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शनिवार, 26 नवंबर 2016

वैकल्पिक मीडिया का उपकरण है सामुदायिक रेडियो

 हिंट सामुदायिक रेडियो के संस्थापक कमल सेखरी से शोधार्थी (रामशंकर विद्यार्थी) की बातचीत
शोधार्थी - सर, सामुदायिक रेडियो शुरू करने का उद्देश्य क्या रहा है ? 
कमल सेखरी – सामुदायिक रेडियो शुरू करने का उद्देश्य स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, मनोरंजन और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना और इनका प्रचार कर जनसमान्य में जागरूकता लाना है। इसके जरिए स्थानीय स्वशासन, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा भी दिया जाता है। 
शोधार्थी -  आपके केंद्र से किस प्रकार के कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं ?
कमल सेखरी हिंट सामुदायिक रेडियो के माध्यम से,समुदाय की सेवाओं पर समस्याओं पर आधारित कार्यक्रम,हस्ताक्षर अभियान,जागो गाजियाबाद,पहल और असर,हेल्थ कैरियर डॉट काम,किसान भाइयों के लिए कार्यक्रम,फिट हैं तो हिट हैं तथा युवाओं की शिक्षा पर आधारित अनेक कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं
शोधार्थी सामुदायिक रेडियो को हम वैकल्पिक मीडिया कह  सकते हैं ?
कमल सेखरीहाँ।  वैकल्पिक मीडिया के अंतर्गत इंटरनेट, ब्लॉग,सामुदायिक रेडियो तथा एक विशेष उद्देश्यों को लेकर चल रहे अनेक समचर पत्र पत्रिकाएँ आती है जो  समाज में समाज की बात को समाज तक पहुँचाने  के लिए चलाई जा रहीं हैं । वैकल्पिक मीडिया ही तो है जिसके माध्यम से समाज का एक कमजोर तथा सूचनाओं से अछूते वर्ग में सूचना की छटपटाहट व्याप्त हो गयी है । सामुदायिक रेडियो के द्वारा भी समाज में जागरूकता फैलाई जा रही है । कमजोर वर्ग में भी अब सरकारी कामों से लेकर अपने हक की लड़ाई में हस्तक्षेप का माहौल व्याप्त किया है ।
शोधार्थी- सामुदायिक रेडियो, व्यावसायिक रेडियो से किस प्रकार भिन्न हैं ?
कमल सेखरी मेरा जो हिंट सामुदायिक रेडियो है यह मुख्यतः महिलाओं में साफ सफाई से संबन्धित,महिलाओं में अपने अधिकार के प्रति सचेतता,महिलाओं में स्वास्थ्य की जागरूकता,किसानों के लिए खेतीबाड़ी से संबंधित आदि कार्यक्रमों के द्वारा जागरूक कर रहा है । इसका स्लोगन- इट्स आल अबाउट गाजियाबाद है। इसमें स्थानीयता का ज्यादा बोध होता है,जबकि अन्य व्यावसायिक रेडियो मुख्यतः लोगों के मनोरंजन तथा विज्ञापन केन्द्रित होते है। इसमें स्थानीयता का बोध कम होता है। इसके कार्यक्रम एक खास वर्ग को ध्यान में रखकर नहीं बनाए जाते हैं ।  
शोधार्थी- तो, क्या सामुदायिक रेडियो में विज्ञापन प्रसारित नहीं किए जाते हैं ?
कमल सेखरीविज्ञापन प्रसारित होते है लेकिन ये विज्ञापन  मुख्यतःग्रामीण जागरूकता पर आधारित होटेन हैं जैसे पल्स पोलियो,एडस,महामारी, पेयजल या शिक्षा संबंधित आदि विज्ञापन होते हैं ।  
शोधार्थी- आपके यहाँ क्या पंचायती राज के मुद्दों को ध्यान में रखकर कार्यक्रमों को प्रायोजित किया जाता है ?
कमल सेखरी - हर किसी को अपनी बात वैकल्पिक  मीडिया के माध्यम से कहने का हक है। चूंकि सामुदायिक रेडियो भी वैकल्पिक  मीडिया का ही एक अंग है इसलिए पंचायती राज के मुद्दे हो या जनसामान्य से जुड़े अन्य कोई मुद्दे हो सामुदायिक रेडियो का उससे निरंतर जुड़ाव रहता है ।    
शोधार्थी- सर, क्या आपके सामुदायिक रेडियो से सामाजिक तथा राजनैतिक जागरूकता से संबंधित कार्यक्रमों का प्रसारण होता है ?
कमल सेखरीराजनैतिक मुद्दों से जुड़े कार्यक्रम तो लगभग नहीं ही होते हैं, लेकिन चुनाव के समय मतदान के लिए प्रेरक कार्यक्रम,अपने मताधिकार के मूल्य के संदर्भ में जागरूक करना, राजनेताओं से अपनी समस्याओं से न्याय के हक में बातचीत के लिए प्रेरित करना, स्वयंसहायता समूहों में अपनी जरूरत के बारे बातचीत करना आदि विभिन्न प्रकार के मुद्दों पर विभिन्न कार्यक्रमों में चर्चा के माध्यम से जागरूकता फैलाई जाती है ।  
शोधार्थी- क्या आपको सामुदायिक रेडियो से जागरूकता से  सकारात्मक प्रभाव जनमानस में देखने को मिल रहा है ?
कमल सेखरी -  हाँ, वर्तमान समय में सामाजिक बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है । इसने आम जनमानस को वैचारिक मंच प्रदान किया है। हमें पत्रों के माध्यम से,फोन के माध्यम से फीडबैक मिलता है लोग अपनी आपबीती विभिन्न कार्यक्रमों में साझा करते है और बताते है कि किस प्रकार उन्होने जागरूक होकर अनेक महत्व पूर्ण कदम उठाए हैं।
शोधार्थी- भारत में सामुदायिक रेडियो को शुरू करने के पीछे क्या कारण हैं ?
कमल सेखरी- भारत में सामुदायिक रेडियो एक तरह से युनेस्को के मिशन को ही आगे बढ़ाने की पहल थी । बतौर सामुदायिक रेडियो समाज में एक खास वंचित  तबके को ध्यान में रखकर शुरू किया गया । सामुदायिक रेडियो को शुरू करने के पीछे एक कारण यह भी है कि मुख्यधारा के मीडिया की पहुँच समाज के वंचित तबकों तक नहीं है या इस मीडिया में वंचित तबकों को कोई स्थान नहीं दिया जा रहा है। मुख्यधारा कि मीडिया में उन्हें जगह दिलाने के प्रयास कि जगह उनके लिए अलग से मीडिया माध्यम खड़ा करने पर ज़ोर देना है ।  
शोधार्थी- वैकल्पिक मीडिया की पहुँच व प्रभाव के बारे में क्या कहना चाहते हैं ?
कमल सेखरी-  सामुदायिक रेडियो जो वैकल्पिक मीडिया  के रूप में बड़ा ही सरल,सुगम और किफ़ायती माध्यम है। यह हमें जागरूक करने,प्रतिक्रियावादी बनाने का एक सशक्त माध्यम है । बिना अधिक यंत्रों और उपकरणों  से आज इसकी पहुँच साधारण व्यक्ति तक हो गयी है।    

(यह साक्षात्कार 15 जुलाई को हिंट सामुदायिक रेडियो स्टेशन गाजियाबाद में कमल सेखरी और शोधार्थी बातचीत पर आधारित है। )

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

आपदा प्रबंधन में मीडिया की भूमिका

आपदा प्रबंधन में मीडिया की भूमिका

रामशंकर
शोधार्थी- पीएच.डी. जनसंचार एवं ICSSR डॉक्टोरल रिसर्च फ़ेलो
म.गां.अं.हि.वि.वि.,वर्धा (महाराष्ट्र)ईमेल- ramshankarbarabanki@gmail.com
  


            आपदा एक बहुत विषयक क्षेत्र है जिसमें बड़े पैमाने पर निगरानी मूल्यांकन, खोजबीन और बचाव, राहत, पुर्नवास आदि मुद्दे/पहलू शामिल होते है। आपदा को एक बड़ी एकाएक आने वाली मुसीबत के रूप में परिभाषित किया जा जाता है। अनेक सरकारी, गैरसरकारी संगठन, निजी संगठन इस मुसीबत का मुकाबला करने के लिए तैयारी करते है। वे इसकी मार कम करने, आपदा पूर्व की स्थिति में लाकर लोगों का कष्ट घटाने और उन्हें काम-धंधे से लगाने की कोशिश करते है। इन्हीं तीनों कार्यों को इकट्ठा कर दे तो इसे आपदा प्रबंधन कहते है।
आपदा प्रबंधन का पहला सिद्धान्त है आपदा निवारण, आपदा प्रबंधन के अन्तर्गत पीड़ित लोगों  की निगरानी, बचाव, भोजन तथा पुर्नवास शामिल है। इसमें बहुउद्देशीय शासन व्यवस्था, वैज्ञानिक, नियोजन और मीडिया क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आपदा प्रबंधन के अन्तर्गत पीड़ित लोगो की निगरानी, बचाव भोजन तथा पुर्नवास शमिल है। इसमें बहुद्देशीय शासन व्यवस्था, वैज्ञानिक, नियोजन और मीडिया, क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आपदा प्रबंधन अपने आप में कुछ नहीं यह तो आपदाओं  के नियंत्रण का कौशल पूर्ण, मार्ग, तरीका, युक्ति तथा पद्धति है, जब लोगों को आपदाओं के बारे में शिक्षित या जागरूक बनाया जाता है, तो यह कार्य आसान हो जाता है। एक गरीब और विकास शील देश होने के कारण भारत में आपदाओं के बारे में जनरक्षा एवं बचाव की जानकारी अधूरी है। आपदा प्रबंधन की प्रणालियाँ और तकनीक देश के बारे में मीडिया लोगों केा जागरूक आपदाओं के प्रति अपनी सक्रिय भूमिका निभाती है। मीडिया आपदा प्रबंधन के विभिन्न विषयों को लेकर प्रशासन तथा स्त्थनीय लोगों में सामंजस्य की भूमिका निभाती है।
आपदा प्रबंधन के लिए जरूरी है। समय से जानकारी और सफल समन्वय अक्सर छोटी या बड़ी आपदाओं में कमी रह जाती है, जिसकी वजह से मदद व्यक्ति के पास समय पर नहीं पहुँच पाती है। भुज और अजार में आये भूकंम्प से भारी क्षति हुई। मीडिया की खबरों के बावजूद राहत सामग्री सहित विभिन्न एजेंसियां भुज के आगे कच्छ पहुँचने में दो दिन से ज्यादा समय लग गया। इस समय मीडिया को अधिक  सक्रियता से अपना काम करना चाहिए। इन प्राकृतिक आपदाओं में देखा गया है कि सार्वजनिक सूचना तंत्र पहले प्रभावित होता है, जिससे प्रभावित क्षेत्रों और मीडिया में सम्पर्क प्रभावित रहता है, ऐसे में आपदा प्रंबधन में मीडिया का रोल और अधिक बढ़ जाता है। मीडिया लोगों को खूब जागरूक कर सकती है।  आपदायिक घटनाओं के समय मीडिया का रोल बढ़ जाता है, चाहे वह प्रिन्ट मीडिया हो चाहे इलेक्ट्रोनिक मीडिया हो।
समाज की कार्यात्मकता में गम्भीर रूकावट, व्यापक पैमाने पर मानवीय और पर्यावरणीय क्षति, जो कि प्रभावित समाज द्वारा उसके पास उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग करते हुए भी उस आपदायिक घटना से निपटना समाज की क्षमता से बाहर की बात हो जाय,आपदा कहलाती है। आपदाऐं सामान्य जन-जीवन से लेकर विकास प्रक्रिया में भी बाधा पैदा करती है और अचानक हमें ऐसी हिंसा का मुंह देखना पड़ता है, जो न केवल जिन्दगियां और ढांचो को तबाह कर देती है, बल्कि परिवारों को भी एक-दूसरे से अलग कर देती है। आपदाओं के कारण जिन्दगियां की औसत वार्षिक हानि की दृष्टि से सर्वोच्च दस देशों में आस्ट्रेलिया को छोड़कर विकासशील देश शामिल है। इन राष्ट्रों में से प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से भारत अधिक संवेदनशील है। इसकी भौगोलिक स्थिति, जलवायु और परिस्थतिकीय व्यवस्था के कारण भारत को हर वर्ष प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है। भारत में प्राकृतिक आपदाएं हर साल बड़ी संख्या में जनसंख्या को अपना शिकार बनाती है।
देश की ढाँचागत तथा जलवायुगत परिस्थितियाँ लगभग देश के 56-60 प्रतिशत भाग को भूकम्प, बाढ, चक्रवात, के प्रति संवेदनशील है। फिर भी आपदा प्रबंधन को विकास योजनाओं तथा गरीबी उन्मूलन रणनीति में अनिवार्य रूप से शामिल नहीं किया गया है। आपदा को एकाएक आने वाली एक बडी मुसीबत के रूप  मे परिभाषित किया जाता है। अनेक सरकारी तथा गैर सरकारी संगठन इस मुसीबत का सामना करने के लिए तैयार रहते है। आपदा की मार को कम करने, आपदापूर्व स्थिति में लाने उन्हें ,काम धन्धे से लगाने, पुर्नवास आदि आपदा प्रबंधन के अर्न्तगत निहित है। और फिर आपदा प्रबंधन जैसे बडे  कार्यक्रम को क्रियान्वित करने के लिए आवश्यकता होती है, सशक्त संचार तंत्र की अर्थात मीडिया की। यह शोध आपदा प्रबंधन में मीडिया की भूमिका पर अध्ययन है। भारत में अनेक प्राकृतिक आपदायें  आयी चाहे वह गुजरात, महाराष्ट्र उत्तराखंड के भूकंप, सुनामी हो चाहे नेपाल की कोसी नदी से छोडे गए जल से बिहार ,उत्तरी भारत का, जल मग्न वीभत्स मंजर या भागीरथी नदी का कहर। भारत में आपदा प्रबंधन के नाम पर होता है, तो केवल यह कि आपदा ग्रस्त समुदायों को राहत पहुचाँना और उसका पुर्नवास कराना, लेकिन इससे आर्थिक और वैकासिक क्षति की भरपाई नहीं हो सकती है। गुजरात के भूकम्प से ज्यादा वीभत्स अमेरिका और  जापान के भूकम्प थे, लेकिन वहाँ नुकसान कम हुआ क्योंकि वहाँ मीडिया के द्वारा लोगों को समय- समय पर आपदा के प्रबंधन के प्रति जागरूक कराया जाता है। उसके ठीक विपरीत है हमारे यहाँ की मीडिया। मीडिया जो कि चौथे स्तम्भ के रूप में परिलच्छित है, उसकी क्या भूमिका है। क्या मीडिया लोगों को सजग एवं जागरूक कर रही है
साहित्य का पुनरावलोकन
1.      आपदा प्रबंधन आधारित प्रमुख साहित्य, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के मीडिया आधारित शोध पत्र- पत्रिकाएं,
2.      आपदा से जुड़े चर्चित ख्यातिलब्ध विद्वानों एवं साहित्यकारों द्वारा आपदा प्रबंधन और मीडिया  आलोक में रचित आधारित संस्थागत, विभागीय एवं अकादमिक साहित्य,
3.      आपदा प्रबंधन के समाचार पर आधारित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अध्ययन, एवं पुस्तक आदि। 
अध्ययन के उद्देश्य
            प्रस्तुत अध्ययन विषय आपदा प्रबंधन में मीडिया की भूमिका के विशद अध्ययन हेतु निम्नलिखित उद्देश्य  बिंदुवत् है -
·       आपदा के समय मीडिया की स्थिति का विश्लेषण।
·       आपदा प्रबंधन के प्रति जागरूकता फैलाने में मीडिया के प्रभाव का अध्ययन।
·       आपदा के समय पीड़ित समाज तक मीडिया की पहुँच अध्ययन।
न्यादर्श का चयन
प्रस्तुत शोध कार्य के लिए उत्तर प्रदेश में बहराइच तथा बाराबंकी जिले के आपदाग्रस्त  लोग तथा आपदा प्रबंधन में मीडिया की भूमिका के प्रभाव को जानने के लिए आमजन को चयनित किया गया है। आमजन में बाढ़ से आपदाग्रस्त महिलाएं व पुरुष तथा कुछ विद्यार्थी शामिल हैं।   
शोध का महत्व
·       आपदा प्रबंधन और मीडिया संबंधों का सूक्ष्म विश्लेषण  संभव हो पायेगा,
·       आपदा पीड़ित समाज और मीडिया की पारदर्शी भूमिका संभव हो पायेगा,
·       आपदा प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं को सामने लाने में मीडिया के जनमानस तक पहुँच व उसके प्रभाव का अध्ययन हो पायेगा ।
 अध्ययन प्रविधि
प्रस्तुत शोध के लिए सर्वेक्षण व अवलोकन विधि का चयन किया गया है ।
प्राथमिक  स्रोत : प्रश्नावली,साक्षात्कार
द्वितीयक स्रोत: संबंधित साहित्य का अध्ययन, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, आलेखों, चर्चित ख्यातिलब्ध विद्वानों एवं साहित्यकारों के द्वारा प्रस्तुत शोध के आलोक में प्रस्तुत विचार इत्यादि।
अध्ययन की तकनीक
              प्रस्तुत अध्ययन में साक्षात्कार और प्रश्नावली तकनीक का प्रयोग किया गया है ।
प्रदत संकलन-
शोध के लिये चयनित समग्र क्षेत्र में 50 प्रश्नावली का वितरण किया गया। प्रश्नावली में कुल 10 प्रश्न ऐसे थे जो उद्देश्य को ध्यान में रखकर बनये गए थे। मीडिया की विवेचना, वर्तमान में आपदा के समय मीडिया का  स्वरूप, मीडिया का जनमानस पर प्रभाव व आपदा प्रबंधन में मीडिया की भूमिका आदि से संबंधित प्रश्न सम्मिलित किए गए थे। तथ्य के संकलन के लिए  आपदा प्रबंधन से जुड़े समाजसेवी संघठन एवं मीडिया से जुड़े लोगों से  साक्षात्कार भी लिया गया।
प्रदत्त विश्लेषण व विवेचना
प्रश्नावली से प्राप्त आकड़ों के विश्लेषण से जो महत्वपूर्ण परिणाम उभर कर आये हैं उनका वर्णन निष्कर्ष के रूप में निम्नलिखित है –
  अध्ययन में सहभागी उत्तरदाताओं का सामान्य परिचय -
·       प्रस्तुत अध्ययन में उत्तरदाता आपदा पीड़ित क्षेत्र के हैं ।
·       अध्ययन में सम्मिलित उत्तरदाता 20 वर्ष से 60 वर्ष के मध्य आयु के हैं ।
·       अध्ययन में 40 प्रतिशत उत्तरदाता महिला 60 प्रतिशत उत्तरदाता पुरुष है ।   
अध्ययन में सम्मिलित उत्तरदाताओं में सर्वाधिक 60 प्रतिशत उत्तरदाता ने माना की आपदा प्रबंधन के बारे जरूरी जानकारी रखते है। 40 प्रतिशत लोगों ने नहीं में अपना मत प्रदान किया । निष्कर्षतः आपदा क्षेत्र में रहने वाले अधिकतर उत्तरदाता आपदा प्रबंधन के प्रति जागरूक हैं।
अध्ययन में सम्मिलित उत्तरदाताओं में क्या आपदाओं का प्रबंधन जरूरी है के प्रश्न पर 94 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने हाँ, शून्य प्रतिशत लोगों ने नहीं तथा 6 प्रतिशत लोगों ने कुछ कह नहीं सकते का मत प्रदान किया। निष्कर्षतः आपदाओं का प्रबंधन जरूरी है।
आपदा प्रबंधन और प्रभावी संचार माध्यम के सवाल पर 16 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने प्रिंट मीडिया, 20 प्रतिशत इलेक्ट्रोनिक मीडिया, 4 प्रतिशत लोग वेब मीडिया तथा 60 प्रतिशत लोगों ने सभी संचार माध्यमों पर आपदा प्रबंधन से संबंधित समाचार प्रभावी ढंग से प्रसारित व प्रकाशित होने का मत व्यक्त किया है। निष्कर्षतः आपदा के प्रबंधन  के लिए सभी संचार माध्यम प्रभावी हैं।
अध्ययन में आपदा प्रबंधन में मीडिया की सकारात्मक भूमिका पर 72 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने हाँ, 06 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने नहीं तथा 22 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कुछ कह नहीं सकते का मत प्रकट किया है। निष्कर्षतः आपदा प्रबंधन में में की सकारात्मक भूमिका होती है।
अध्ययन में आपदा प्रबंधन और पसंदीदा अख़बार के पप्रश्न पर 50 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने हिंदुस्तान, 36 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने दैनिक जागरण,04 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने अमर उजाला तथा 10 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने अन्य अख़बार पढ़ने का मत प्रदान किया है। निष्कर्षतः आपदा के समय अधिकतर उत्तरदाता हिदुस्तान एवं दैनिक जागरण अखबार पढ़ना पसंद करते हैं।
अध्ययन में मीडिया का आपदा के समय सेवा की लिए जनजागरूकता करने के सवाल पर 90 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने हाँ, 02 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने नहीं तथा 08 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कुछ कह नहीं सकते का मत प्रदान किया है। निष्कर्षतः आपदा के समय मीडिया द्वारा जनजागरूकता कार्यक्रम चलाया जाता है।
अध्ययन में आपदा के समय बचाव दल और मीडिया में समन्वय होना आवश्यक है, के सवाल पर 98 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने हाँ शून्य प्रतिशत उत्तरदाताओं ने नहीं तथा 02 प्रतिशत उत्तरदाताओं कुछ कह नहीं सकते का मत प्रकट किया। निष्कर्षतः आपदा के समय बचाव दल और मीडिया में समन्वय होना अत्यंत आवश्यक है।
प्राकृतिक आपदा के समय मौसम विभाग की भूमिका सकारात्मक होती है, सवाल पर 52 प्रतिशत लोगों ने हाँ, 26 प्रतिशत नहीं तथा 22 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कुछ कह नहीं सकते का मत प्रकट किया है। निष्कर्षतः भले ही हम नतीजों से यह कह सकते है कि मौसम विभाग की भूमिका सकारात्मक होती है, लेकिन प्राप्त आंकड़ों से स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।
अध्ययन में आपदाओं के बार-बार आने पर विकास प्रक्रिया में बाधा पहुँचती है, के सवाल पर 60 प्रतिशत लोगों ने हाँ, 20 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने नहीं तथा 20 प्रतिशत उत्तरदाता कुछ कह पाने में असमर्थ नजर आए। निष्कर्षतः आंकड़ों के नतीजों से स्थिति स्पष्ट है की आपदाओं से विकास प्रक्रिया बाधित होती है।  
अध्ययन में विशेष मत के सवाल पर कई मत मिले जो निम्न हैं – सर्वेक्षण में प्राप्त मतों के अनुसार आपदा प्रबंधन निभा सकती है। हैती में आए भूकंप व उत्तराखंड में बारिश का कहर में मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की लेकिन वह इससे कहीं अधिक भी कर सकती थी। कम संसाधन तथा प्रौद्योगिकी का अभाव भी यहाँ के प्रबंधा की मजबूरी है। मीडिया को समाज में उच्चस्तरीय समन्वय के साथ काम करना चाहिए, जिससे समाज में मीडिया की भ्रामक स्थिति समाप्त हो सके। आकाशवाणी द्वारा दी जाने वाली मौसम की जानकारी को और अधिक प्रभावी एवं स्पष्ट होनी चाहिए, जिससे मीडिया आपदा प्रबंधन को और अधिक मजबूत कर सके ।    
निष्कर्ष
प्रस्तुत शोध ’’प्राकृतिक आपदा प्रबंधन में मीडिया की भूमिका’’ को ध्यान में रखते हुए अनुसांगिक शोध प्रविधि के सर्वेक्षण माध्यम से प्राप्त तथ्यों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं  कि 72 प्रतिशत उत्तरदाताओं के अनुसार प्राकृतिक आपदा प्रबंधन में मीडिया की सकारात्मक भूमिका को स्वीकार किया तथा 6 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने नकारात्मक तथा 22 प्रतिशत उत्तरदाताओं  से कुछ भी न कहने के परिणाम प्राप्त हुए है। मीडिया जन जागरण का एक सशक्त माध्यम है। अपने प्रसारण के माध्यम से इसने आज समाज में आपदा प्रबंधन में योगदान कर प्रबंधन में नयी दिशा की नींव रखी है। हालांकि यह बात सर्वेक्षण से सामने आयी है कि मीडिया प्राकृतिक आपदा प्रबंधन में भरपूर योगदान कर रही है। लेकिन हाल ही में उत्तराखंड में भीषण बारिश के कारण आई प्राकृतिक आपदा में जहां सैकड़ों लोग काल के गाल में समा गए हैं, वहीं सैकड़ों लाशें अभी भी मलबे में दबी हुई हैं। केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम पूरी तरह से तबाह हो गए और समूचा रुद्रप्रयाग जिला मलबे के ढेर में तब्दिल हो गया। इससे एक बार फिर से यह सिद्ध हुआ की भारत के पास प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए कोई प्रभावी तंत्र नहीं है।आपदा रिपोर्टर को अलग-अलग हालात में काम करना होता है। इन हालात को समझना जरूरी है और ये हालात आपदा की किस्म पर निर्भर है। प्राकृतिक आपदाएं मनुष्य और अन्य जीवों को बहुत प्रभावित करती हैं। प्राकृतिक आपदा को कई रूपों में देखा जाता है। हरिकेन, सुनामी, सूखा, बाढ़, टायफून, बवंडर, चक्रवात आदि मौसम से सम्बन्धित प्राकृतिक आपदा हैं। भूस्खलन और अवघाव या हिमघाव (बर्फ की सरकती हुई चट्टान) ऐसी प्राकृतिक आपदा हैं जिनके कारण प्रभावित स्थल का आकार बदल जाया करता है। भूकम्प और ज्वालामुखी भी कमोबेश इसी तरह की आपदा हैं। ज्वालामुखी के कारण अग्निकांड अथवा दावानल जैसे परिणाम आते हैं। ऐसा टेक्टोनिक प्लेट के कारण हुआ करता है। टिड्डी दल का हमला, कीटों के प्रकोप को भी प्राकृतिक आपदा में शामिल किया गया है। ज्वालामुखी, भूकम्प, सुनामी, बाढ़, दावानल, टायफून, बवंडर, चक्रवात, भूस्खलन तेज गति वाली आपदाएं हैं। दूसरी ओर सूखा, कीटों का प्रकोप और अग्निकांड धीमी गति वाली आपदाओं में शामिल की जाती हैं।
ग्रंथ सहायक संदर्भ
भूकम्प - सुदर्शन कुमार भाटिया
आपदा प्रबंधन: जरूरी है इच्छाशक्ति- सतीश चन्द्र सक्सेना
पत्रिकाऐं-  
 योजना जून 2009
कुरूक्षेत्र  फरवरी  2005
कुरूक्षेत्र  अगस्त 2009
इडियान्यूज-2009
डायलाग इन्डिया नवम्बर 2009
सिविल सर्विसेज टाइम्स अक्टूबर 2005
समाचार  पत्र
हिन्दुस्तान, सोमवार, 2 नवम्बर 2010
रोजगार समाचार, अक्टूबर 2010

अमर उजाला- 10 अक्टूबर






शुक्रवार, 15 मई 2015

सामुदायिक रेडियो : एक नए युग की शुरुआत

मीडिया विस्फोट के इस दौर में जहाँ एक ओर भारतीय उपग्रह चैनल आपसी प्रतिस्पदर्धा में सिर्फ बाज़ार को दृष्टिगत रखते हुए, कार्यक्रमों का प्रसारण कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर निजी एफएम चैनलों की भीड़ फिल्संगीत और पॉप म्यूज़िक का प्रसारण कर राजस्व कमाने की होड़ में जुटी है। आकाशवाणी अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता को स्वीकारता है किन्तु राजस्व अर्जन के बढ़ते दबाव के चलते आकाशवाणी ज़बरदस्त बदलाव के दौर से गुज़र रहा है । आम भारतीय की स्थानीय समस्याओं और हितों को दृष्टिगत रखते हुए आकाशवाणी द्वारा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के प्रसारण के साथ- साथ देश भर में स्थानीय स्तर पर कई 'लोकल रेडियो स्टेशन' आरम्भ किए गए । देश भर में बिछे रेडियो चैनलों के जाल के बावजूद लगातार यह महसूस किया जाता रहा कि कुछ है जो छूट रहा है, छोटे समुदायों के प्रसारण हितों और अधिकारों का पूर्णतया संरक्षण नहीं हो पा रहा है। सम्भवत: इसीलिए भारत में सामुदायिक रेडियो को वैधानिक मान्यता मिलते ही कई समुदायों का ध्यान इस ओर गया है।

सामुदायिक रेडियो को किसी एक परिभाषा में बाँधना सम्भव नहीं है। प्रत्येक देश के संस्कृति सम्बन्धी क़ानूनों में अन्तर होने के कारण देश और काल के साथ इसकी परिभाषा बदल जाती है। किन्तु मोटे तौर पर किसी छोटे समुदाय द्वारा संचालित कम लागत वाला रेडियो स्टेशन जो समुदाय के हितों, उसकी पसंद और समुदाय के विकास को दृष्टिगत रखते हुए ग़ैरव्यावसायिक प्रसारण करता है, सामुदायिक रेडियो केन्द्र कहलाता है। ऐसे रेडियो केन्द्र द्वारा कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, समाज कल्याण, सामुदायिक विकास, संस्कृति सम्बन्धी कार्यक्रमों के प्रसारण के साथ-साथ समुदाय के लिए तात्कालिक प्रासंगिता के कार्यक्रमों का प्रसारण किया जा सकता है। सामुदायिक केन्द्र का उद्देशय समुदाय के सदस्यों को शामिल कर समुदाय के लिए कार्य करना है।

सामुदायिक रेडियो की शुरूआत अमरीका में बीसवी सदी के चौथे दशक में हो गई थी। इसके पूर्व तीसरे दशक में, डेविड आर्मस्ट्राँग, एफएम प्रसारण का अविष्कार कर रेडियो प्रसारण के एक नए युग का सूत्रपात कर चुके थे। अपने शुरूआती दिनों में अमरीकी रेडियो का स्वरूप मुख्यतया व्यावसायिक था। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन द्वारा एफएम बैंड की निचली आवृतियों (881 मेगा हर्ट्ज़ से 919 मेगा हार्ट्ज़ तक) शैक्षणिक रेडियो के लिए सुरक्षित रखने का प्रावधान किया गया। एफएम रेडियो की संभावनाओं को पहचानने का यह पहला प्रयास था। एफएम रेडियो तकनीक की सुविधाजनक प्रणाली और इसकी कम लागत को देखते हुए भविष्य दृष्टाओं को इसमें एक ओर संभावना नज़र आई सामुदायिक रेडियो केन्द्र की संभावना । सामुदायिक रेडियो की कल्पना ने जब साकार रूप लिया तो यह संचार के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी क़दम सिद्ध हुआ

पहला सामुदायिक रेडियो केन्द्र 'वेस्ट कोस्ट' में लुइस हिल नाम के मशहूर पत्रकार द्वारा आरम्भ किया गया। 1946 में इससे जुड़े प्रसारणकर्ताओं ने ''पेसिफिका फाउंडेशन'' की स्थापना की। विश्व युद्ध के पश्चात् उस समय विभिन्न राष्ट्रों के बीच समझ पैदा करने को आवश्यकता महसूस की जा रही थी।इसी उद्देश्य से पेसेफिका फाउंडेशन ने सामुदायिक रेडियो प्रसारण आरम्भ किया। इस फाउंडेशन से जुड़े शांतिप्रिय बुद्धिजीवी इस बात से भली भाँति परिचित थे कि रेडियो के प्रायोजक इसके कार्यक्रमों को अपने हितों के अनुरूप प्रभावित कर सकते हैं अत: यह निर्णय लिया गया कि श्रोताओं की सहायता से ही केन्द्र का व्यय वहन किया जाएगा। आवश्यक राशि जुटाने के बाद फाउंडेशन ने बर्कले, कैलिफोर्निया से 15 अप्रैल 1949 को प्रसारण आरम्भ कर दिया। इस रेडियो केन्द्र से आज भी प्रसारण हो रहा है और अपनी तरह का यह सबसे पुराना रेडियो केन्द्र है। लेटिन अमरीकी देश बोलीविया में खदान श्रमिकों द्वारा 1949 में आरम्भ किया गया रेडियो केन्द्र, सामुदायिक रेडियो का अनूठा उदाहरण है। बोलीविया अपनी चाँदी एवम् टिन की खानों के लिए एक समय विश्व प्रसिद्ध था। शहरों से मीलों दूर इन खानों में हज़ारों श्रमिक कार्य करते थे। इनके लिए मनोरंजन और संचार के माध्यमों का नितांत अभाव था। इन श्रमिकों ने अपने वेतन का एक भाग संचित कर उस राशि से एक रेडियो केन्द्र स्थापित किया । प्रसारण की लोकप्रियता इस कदर बढ़ी कि इसने स्थानीय पत्र और तार सेवा के महत्व को तक कम दिया। श्रमिकों के संदेश सांस्कृतिक गतिविधियों की सूचना आपातकालीन उदघोषणाएं , सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों सम्बन्धी जानकारियों के साथ-साथ ट्रेड यूनियन और सरकार के बीच संवाद के समाचार प्रसारित होने लगे। कुछ ही वर्षों में बोलीविया में ऐसे 26 सामुदायिक रेडियो केन्द्रों से प्रसारण आरम्भ हो गया। सैन्य शासन के दौरान कई बार इन केन्द्रों को कुचल दिया गया किन्तु इस विचार में इतनी शक्ति थी कि ये बार-बार उठ खड़ा हुआ । इंग्लैंड में कम्युनिटी रेडियो का विचार उन अवैधानिक रेडियो स्टेशनों से आरम्भ हुआ जो सत्तर के दशक में बरमिंघम, बिस्टल, लंदन और मैनचेस्टर में ऐफ्रो-कैरिबियाई अप्रवासियों द्वारा आरम्भ किए गए। हालांकि ब्रिटिश सरकार ने इन्हें 'पाइरेट रेडियो' की संज्ञा दी थी किन्तु अवैधानिक होने के बावजूद इन केन्द्रों ने कम्युनिटी रेडियो की शक्ति को सिद्ध कर दिया
में सामुदायिक रेडियो की आधारशिला सर्वोच्च न्यायालय ने 1995 में रखी जब उसने अपने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में यह कहा कि 'रेडियो तरंगे लोक सम्पति हैं'। अन्नामलाई विश्वविद्यालय , चेन्नई का 'अन्ना एफएम' भारत का पहला कैम्पस कम्युनिटी रेडियो केन्द्र बना, जिसका प्रसारण 01 फरवरी 2004 से आरम्भ हुआ। इसे ई अम आर सी ।द्वारा संचालित किया जाता है। 16 नवम्बर 2006 को भारत सरकार द्वारा एक नई कम्युनिटी रेडियो नीति को अधिसूचित किया गया । इसके अनुसार ग़ैरव्यावसायिक संस्थायें, जैसे स्वयंसेवी संस्थायें, कृषि विश्वविद्यालय ,सामाजिक संस्थायें, भारतीय कृषि अनुसंधान की संस्थायें, कृषि विज्ञान केन्द्र तथा शैक्षणिक संस्था कम्युनिटी रेडियो के लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकती हैं । ऐसी कोई भी संस्था, जो व्यावसायिक, राजनैतिक, आपराधिक गतिविधियों से सम्बद्ध हो या जिसे केन्द्र अथवा राज्य सरकार द्वारा अवैध घोषित किया गया हो, कम्युनिटी रेडियो खोलने की हक़दार नहीं है। व्यष्टि या व्यक्ति विशेष को भी यह अधिकार प्राप्त नहीं है। ऐसी पंजीकृत संस्थायें जो कम से कम तीन वर्षों से सामुदायिक सेवा के क्षेत्र में कार्य कर रही हों, कम्युनिट रेडियो के लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकती हैं । इसके लिए कोई लाइसेंस फीस देय नहीं है । आवेदक को रु 2500- क़े मामूली प्रोसेसिंग शुल्क के अतिरिक्त रु 25,000- क़ी बैंक गारंटी जमा करनी होती है । लाइसेंस मिलने पर इन्हें 100 वॉट के एफएम ट्रांसमिटर के ज़रिए प्रसारण करने की अनुमति मिलती है । इसका एंटेना अधिकतम 30 मीटर ऊँचाई तक स्थापित किया जा सकता है । ऐसे ट्रांसमीटर की पहुँच 12 किमी क़े घेरे तक सीमित होती है । केन्द्रों को अपने आधे कार्यक्रम यथासंभव स्थानीय भाषा या बोली में, स्थानीय स्तर पर ही बनाने होते हैं। भारत में निजी एफएम और कम्युनिटी रेडियो पर अब तक समाचारों के प्रसारण की अनुमति नहीं हैं। एक घंटे के प्रसारण समय में पाँच मिनट के विज्ञापन बजाए जा सकते हैं। प्रायोजित कार्यक्रमों के प्रसारण की अनुमति नहीं है किन्तु राज्य अथवा केन्द्र सरकार से प्रायोजित कार्यक्रम प्राप्त होने की दशा में इन्हें प्रसारित किया जा सकता है । आने वाले कुछ वर्षों में भारत भर में लगभग चार हज़ार कम्युनिटी रेडियो केन्द्र खोले जाने का अनुमान है मीडिया का निजीकरण और पूर्णत: स्वतंत्र मीडिया आम भारतीय के लिए मायने नहीं रखता। आज भी भारत, गाँव में बसता है और भारतीय ग्रामीणों की प्रसारण आवश्कताओं की पूर्ति बड़े प्रसारक नहीं कर सकते। जिस देश में बहुत कम दूरियों पर लोगों की ज़रूरतें, भाषा और संस्कृति बदल जाती हो वहाँ यह संभव भी नहीं है। सामुदायिक रेडियो, सामुदायिक कल्याण, पर्यावरण जागरूकता, विविधता में एकता ओर समग्र विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकता है। यही नहीं कुछ और स्वतंत्रता मिलने पर यह छोटे-छोटे केन्द्र प्रजातंत्र को उसका सही अर्थ प्रदान कर सकते हैं। (साभार- संवाद समय)