkSj le>h tkus okyh Hkk"kk fganh ds fy, viuk iwjk thou lefiZr fd;kA buds fy, fganh vkSj jk"Vªh;rk ,d nwljs ds i;kZ; FksA ;s i=dkj fHkUu&fHkUu Hkk"kk ifjos'kksa ds gksus ds ckotwn budh 'kSyh oSfoè; viuh pje voLFkk esa fn[kkbZ nsrk gSA
       orZeku esa tc ge oSdfYid i=dkfjrk dh ckr djrs gS] rks gekjs tsgu esa x.ks'k 'kadj fo|kFkÊ] çsepan tSls laiknd vkSj fo'kky Hkkjr] foIyo] gal tSlh if=dk,a vk tkrh gSa A rc ;g Hkys gh yxHkx eq[;èkkjk ds v[kckj o if=dk,a Fkh ij buds lkekftd ljksdkj] budh çfrc)rk vkSj vfHkO;fä dh vktknh oSdfYid i=dkfjrk ljh[kh FkhA èkeZ;qx] fganqLrku lkIrkfgd] lkfjdk] fnueku tSlh if=dk,a cM+s çfr"Bkuksa ls fudyus ds ckotwn ,d cM+s oxZ ds ikBd rd igq¡p j[krh Fkh A ml le; bu  lHkh if=dkvksa dk tks'k o mRlkg pje ij FkkA orZeku esa mÙkj çns'k ds cqUnsy[kaM ls xzkeh.k efgykvksa }kjk fudyus okyk lekpkji= ^[kcj ygfj;k* ,d ikf{kd lekpkj i= gS] tks ogka dh leL;kvksa dks çdkf'kr djrk gSA ;g v[kckj oSdfYid i=dfjrk ds çfreku çfrLFkkfir djrk gSA bu lHkh oSdfYid if=dkvksa us lekt esa ,d ubZ lksp o le> fodflr dh gS ,oa iqjkuh :f<+oknh fopkjèkkjk dks ifjofrZr djus esa egRoiw.kZ Hkwfedk vnk dh gSA vkt vfèkdka'k vfu;rdkyhu if=dk,a rks flQZ blfy, fudkyh tkrh gSa] rkfd tc foKkiuksa dk tqxkM+ gks tk;s lekpkj lkexzh ds lkFk vad ckt+kj esa pyk tk;A oSdfYid ehfM;k ds ekè;e ls vkt xzkeh.k tui{k dh vkokt cqyan gks jgh gSA
       oSdfYid i=dkfjrk dks ge fe'kujh i=dkfjrk Hkh dg ldrs gS] tks fdlh ,d [kkl oxZ ds fy, u gksdj ,d lkekU; oxZ ds fparu ij foe'kZ djrh FkhA oSdfYid i=dkfjrk dk ;g lkSHkkX; jgk fd le; vkSj lekt ds çfr tkx:d vketu ls tqM+s i=dkjksa us fuf'pr y{; ds fy, blls vius dks tksM+kA oSdfYid i=dkfjrk dks ysdj vkt xgu foe'kZ fd, tk jgs gSaA oSdfYid i=dkfjrk ds y{; Fks jk"Vªh;rk] lkaL—frd mRFkku vkSj yksdtkxj.k ds fy, tuekul esa çsj.kk dk ,d l'kä LojA fganh ds fodklØe esa dqN oSdfYid i=dkj çdk'kLraHk cus] ftUgksaus vius le; esa Hkh viuh mifLFkfr ntZ djk;h vkSj vusd ÅtkZoku uo i=dkjksa  dks fe'kujh ¼y{;osèkh½ i=dkfjrk ds fy, rS;kj fd;kA okLro esa og iwjk 'kq:vkrh le; fganh i=dkfjrk dk Lo.kZ;qx dgk tk ldrk gSA fganh ds xkSjo dks LFkkfir djus] fganh lkfgR; dks cgqeq[kh cukus] Hkkjrh; Hkk"kkvksa dh jpukvksa dks fganh esa ykus] fganh Hkk"kk vkSj nsoukxjh fyfi ds egRo ij fVIi.kh djus rFkk bu lcds lkFk lkekftd mRFkku dk fujarj ç;Ru djus esa ;s lHkh i=dkj vius vius le; esa vxz.kh jgsA
     fganh çnhi* ds laiknd cky—".k Hkê dsoy i=dkj gh ugha] ,d egku lkfgR;dkj Hkh FksA fofHkUu foèkkvksa esa mUgksaus jpuk,¡ dha ftUgsa  i<+us ij ;g irk pyrk gS fd Hkê th dh 'kSyh esa fdruk vkst vkSj çHkko FkkA ljy vkSj eqgkojsnkj fganh fy[kuk mUgha ls vkxs vius okys i=dkjksa us lh[kkA ,d rks mUgksaus fuHkÊd i=dkfjrk dks tUe fn;k] nwljs xaHkhj ys[ku esa Hkh lgtrk cuk, j[kus dh 'kSyh fufeZr dh] rhljs fganh lkfgR; dh leh{kk dks mUgksaus ç'kLr fd;k vkSj pkSFks fganh i=dkfjrk ij fczfV'k lkezkT; ds fdlh Hkh çdkj ds vR;kpkj dk mUgksaus [kqydj fojksèk fd;kA
       Hkkjrsanq gfj'paæ dh dfoopu lqèkk] gfj'paæ eSxthu] gfj'paæ pafædk] ckykcksfèkuh fganh oSdfYid i=dkfjrk ds gh ugha] vkèkqfud fganh dh egRoiw.kZZ i= if=dk,¡ ekuh tkrh gSaA Hkkjrsanq us vius i=ksa vkSj ukVdksa ds }kjk vkèkqfud fganh x| dks bl rjg fodflr djus dk ç;Ru fd;k fd og tulkèkkj.k rd igq¡p ldsA laL—r vkSj mnZw  nksuksa dh vfrokfnrk ls fganh dks cpkrs gq, mUgksaus cksypky dh fganh dks gh lkfgfR;drk çnku djds ,slh 'kSyh 'kq: dh tks okLro esa fganh dh dsaæh; 'kSyh Fkh vkSj ftls ckn esa egkRek xkaèkh vkSj çsepan us *fganqLrkuh* dgdj vf[ky Hkkjrh; O;ogkj dh ekU;rk çnku dhA Hkkjrsanq ds fy, LoHkk"kk dh mUufr gh lHkh çdkj dh mUufr;ksa dk ewykèkkj FkhA *ckykcksfèkuh* efgykvksa ij dsafær fganh dh igyh oSdfYid if=dk gS] ftlesa efgykvksa us fy[kk vkSj Hkkjrsanq dh çsj.kk ls vusd efgyk,¡ fganh i=dkfjrk ds {ks= esa vk;hA Kku foKku dh fn'kk esa fganh i=dkfjrk dks le`) djus dk dk;Z Hkh Hkkjrsanq us gh igyh ckj fd;kA bfrgkl] foKku vkSj lektksi;ksxh lkef;d fo"k;ksa ij mudh if=dkvksa esa mR—"V lkexz Nirh FkhA vkt ds le; ds yksx Hkys gh bu if=dkvksa dks ml le; dh eq[;èkkjk dh if=dk ekurk gks] ysfdu eq[; :i ls ;s if=dk,¡ viuh ,d lekt ds dqN mís';ksa dks ysdj gh pyk;h tk jgh FkhA 
       czkã.k ds laiknd çrki ukjk;.k feJ  vkèkqfud fganh ds lpsru i=dkj ekus tk ldrs gSaA mUgksaus fganh x| vkSj i| nksuksa dks u;k :i ,oa laLdkj fn;kA buds le; rd çpfyr fganh ;k rks vjch&Qkjlh fefJr Fkh] ;k laL—rfu"B] vFkok mlesa Hkkjrsanq dh rjg cksfy;ksa dk vlarqfyr feJ.k FkkA feJ th us Bksl fganh x| dks tUe fn;kA ns'kt] mnZw vkSj laL—r dk ftruk lqanj fefJr ç;ksx feJ th esa feyrk gS] oSlk vU;= nqyZHk gSA os fganh dh ç—fr dks ,d fof'k"V 'kSyh esa <kyus okys igys i=dkj FksA
       egkeuk enueksgu ekyoh; ds i=] fganksLFkku] vH;qn;] e;kZnk dk fganh ds çfr –f"Vdks.k cM+k gh –<+ FkkA os fganh ds dêj leFkZd FksA vf[ky Hkkjrh; fganh lkfgR; lEesyu dh LFkkiuk mUgksaus vius blh fganh çse ds dkj.k dh FkhA os le;&le; ij vusd i=ksa ls lac) gq,A fganh ds çfr mudk –f"Vdks.k cgqr lkQ Fkk fd fganh Hkk"kk vkSj ukxjh v{kj ds }kjk gh jk"Vªh; ,drk fl) gks ldrh gSA ukxjh çpkfj.kh lHkk] dk'kh fganw foÜofo|ky; vkSj fganh çdk'ku eaMy dh LFkkiuk djds mUgksaus ;g fl) dj fn;k fd fganh Hkk"kk vkSj Hkkjrh; laL—fr ds mRFkku dk jkLrk gh Hkkjr ds mRFkku dk ,d ek= jkLrk gSA ekyoh; th ok.kh ds èkuh Fks] ftruk çHkko'kkyh cksyrs Fks] mruk gh çHkko'kkyh fy[krs FksA fganh Hkk"kk dk vkst mudh i=dkfjrk ls çdkf'kr gksrk gSA
       fganh vkSj mnZw] nksuksa Hkk"kkvksa dh i=dkfjrk dks çfrf"Br djus okys ckcw ckyeqdqan xqIr us v[kckjs&pqukj] fganh caxoklh] Hkkjrfe= esa i=dkfjrk dks lkfgR; fuekZ.k vkSj Hkk"kk fparu dk Hkh ekè;e cuk;kA  vkpk;Z egkohj çlkn f}osnh ¼ljLorh½ fganh i=dkfjrk ds ,d lEekfur iq#"k gSaA fganh ds çfr mudh èkkj.kk –<+ FkhA os mls lqxfBr] lqO;ofLFkr vkSj loZekU; Lo:i çnku djuk pkgrs FksA *ljLorh* ds ekè;e ls fganh dks ubZ xfr vkSj 'kfä nsus dk tks dk;Z fd;k] mldk dksbZ fodYi ugha gSA viuh –<+rk ds pyrs gh mUgksaus vusd i=dkjksa vkSj lkfgR;dkjksa dks [kM+hcksyh fganh esa fy[kus ds fy, çsfjr fd;k vkSj *ljLorh* esa Nkidj mUgsa LFkkfir fd;kA f}osnh th us fganh Hkk"kk ds ifj"dkj dk vFkd ç;Ru fd;k vkSj fganh esa ys[kdksa dh ,d tekr rS;kj dj fn;kA mudk ekuuk Fkk fd fgUnh ds x| vkSj i| dks vyx dj ns[kuk mfpr ugha gSA
       NÙkhlx< fe= vkSj deZohj lkekftd ifjorZu gsrq viuk fganh oSdfYid i= fudky dj ekèko jko lçs us fganh ds çfr jk"Vªh;rk fd tks Nki NksM+h gS fuf'pr rkSj ij ge dg ldrs gS fd og fganh ds leiZ.k ls gh laHko gSA  mudk dguk Fkk] *eSa egkjk"Vªh; gw¡] ijarq fganh ds fo"k; esa eq>s mruk gh vfHkeku gS ftruk fdlh Hkh fganh Hkk"kh dks gks ldrk gSA eSa pkgrk gw¡ fd bl jk"VªHkk"kk ds lkeus Hkkjro"kZ dk çR;sd O;fä bl ckr dks Hkwy tk, fd eSa egkjk"Vªh; gw¡] caxkyh gw¡] xqtjkrh gw¡ ;k enjklh gw¡A*
       fganh ds 'kh"kZLFk dFkkdkj çsepan dk ,d çsjd Lo:i muds tkx:d i=dkj ds :i esa Hkh gS A *ekèkqjh*] *tkxj.k* vkSj *gal* dk laiknu djds mUgksaus viuh bl çfrHkk dk Hkh mR—"V mnkgj.k is'k fd;k vkSj fganqLrkuh 'kSyh dks loZxzká rFkk yksdfç; cukus dk egRo dk;Z fd;kA
       deZohj] çHkk vkSj çrki esa ek[kuyky prqoZsnh us lkfgR;] lekt vkSj jktuhfr] rhuksa dks viuh i=dkfjrk esa lesVdj lEiknu fd;kA mudh lkfgR; lkèkuk Hkh vn~Hkqr FkhA muds Hkk"k.k vkSj ys[ku esa bruh èkkj Fkh fd os lekt ls tqM+s eqíksa dks ,d dq'ky rjhds ls vius ys[ku esa lesr ysrs FksA mudk ;g Lo:i Hkh muds i=ksa ds fy, ojnku lkfcr gqvkA mudk ys[ku fganh Hkk"kk ds çkaty ç;ksx dk mnkgj.k gSA mudk ;g dguk Fkk fd *,slk fy[kks ftlesa vugksukiu gks] ,slk cksyks ftl ij nqgjkgV ds nkx u iM+s gks*A x.ks'k 'kadj fo|kFkÊ  us vH;qn; vkSj çrki esa fganh i=dkfjrk esa cfynku vkSj vkpj.k dk vej lans'k çlkfjr fd;k vkSj fganh Hkk"kk dks vkstLoh ys[ku dk eqgkojk çnku fd;kA
       Lokra«;ksÙkj fganh i=dkfjrk esa vKs; us çrhd] u;k çrhd] fnueku]vkSj uoHkkjr VkbEl dks lkfgfR;d i=dkfjrk dks uohu fn'kkvksa dh vksj eksM+kA *'kCn* ds çfr os lpsr Fks blfy, Hkk"kk vkSj dkO; Hkk"kk ij *çrhd* esa laikndh;] ys[k] ppk,¡] ifjppkZ,a çdkf'kr gksrh jgrh FkhaA vKs; us *fnueku* ds ekè;e ls jktuSfrd leh{kk vkSj lekpkj foospu dh 'kSyh fganh esa fodflr dhA mUgksaus *uoHkkjr VkbEl* ds lkfgfR;d& lkaL—frd ifjf'k"V dks Å¡pkbZ çnku dh ftlls fd nSfud i= dk ikBd Hkh buds egRo dks le>us yxkA
       fnueku] çrki] gfj'paæ eSxthu] gfj'paæ pafædk] ckykcksfèkuh ]ljLorh vkfn cgqr ls v[kckj o if=dk,¡ ml nkSjku eq[;èkkjk dh Hkwfedk esa Fkh ijarq dgha u dgha eq[;èkkjk ds fodYi ds :i esa lekt esa fgUnh dks l'kä cukus esa egkoiw.kZ Hkwfedk dk fuoZgu dj jgh FkhA ;s v[kckj o if=dk,¡ fganh oSdfYid i=dkfjrk ds gh ugha] vkèkqfud fganh dh egRoiw.kZ i= if=dk,¡ ekuh tkrh  jgh gSaA NBs n'kd ls fganh esa fofHkUu u,&u, {ks=ksa dh i=dkfjrk dk mHkkj fn[kkbZ nsus yxrk gSA blds fy, fganh dks ubZ 'kCnkoyh vkSj vfHkO;fä;ksa dh vko';drk iM+hA okLro esa fdlh Hkh Hkk"kk ls ckátxr dh ladYiukvksa dks viuh Hkk"kk esa ys vkuk vkSj fQj mUgsa LFkkfir dj yksdfç; cukuk vklku dke ugha gS ysfdu i=dkfjrk ges'kk ls bl dfBu dk;Z dks viuh iwjh n{krk vkSj nwj–f"V ls lkèkrh jgh gSA
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       la{ksi esa dgk tk, rks  oSdfYid fganh i=dkfjrk us le; ds lkFk pyrs gq, vkSj uohurk ds vkxzg dks viukrs gq, lkekftd vko';drk ds rgr fganh Hkk"kk fodkl dk dk;Z vR;ar rRijrk] oSKkfudrk vkSj nwj–f"V ls fd;k gSA lgt laçs"k.kh; Hkk"kk esa ubZ ladYiukvksa dks O;ä djus ds fy, Hkk"kk&fuekZ.k ;k dgsa ç;qfä&fodkl dk tSlk vkn'kZ fcuk fdlh ljdkjh lg;ksx ;k ncko ds fganh i=dkfjrk us cukdj fn[kk;k gS] mls Hkk"kkfodkl vFkok Hkk"kkfu;kstu esa lkexzh fu;kstu ¼d‚iZl MsoysiesaV½ dh vkn'kZ fLFkfr dgk tk ldrk gSA fu"d"kZ ds :i esa ;g dguk mfpr gh gksxk dh le;karj tSlh oSdfYid if=dk,¡ fganh dh 'kksèkijd Hkwfedk vnk dj jgh gS A

lanHkZ ,oa xzaFk lwph&
1-     jkexksiky] ^Lora=rk&iwoZ fgUnh ds la?k"kZ dk bfrgkl* ¼1964½] fgUnh lkfgR; lEesyu] ç;kx
2-     oekZ]y{eh dkUr ^fgUnh vkanksyu* ¼1964½] fgUnh lkfgR; lEesyu] ç;kx
3-     prqoZsnh] txnhÜoj ,oa flag] lqèkk ^fMftVy ;qx esa ekldYpj  vkSj foKkiu*] vukfedk ifCy'klZ ,aM fMLVªhC;wVlZ çk-¼fy-½ nfj;kxat ubZ fnYyh
4-     prqoZsnh] txnhÜoj ,oa flag ^oSdfYid ehfM;k yksdra= vkSj u‚e pkseLdh* ¼2008½ vukfedk ifCy'klZ ,aM fMLVªhC;wVlZ çk-¼fy-½ nfj;kxat ubZ fnYyh
5-     dkSlY;k;u] Hknar vkuan¼la-½ ^jk"VªHkk"kk dh leL;k,¡* fgUnh lkfgR; lEesyu] ç;kx
6-     okpLifr]vfouk'k ,oa çHkkr]johæ ¼la-½ ^fganh Cy‚fxax vfHkO;fä ubZ Økafr* ¼2011½fganh lkfgR; fudsru fctukSj

8-     pksiM+k èkuat;] i=dkfjrk rc ls vc rd] ¼2007½  mÙkj çns'k fganh laLFkku] y[kuÅ