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रविवार, 11 अक्टूबर 2026

पर्यावरण अध्ययन (Environmental Studies) UNIT–II: पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) : सरल नोट्स विद्यार्थियों के लिए

 

पर्यावरण अध्ययन (Environmental Studies)

UNIT–II: पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem)

सरल हिंदी में विस्तृत अध्ययन सामग्री                           Dr. Ramshankar Vidyarthi

1. पारिस्थितिकी तंत्र का अर्थ एवं परिभाषा (Concept of Ecosystem)

हमारे आसपास प्रकृति में अनेक प्रकार के जीव-जंतु, पेड़-पौधे, पक्षी, कीड़े-मकोड़े और सूक्ष्म जीव पाए जाते हैं। इनके साथ-साथ हवा, पानी, मिट्टी, सूर्य का प्रकाश और तापमान जैसे निर्जीव तत्व भी मौजूद होते हैं। ये सभी एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं और एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। इन सभी के आपसी संबंधों से एक प्राकृतिक व्यवस्था बनती है, जिसे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) कहा जाता है।

उदाहरण के लिए, एक तालाब में मछलियाँ, मेंढक, जलीय पौधे, शैवाल, पानी, मिट्टी और सूर्य का प्रकाश होता है। तालाब के पौधे सूर्य के प्रकाश की सहायता से भोजन बनाते हैं। छोटे जीव पौधों या अन्य जीवों को खाते हैं और बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को खा सकती हैं। इस प्रकार तालाब के सभी घटक आपस में जुड़े रहते हैं।

सरल परिभाषा: वह प्राकृतिक व्यवस्था जिसमें जीवित प्राणी एक-दूसरे के साथ तथा अपने निर्जीव वातावरण के साथ क्रिया करते हैं, पारिस्थितिकी तंत्र कहलाती है।

पारिस्थितिकी तंत्र के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं:

  • वन पारिस्थितिकी तंत्र।
  • घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र।
  • मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र।
  • तालाब और झील का पारिस्थितिकी तंत्र।Vectores de Abiotico, imágenes vectoriales | DepositPhotos
  • नदी का पारिस्थितिकी तंत्र।
  • समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र।

पारिस्थितिकी तंत्र का आकार छोटा या बड़ा हो सकता है। एक छोटा तालाब भी पारिस्थितिकी तंत्र है और एक विशाल वन भी। इसकी मुख्य विशेषता जीवित तथा निर्जीव घटकों के बीच आपसी संबंध है।

2. पारिस्थितिकी तंत्र के घटक (Components of Ecosystem)

पारिस्थितिकी तंत्र के मुख्य रूप से दो घटक होते हैं:

  1. अजैविक घटक (Abiotic Components)
  2. जैविक घटक (Biotic Components)

2.1 अजैविक घटक (Abiotic Components)

अजैविक घटक वे हैं जिनमें जीवन नहीं होता, लेकिन जीवों के जीवन के लिए वे आवश्यक होते हैं।

इनमें सूर्य का प्रकाश, हवा, पानी, मिट्टी, तापमान, नमी, खनिज और पोषक तत्त्व शामिल हैं।

2.2 जैविक घटक (Biotic Components)

जैविक घटक वे हैं जिनमें जीवन होता है।

इनमें पौधे, पशु-पक्षी, मनुष्य, कीड़े-मकोड़े, बैक्टीरिया और कवक शामिल हैं। जैविक घटकों को मुख्य रूप से उत्पादक, उपभोक्ता और अपघटक में बाँटा जाता है।

अजैविक घटकों का महत्त्व

सूर्य का प्रकाश: अधिकांश पारिस्थितिकी तंत्रों में ऊर्जा का मुख्य स्रोत सूर्य है। हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की मदद से प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं।

जल: पानी के बिना पौधों, पशुओं और मनुष्यों का जीवन संभव नहीं है। यह पौधों की वृद्धि, पोषक तत्त्वों के परिवहन और जीवों की अनेक शारीरिक क्रियाओं के लिए आवश्यक है।

वायु: वायु में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड पौधों को भोजन बनाने में सहायता करती है। अनेक जीव श्वसन के लिए ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं।

मिट्टी: मिट्टी पौधों को सहारा, पानी और पोषक तत्त्व प्रदान करती है। अनेक छोटे जीव भी मिट्टी में रहते हैं।

तापमान: तापमान जीवों की वृद्धि, प्रजनन और उनके रहने के स्थान को प्रभावित करता है।

जैविक घटकों का महत्त्व

जैविक घटक पारिस्थितिकी तंत्र में अलग-अलग भूमिकाएँ निभाते हैं। पौधे भोजन बनाते हैं, शाकाहारी जीव पौधों को खाते हैं, मांसाहारी जीव दूसरे जीवों पर निर्भर रहते हैं और अपघटक मृत पदार्थों को तोड़कर पोषक तत्त्वों को पर्यावरण में वापस पहुँचाते हैं।

इस प्रकार जैविक और अजैविक घटक मिलकर पारिस्थितिकी तंत्र को कार्यशील बनाए रखते हैं।

3. उत्पादक, उपभोक्ता और अपघटक

3.1 उत्पादक (Producers)

उत्पादक वे जीव हैं जो अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। हरे पौधे सूर्य के प्रकाश, पानी और कार्बन डाइऑक्साइड की सहायता से प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन तैयार करते हैं। शैवाल और पादप प्लवक (Phytoplankton) भी उत्पादकों के उदाहरण हैं।

उत्पादकों को पारिस्थितिकी तंत्र का आधार माना जाता है, क्योंकि अनेक अन्य जीव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनसे प्राप्त भोजन पर निर्भर रहते हैं।

उदाहरण: घास, पेड़-पौधे और शैवाल।

3.2 उपभोक्ता (Consumers)

उपभोक्ता वे जीव हैं जो अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते और भोजन के लिए दूसरे जीवों पर निर्भर रहते हैं।

उपभोक्ता कई प्रकार के होते हैं।

प्राथमिक उपभोक्ता: ये सीधे पौधों या उत्पादकों को खाते हैं। उदाहरण: हिरण, गाय, खरगोश और टिड्डा।

द्वितीयक उपभोक्ता: ये प्राथमिक उपभोक्ताओं को खाते हैं। उदाहरण के लिए, कोई मेंढक टिड्डे को खा सकता है।

तृतीयक उपभोक्ता: ये खाद्य शृंखला के ऊपरी स्तर पर पाए जाते हैं और दूसरे उपभोक्ताओं को खाते हैं। उदाहरण परिस्थिति के अनुसार बड़े शिकारी जीव हो सकते हैं।

सर्वाहारी (Omnivores): ऐसे जीव जो पौधों और पशुओं दोनों से भोजन प्राप्त करते हैं। मनुष्य इसका उदाहरण है।

3.3 अपघटक (Decomposers)

अपघटक मृत पौधों, मृत पशुओं और जैविक कचरे को सरल पदार्थों में तोड़ते हैं। बैक्टीरिया और कवक इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

यदि अपघटक न हों, तो मृत जैविक पदार्थ बड़ी मात्रा में जमा होने लगेंगे और पोषक तत्त्वों का पुनर्चक्रण प्रभावित होगा।

उदाहरण: जंगल में गिरी हुई सूखी पत्तियाँ समय के साथ सड़ती हैं। बैक्टीरिया और कवक उन्हें विघटित करते हैं और पोषक तत्त्व मिट्टी में वापस पहुँच जाते हैं। इन पोषक तत्त्वों का उपयोग पौधे फिर से कर सकते हैं।

इस प्रक्रिया से प्रकृति में पदार्थों का चक्र चलता रहता है।

4. पारिस्थितिकी तंत्र के प्रमुख कार्य (Functions of Ecosystem)

पारिस्थितिकी तंत्र केवल जीवों के रहने का स्थान नहीं है, बल्कि यह अनेक प्राकृतिक प्रक्रियाओं को संचालित करता है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं।

4.1 ऊर्जा का प्रवाह (Energy Flow)

सूर्य अधिकांश पारिस्थितिकी तंत्रों में ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। पौधे सूर्य की ऊर्जा का उपयोग करके भोजन बनाते हैं। इसके बाद शाकाहारी जीव पौधों को खाते हैं और मांसाहारी जीव शाकाहारी जीवों को खाते हैं।

उदाहरण:

सूर्य → घास → हिरण → बाघ

इस क्रम में ऊर्जा एक जीव से दूसरे जीव तक पहुँचती है। प्रत्येक स्तर पर जीव अपनी जीवन क्रियाओं के लिए ऊर्जा का उपयोग करते हैं और काफी ऊर्जा ऊष्मा के रूप में बाहर निकल जाती है। इसलिए ऊँचे पोषण स्तरों पर उपलब्ध ऊर्जा सामान्यतः कम होती जाती है।

4.2 पोषक तत्त्वों का चक्रण (Nutrient Cycling)

प्रकृति में कार्बन, नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्त्व जीवों और पर्यावरण के बीच चक्र के रूप में घूमते रहते हैं।

उदाहरण के लिए, पौधे मिट्टी से पोषक तत्त्व ग्रहण करते हैं। पशु पौधों को खाते हैं। जब पौधे और पशु मर जाते हैं, तो अपघटक उनके जैविक पदार्थों को विघटित करते हैं। इससे पोषक तत्त्व पर्यावरण में वापस पहुँचते हैं।

4.3 अपघटन (Decomposition)

मृत पौधों, पशुओं और अन्य जैविक पदार्थों को सरल पदार्थों में तोड़ने की प्रक्रिया अपघटन कहलाती है। बैक्टीरिया और कवक इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

अपघटन से पोषक तत्त्व मिट्टी में लौटते हैं और पौधों की वृद्धि में सहायता करते हैं।

4.4 भोजन का उत्पादन (Food Production)

हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं। यही भोजन खाद्य शृंखला के माध्यम से अन्य जीवों तक पहुँचता है। इसलिए पौधे पारिस्थितिकी तंत्र में भोजन उपलब्ध कराने का आधार हैं।

4.5 पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance)

पारिस्थितिक संतुलन का अर्थ है कि जीवों और उनके पर्यावरण के बीच संबंध सामान्य रूप से कार्य करते रहें। जब किसी प्रजाति की संख्या में बहुत अधिक बदलाव होता है या प्रदूषण और वनों की कटाई जैसी गतिविधियाँ बढ़ती हैं, तो यह संतुलन प्रभावित हो सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में शिकारी जीवों की संख्या बहुत कम हो जाए, तो कुछ शाकाहारी जीवों की संख्या बढ़ सकती है। इससे वनस्पतियों पर दबाव बढ़ सकता है।

5. वन पारिस्थितिकी तंत्र (Forest Ecosystem)

वन पारिस्थितिकी तंत्र वह प्राकृतिक व्यवस्था है जिसमें पेड़-पौधे प्रमुख रूप से पाए जाते हैं और अनेक जीव-जंतु उनके साथ रहते हैं।

वनों में पेड़, झाड़ियाँ, घास, पक्षी, कीड़े-मकोड़े, स्तनधारी जीव, सूक्ष्मजीव, मिट्टी, पानी और सूर्य का प्रकाश शामिल होते हैं।

वन पारिस्थितिकी तंत्र के घटक

अजैविक घटक: हवा, पानी, मिट्टी, सूर्य का प्रकाश, तापमान और खनिज।

जैविक घटक: पेड़-पौधे, झाड़ियाँ, घास, हिरण, पक्षी, कीड़े-मकोड़े, बाघ और सूक्ष्मजीव।

वन पारिस्थितिकी तंत्र का उदाहरण

घास → हिरण → बाघ

इस उदाहरण में घास उत्पादक है, हिरण प्राथमिक उपभोक्ता है और बाघ हिरण को खाने वाला शिकारी है।

वनों का महत्त्व

  1. वन अनेक जीवों को आवास प्रदान करते हैं।
  2. वन जैव विविधता की रक्षा करते हैं।
  3. वन मिट्टी के कटाव को कम करने में सहायता करते हैं।
  4. वन कार्बन का संग्रह करते हैं और जलवायु को प्रभावित करते हैं।
  5. वन जल चक्र और स्थानीय पर्यावरण के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
  6. अनेक समुदायों की आजीविका वन संसाधनों पर निर्भर करती है।

वनों के सामने प्रमुख समस्याएँ

वनों की कटाई, जंगलों में आग, अवैध कटाई, प्रदूषण और वन क्षेत्रों का छोटे-छोटे हिस्सों में बँट जाना प्रमुख समस्याएँ हैं। इनसे जीवों के आवास नष्ट होते हैं और जैव विविधता को नुकसान पहुँच सकता है।

वन संरक्षण के उपाय

वृक्षारोपण, वनों की अवैध कटाई रोकना, वन्यजीवों की रक्षा करना, आग की रोकथाम और स्थानीय समुदायों की भागीदारी वन संरक्षण के महत्त्वपूर्ण उपाय हैं।

6. घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र (Grassland Ecosystem)

घासभूमि ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र है जहाँ घास और अन्य छोटी वनस्पतियाँ प्रमुख रूप से पाई जाती हैं। यहाँ पेड़ सामान्यतः वन क्षेत्रों की तुलना में कम होते हैं, हालाँकि कुछ घासभूमियों में पेड़ और झाड़ियाँ भी मिलती हैं।

प्रमुख घटक

  • उत्पादक: घास और अन्य वनस्पतियाँ।
  • प्राथमिक उपभोक्ता: हिरण, मवेशी और टिड्डे।
  • अन्य उपभोक्ता: मेंढक, साँप और बड़े शिकारी जीव।
  • अपघटक: बैक्टीरिया और कवक।

खाद्य शृंखला का उदाहरण

घास → हिरण → शिकारी जीव

घासभूमि का महत्त्व

घासभूमियाँ पशुओं को चरने के लिए भोजन प्रदान करती हैं। वे अनेक शाकाहारी और मांसाहारी जीवों को सहारा देती हैं, जैव विविधता बनाए रखने में मदद करती हैं और मिट्टी तथा कार्बन के प्राकृतिक चक्र में योगदान देती हैं।

प्रमुख समस्याएँ

  • पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई।
  • कृषि भूमि में परिवर्तन।
  • शहरों का विस्तार।
  • प्राकृतिक आवास का नष्ट होना।
  • बाहरी आक्रामक प्रजातियों का फैलना।

घासभूमियों को बचाने के लिए नियंत्रित चराई, प्राकृतिक वनस्पतियों का संरक्षण और भूमि का उचित प्रबंधन आवश्यक है।

7. मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Desert Ecosystem)

Sand dunes in desert

मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र वह है जहाँ वर्षा बहुत कम होती है और पानी की उपलब्धता सीमित रहती है। भारत में थार मरुस्थल इसका प्रमुख उदाहरण है।

मरुस्थल की प्रमुख विशेषताएँ

  1. वर्षा कम होती है।
  2. वनस्पतियाँ सामान्यतः कम और विशेष प्रकार की होती हैं।
  3. पानी की कमी रहती है।
  4. दिन और रात के तापमान में बड़ा अंतर हो सकता है।
  5. जीवों में सूखे वातावरण के अनुकूल विशेषताएँ पाई जाती हैं।

मरुस्थल के जीव और वनस्पतियाँ

कैक्टस जैसे पौधे पानी की कमी में जीवित रहने के लिए अनुकूलित होते हैं। अनेक मरुस्थलीय जीव अपने शरीर में पानी बचाने और गर्मी से बचने के तरीके अपनाते हैं।

मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र का महत्त्व

मरुस्थल केवल रेत का क्षेत्र नहीं है। यहाँ विशेष परिस्थितियों में रहने वाले पौधे और जीव पाए जाते हैं। ये भी जैव विविधता और प्राकृतिक प्रक्रियाओं का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं।

प्रमुख समस्याएँ

जल की कमी, भूमि का क्षरण, अत्यधिक चराई और मानवीय गतिविधियों से प्राकृतिक आवास में बदलाव मरुस्थलीय क्षेत्रों की प्रमुख समस्याएँ हैं।

इन क्षेत्रों में पानी का सावधानीपूर्वक उपयोग, स्थानीय वनस्पतियों की रक्षा और भूमि का उचित प्रबंधन आवश्यक है।

8. जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic Ecosystem)

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पानी में विकसित होने वाले पारिस्थितिकी तंत्र को जलीय पारिस्थितिकी तंत्र कहते हैं। इसमें जल में रहने वाले पौधे, जीव-जंतु और सूक्ष्मजीव शामिल होते हैं।

जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है।

8.1 मीठे पानी का पारिस्थितिकी तंत्र (Freshwater Ecosystem)

नदियाँ, झीलें, तालाब और झरने मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र के उदाहरण हैं।

तालाब में जलीय पौधे, शैवाल, छोटी मछलियाँ, बड़ी मछलियाँ, कीड़े-मकोड़े, बैक्टीरिया और कवक पाए जा सकते हैं।

उदाहरण: पादप प्लवक → छोटी मछली → बड़ी मछली।

इस खाद्य शृंखला में पादप प्लवक उत्पादक की भूमिका निभाते हैं। छोटी मछली उनसे या अन्य छोटे जीवों से भोजन प्राप्त कर सकती है, जबकि बड़ी मछली छोटी मछली को खा सकती है।

8.2 समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (Marine Ecosystem)

समुद्र, महासागर, प्रवाल भित्तियाँ और तटीय क्षेत्र समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के उदाहरण हैं।

समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में अनेक प्रकार के जीव पाए जाते हैं। ये खाद्य शृंखलाओं, पोषक तत्त्वों के चक्रण और जलवायु संबंधी प्राकृतिक प्रक्रियाओं में योगदान देते हैं।

जलीय पारिस्थितिकी तंत्र की समस्याएँ

जल प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा, औद्योगिक अपशिष्ट और प्राकृतिक आवासों का विनाश जलीय जीवों को प्रभावित कर सकते हैं।

संरक्षण के उपाय: नदियों और तालाबों में कचरा न डालना, अपशिष्ट जल का उचित उपचार करना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना और जलीय आवासों की रक्षा करना।

9. पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा प्रवाह (Energy Flow in Ecosystem)

ऊर्जा प्रवाह का अर्थ है ऊर्जा का पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न जीवों और पोषण स्तरों तक पहुँचना।

अधिकांश पारिस्थितिकी तंत्रों में ऊर्जा सूर्य से शुरू होती है। पौधे सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके भोजन बनाते हैं। फिर यह ऊर्जा भोजन के माध्यम से अन्य जीवों तक पहुँचती है।

सूर्य

उत्पादक — हरे पौधे

प्राथमिक उपभोक्ता — हिरण

द्वितीयक या उच्च उपभोक्ता — शिकारी जीव

ऊर्जा प्रत्येक पोषण स्तर पर स्थानांतरित होती है और उसका कुछ भाग ऊष्मा के रूप में निकल जाता है।

ऊर्जा प्रवाह की प्रमुख विशेषताएँ

  • सूर्य अधिकांश पारिस्थितिकी तंत्रों में ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत है।
  • पौधे ऊर्जा को भोजन में संचित करते हैं।
  • उपभोक्ता भोजन के माध्यम से ऊर्जा प्राप्त करते हैं।
  • प्रत्येक पोषण स्तर पर ऊर्जा का कुछ भाग जीवन क्रियाओं में खर्च होता है।
  • ऊर्जा का प्रवाह सामान्यतः एक दिशा में होता है; पदार्थों की तरह ऊर्जा का उसी रूप में बार-बार चक्रण नहीं होता।

इसलिए खाद्य शृंखला के ऊँचे स्तरों पर सामान्यतः कम ऊर्जा उपलब्ध रहती है।

10. पोषण स्तर (Trophic Levels)

खाद्य शृंखला में कोई जीव भोजन प्राप्त करने के जिस स्थान पर होता है, उसे उसका पोषण स्तर कहते हैं।

उदाहरण: घास → टिड्डा → मेंढक → साँप।

इस उदाहरण में:

पोषण स्तर

जीव

भूमिका

प्रथम

घास

उत्पादक

द्वितीय

टिड्डा

प्राथमिक उपभोक्ता

तृतीय

मेंढक

द्वितीयक उपभोक्ता

चतुर्थ

साँप

तृतीयक उपभोक्ता

पोषण स्तरों का अध्ययन यह समझने में मदद करता है कि भोजन और ऊर्जा एक जीव से दूसरे जीव तक किस प्रकार पहुँचते हैं।

11. पारिस्थितिक पिरामिड (Ecological Pyramids)

पारिस्थितिक पिरामिड एक चित्रात्मक तरीका है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न पोषण स्तरों के बीच संबंध को समझा जाता है।

इसके तीन प्रमुख प्रकार हैं।

11.1 संख्या का पिरामिड (Pyramid of Numbers)

यह प्रत्येक पोषण स्तर पर उपस्थित जीवों की संख्या को दर्शाता है।

उदाहरण के लिए, किसी घासभूमि में घास के पौधों की संख्या बहुत अधिक हो सकती है, उनसे भोजन पाने वाले टिड्डे कम हो सकते हैं और उनसे भोजन पाने वाले मेंढक उनसे भी कम हो सकते हैं। हालाँकि, वास्तविक संख्या परिस्थिति के अनुसार बदल सकती है।

11.2 जैवभार का पिरामिड (Pyramid of Biomass)

जैवभार का अर्थ किसी पोषण स्तर पर उपस्थित जीवित पदार्थों के कुल द्रव्यमान से है।

जैवभार का पिरामिड यह दिखाता है कि उत्पादकों और विभिन्न उपभोक्ताओं के स्तर पर जीवित पदार्थ का कुल द्रव्यमान कितना है। अलग-अलग पारिस्थितिकी तंत्रों में इसका आकार अलग हो सकता है।

11.3 ऊर्जा का पिरामिड (Pyramid of Energy)

यह प्रत्येक पोषण स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा की मात्रा को दर्शाता है।

उत्पादकों से उपभोक्ताओं तक जाते समय ऊर्जा का एक भाग जीवन क्रियाओं में उपयोग होता है और ऊष्मा के रूप में निकल जाता है। इस कारण ऊँचे पोषण स्तरों पर कम ऊर्जा उपलब्ध होती है।

ऊर्जा का पिरामिड सामान्यतः सीधा होता है।

परीक्षा के लिए याद रखें: संख्या का पिरामिड जीवों की संख्या, जैवभार का पिरामिड जीवित पदार्थ के द्रव्यमान और ऊर्जा का पिरामिड उपलब्ध ऊर्जा को दर्शाता है।

12. खाद्य शृंखला (Food Chain)

खाद्य शृंखला वह क्रम है, जिसके माध्यम से भोजन और ऊर्जा एक जीव से दूसरे जीव तक पहुँचते हैं।

सरल परिभाषा: जीवों के बीच भोजन प्राप्त करने के क्रम को खाद्य शृंखला कहते हैं।

उदाहरण 1: घासभूमि

घास → हिरण → बाघ

घास भोजन बनाती है। हिरण घास खाता है और बाघ हिरण का शिकार कर सकता है।

उदाहरण 2: घास और कीट

घास → टिड्डा → मेंढक → साँप

टिड्डा घास खाता है, मेंढक टिड्डे को खा सकता है और साँप मेंढक का शिकार कर सकता है।

खाद्य शृंखला का महत्त्व

  1. यह जीवों के बीच भोजन संबंध समझाती है।
  2. यह ऊर्जा के प्रवाह को दर्शाती है।
  3. यह विभिन्न जीवों की पारिस्थितिक भूमिका समझने में सहायता करती है।
  4. इससे यह पता चलता है कि किसी जीव की संख्या में बदलाव दूसरे जीवों को प्रभावित कर सकता है।

खाद्य शृंखला के प्रमुख प्रकार

चराई खाद्य शृंखला (Grazing Food Chain): यह हरे पौधों या उत्पादकों से शुरू होती है।

उदाहरण: घास → हिरण → बाघ।

अपरद खाद्य शृंखला (Detritus Food Chain): यह मृत जैविक पदार्थ से शुरू होती है। इस पदार्थ का उपयोग करने वाले जीव और अपघटक इसमें भूमिका निभाते हैं।

उदाहरण: सूखी पत्तियाँ → अपघटक/अपरद खाने वाले जीव → अन्य उपभोक्ता।

13. खाद्य जाल (Food Web)

प्रकृति में जीव सामान्यतः केवल एक ही प्रकार के भोजन पर निर्भर नहीं रहते। एक जीव के कई खाद्य स्रोत हो सकते हैं और उसे कई दूसरे जीव खा सकते हैं। इस प्रकार जब अनेक खाद्य शृंखलाएँ एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं, तो खाद्य जाल बनता है।

उदाहरण: घास को हिरण, खरगोश और टिड्डा खा सकते हैं। टिड्डे को मेंढक और कुछ पक्षी खा सकते हैं। मेंढक को साँप खा सकता है। इस तरह कई खाद्य संबंध आपस में जुड़ जाते हैं।

खाद्य जाल का महत्त्व

  • यह जीवों के बीच अनेक खाद्य संबंध दिखाता है।
  • यह पारिस्थितिकी तंत्र की जटिलता समझाता है।
  • यह ऊर्जा के स्थानांतरण के कई मार्गों को दर्शाता है।
  • यह समझने में सहायता करता है कि एक प्रजाति में बदलाव का प्रभाव अन्य जीवों पर कैसे पड़ सकता है।

खाद्य शृंखला और खाद्य जाल में अंतर

खाद्य शृंखला

खाद्य जाल

भोजन का एक क्रम दिखाती है।

अनेक जुड़ी हुई खाद्य शृंखलाएँ दिखाता है।

अपेक्षाकृत सरल होती है।

अपेक्षाकृत जटिल होता है।

ऊर्जा स्थानांतरण का एक मार्ग दिखाती है।

ऊर्जा स्थानांतरण के अनेक मार्ग दिखाता है।

उदाहरण: घास → हिरण → बाघ।

घास से हिरण, खरगोश और टिड्डे सहित कई जीवों के जुड़े खाद्य संबंध।

14. पारिस्थितिक अनुक्रमण (Ecological Succession)

पारिस्थितिक अनुक्रमण वह प्रक्रिया है जिसमें समय के साथ किसी क्षेत्र में जीवों के समुदाय की संरचना और प्रकार में धीरे-धीरे बदलाव होता है। एक समुदाय की जगह परिस्थितियों के अनुसार दूसरा समुदाय विकसित हो सकता है।

उदाहरण के लिए, किसी खाली क्षेत्र में पहले कुछ प्रारंभिक जीव और घास उग सकते हैं। इसके बाद झाड़ियाँ और फिर परिस्थितियाँ अनुकूल होने पर पेड़ विकसित हो सकते हैं।

सरल क्रम:

खाली क्षेत्र → प्रारंभिक जीव → घास → झाड़ियाँ → पेड़ → विकसित समुदाय

यह क्रम प्रत्येक स्थान पर बिल्कुल एक जैसा नहीं होता। इसकी गति और परिणाम स्थानीय मिट्टी, जलवायु, पानी और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं।

14.1 प्राथमिक अनुक्रमण (Primary Succession)

प्राथमिक अनुक्रमण ऐसे क्षेत्र में शुरू होता है जहाँ पहले से विकसित मिट्टी या स्थापित जैविक समुदाय बहुत कम या मौजूद नहीं होता।

उदाहरण के लिए, नई उजागर चट्टानी सतह पर धीरे-धीरे प्रारंभिक जीव बस सकते हैं और समय के साथ मिट्टी तथा वनस्पतियों का विकास हो सकता है।

14.2 द्वितीयक अनुक्रमण (Secondary Succession)

द्वितीयक अनुक्रमण ऐसे क्षेत्र में होता है जहाँ पहले जीवों का समुदाय मौजूद था, लेकिन किसी व्यवधान के कारण उसमें बदलाव आ गया और मिट्टी जैसे कुछ घटक बचे रहे।

उदाहरण: खेती छोड़ दिए जाने के बाद किसी खेत में धीरे-धीरे घास, झाड़ियाँ और अन्य वनस्पतियाँ उग सकती हैं।

मुख्य अंतर: प्राथमिक अनुक्रमण ऐसी जगह शुरू होता है जहाँ विकसित मिट्टी या पुराना समुदाय लगभग नहीं होता, जबकि द्वितीयक अनुक्रमण पहले से बसे क्षेत्र में व्यवधान के बाद होता है और वहाँ मिट्टी प्रायः मौजूद रहती है।

15. पारिस्थितिकी तंत्र में परस्पर निर्भरता (Interdependence in Ecosystem)

प्रकृति में कोई भी जीव पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होता। सभी जीव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दूसरे जीवों और पर्यावरण पर निर्भर रहते हैं।

उदाहरण के लिए, पौधे सूर्य के प्रकाश, हवा, पानी और मिट्टी से पोषक तत्त्व प्राप्त करके भोजन बनाते हैं। हिरण पौधों को खाता है और बाघ हिरण का शिकार कर सकता है। जब जीव मर जाते हैं, तो अपघटक उनके शरीर को विघटित करके पोषक तत्त्व पर्यावरण में वापस पहुँचाते हैं।

इस प्रकार प्रकृति में एक जीव का जीवन दूसरे जीवों और पर्यावरण से जुड़ा हुआ है।

परस्पर निर्भरता के उदाहरण:

  • पौधे भोजन और ऑक्सीजन प्रदान करते हैं।
  • मधुमक्खियाँ और तितलियाँ परागण में सहायता करती हैं।
  • शाकाहारी जीव पौधों पर निर्भर रहते हैं।
  • मांसाहारी जीव अन्य जीवों से भोजन प्राप्त करते हैं।
  • अपघटक पोषक तत्त्वों को पर्यावरण में वापस पहुँचाते हैं।

यदि किसी एक घटक में बड़ा बदलाव होता है, तो इसका प्रभाव पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है।

16. पारिस्थितिकी तंत्र पर मानवीय गतिविधियों का प्रभाव

मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रकृति के संसाधनों का उपयोग करता है। लेकिन जब इन संसाधनों का अत्यधिक या अनुचित उपयोग होता है, तो पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है।

प्रमुख मानवीय गतिविधियाँ

वनों की कटाई: जंगलों के नष्ट होने से वन्यजीवों के आवास कम होते हैं और जैव विविधता को नुकसान पहुँच सकता है।

शहरीकरण: शहरों के विस्तार से प्राकृतिक क्षेत्रों और कृषि भूमि का उपयोग बदल सकता है।

औद्योगीकरण: उद्योगों से निकलने वाला अनुपचारित अपशिष्ट हवा, पानी और मिट्टी को प्रदूषित कर सकता है।

खनन: खनिजों को निकालने के कारण भूमि, वनस्पतियों और जीवों के आवास प्रभावित हो सकते हैं।

अत्यधिक संसाधन उपयोग: जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ना, जंगलों से संसाधनों का अत्यधिक संग्रह और भूजल का अधिक दोहन प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ाते हैं।

जलवायु परिवर्तन: तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव जीवों के आवास, भोजन की उपलब्धता और उनके जीवन चक्र को प्रभावित कर सकता है।

इसके प्रमुख परिणाम

  • जैव विविधता में कमी।
  • प्राकृतिक आवासों का विनाश।
  • खाद्य शृंखलाओं में बदलाव।
  • मिट्टी और पानी की गुणवत्ता में गिरावट।
  • पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन में व्यवधान।

इन समस्याओं को कम करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण आवश्यक है।

17. पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण (Conservation of Ecosystem)

पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण करने का अर्थ है प्राकृतिक आवासों, जीवों और पर्यावरणीय प्रक्रियाओं की रक्षा करना।

संरक्षण के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं:

  1. प्राकृतिक आवासों की रक्षा: जंगलों, नदियों, तालाबों और घासभूमियों को नष्ट होने से बचाना।
  2. वृक्षारोपण: उपयुक्त स्थानीय प्रजातियों के पेड़ लगाना और उनकी देखभाल करना।
  3. प्रदूषण नियंत्रण: जल, वायु और मिट्टी को प्रदूषित होने से बचाना।
  4. वन्यजीव संरक्षण: अवैध शिकार रोकना और जीवों के प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना।
  5. जल संरक्षण: वर्षा जल संचयन और पानी का उचित उपयोग करना।
  6. कचरा प्रबंधन: कचरे को अलग करना, पुनः उपयोग करना और पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना।
  7. जन-जागरूकता: लोगों को पर्यावरण के महत्त्व के बारे में जानकारी देना।
  8. सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय नागरिकों को संरक्षण कार्यक्रमों से जोड़ना।

पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें नागरिकों, शैक्षणिक संस्थानों, उद्योगों और मीडिया की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

18. पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण में मीडिया की भूमिका

BAJMC के विद्यार्थियों के लिए यह विषय विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि पत्रकारिता और जनसंचार पर्यावरण संबंधी जानकारी लोगों तक पहुँचाने के प्रभावी माध्यम हैं।

समाचार पत्र और समाचार पोर्टल

समाचार पत्र तथा डिजिटल पोर्टल वनों की कटाई, नदियों के प्रदूषण, वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण संबंधी नीतियों पर समाचार प्रकाशित कर सकते हैं।

टेलीविजन

टेलीविजन पर डॉक्यूमेंट्री, समाचार रिपोर्ट और विशेष कार्यक्रमों के माध्यम से जंगलों, नदियों, वन्यजीवों और पर्यावरणीय समस्याओं को दृश्य रूप में दिखाया जा सकता है।

रेडियो

रेडियो कार्यक्रमों के माध्यम से स्थानीय समुदायों तक पानी बचाने, कचरे का उचित प्रबंधन करने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित संदेश पहुँचाए जा सकते हैं।

सोशल मीडिया

सोशल मीडिया पर छोटे वीडियो, पोस्टर, इन्फोग्राफिक्स और जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं।

पर्यावरण पत्रकारिता का उदाहरण

यदि किसी स्थानीय तालाब में प्रदूषण बढ़ रहा है, तो पत्रकार अपनी रिपोर्ट में निम्नलिखित विषय शामिल कर सकता है:

  • तालाब की वर्तमान स्थिति।
  • प्रदूषण के संभावित कारण।
  • स्थानीय लोगों पर प्रभाव।
  • विशेषज्ञों की राय।
  • संबंधित अधिकारियों का पक्ष।
  • समाधान और संरक्षण के उपाय।

इस प्रकार पर्यावरण पत्रकारिता केवल समस्या को सामने नहीं लाती, बल्कि जनता को उसके कारणों और संभावित समाधानों को समझने में भी सहायता करती है। पत्रकार को तथ्यों की जाँच करके, वैज्ञानिक जानकारी को सही संदर्भ में प्रस्तुत करना चाहिए।

19. पारिस्थितिकी तंत्र से संबंधित महत्त्वपूर्ण शब्द

शब्द

सरल अर्थ

पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem)

जीवों और उनके निर्जीव वातावरण के बीच संबंधों की प्राकृतिक व्यवस्था।

जैविक घटक (Biotic)

पर्यावरण के जीवित घटक।

अजैविक घटक (Abiotic)

पर्यावरण के निर्जीव घटक।

उत्पादक (Producer)

अपना भोजन स्वयं बनाने वाले जीव।

उपभोक्ता (Consumer)

भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर जीव।

अपघटक (Decomposer)

मृत जैविक पदार्थों को विघटित करने वाले जीव।

खाद्य शृंखला (Food Chain)

भोजन और ऊर्जा के स्थानांतरण का क्रम।

खाद्य जाल (Food Web)

आपस में जुड़ी अनेक खाद्य शृंखलाएँ।

पोषण स्तर (Trophic Level)

खाद्य शृंखला में जीव की भोजन संबंधी स्थिति।

ऊर्जा प्रवाह (Energy Flow)

पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा का स्थानांतरण।

पारिस्थितिक पिरामिड

विभिन्न पोषण स्तरों की संख्या, जैवभार या ऊर्जा का चित्रात्मक प्रदर्शन।

पारिस्थितिक अनुक्रमण

समय के साथ जीव समुदाय में होने वाला क्रमिक बदलाव।

पारिस्थितिकी तंत्र प्रकृति की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें जीवित प्राणी और निर्जीव घटक एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। ऊर्जा प्रवाह, पोषक तत्त्वों का चक्रण, खाद्य शृंखला और खाद्य जाल इसकी प्रमुख प्रक्रियाएँ हैं। वन, घासभूमि, मरुस्थल तथा जलीय क्षेत्र इसके विभिन्न उदाहरण हैं।

मानवीय गतिविधियों के कारण पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग, प्रदूषण पर नियंत्रण, जैव विविधता का संरक्षण और जन-जागरूकता आवश्यक है। BAJMC के विद्यार्थियों के लिए इन विषयों का ज्ञान इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मीडिया पर्यावरण संबंधी सही जानकारी समाज तक पहुँचाकर संरक्षण के प्रयासों को मजबूत कर सकता है।