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रविवार, 27 सितंबर 2015

कुपोषण एवं गरीबी उन्मूलन का एक सशक्त प्रयास: खाद्य सुरक्षा योजना

कुपोषण एवं गरीबी उन्मूलन का एक सशक्त प्रयास: खाद्य सुरक्षा योजना
            हमारे देश की 74 प्रतिशत जनसंख्या गाँव में निवास करती है । ग्रामीण जनसंख्या को विकास की उत्तम व्यवस्था के लिए सरकार द्वारा समय-समय नित नए-नए पर प्रयोग होते रहते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वर्ष 2009 में लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुये कहा था कि हमारी सरकार भारत की पूरी जनता को उनकी मूलभूत सुविधाएं जैसे रोटी कपड़ा और मकान देने पर अमादा है और इस कार्य के लिए हमेशा प्रतिबद्ध रहेगी । ग्रामीण जनसमान्य को ध्यान में रखकर सरकार ने भोजन की मूलभूत जरूरत को पूरा करने के लिए समय समय पर महत्वपूर्ण कदम उठाये है। सरकार की विभिन्न विकासपरक योजनाओं जैसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, अन्नत्योदय योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन योजना आदि अनेक योजनाएँ हैं, जो मूल रूप में रोजगार व स्वास्थ्य से लेकर स्वस्थ भोजन तक के लिए प्रतिबद्ध हैं। उसी कड़ी में मूलरूप से ग्रामीण सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध है, खाद्य सुरक्षा योजना। ग्रामीण जनता के लिए सरकार ने कुपोषण और भुखमरी से निपटने के लिए इस योजना के रूप सम्मान जनक व ठोस कदम उठाया है ।
            खाद्य सुरक्षा योजना से लाखों परिवार को सुकून से एक सम्पूर्ण भोजन संभव हो रहा है। पहले के संदर्भ में खाद्य सुरक्षा का अर्थ भरपेट भोजन था, परंतु आज के संदर्भ में जिस प्रकार विकास के नए प्रतिमान स्थापित हो रहे हैं।  यह कहना गलत नहीं होगा कि खाद्य सुरक्षा का आशय भौतिक आर्थिक और सामाजिक पहुँच के अलावा संतुलित आहार, साफ पानी, स्वच्छ वातावरण व प्राथमिक स्वस्थ्य तक जा पहुंचा है। भारत सरकार खाद्य सुरक्षा के लिए हमेशा से प्रयासरत रही है। खाद्यान्न तथा इससे संबधित क्षेत्रों के विकास के लिए सरकार ने अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया ताकि कृषि व्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव दिखे।
            भारत में कुपोषण और गरीबी एक सबसे बड़ी चुनौती है, जिसे खत्म करने के लिए सरकार ने खाद्य सुरक्षा कानून तैयार किया है। इस योजना से भारत के प्रत्येक नागरिक को भरपेट भोजन का कानूनी हक प्राप्त हो गया है। इसके लिए विधेयक में कारगर प्रावधान किए गए हैं, ताकि बिना अतिरिक्त बोझ के यह योजना निर्बाध रूप से चल सके। इस योजना में सरकार पर आर्थिक खर्च के बारे में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री रीतिका खेड़ा, जी ने लिखा है कि इस बिल के तहत तीन योजनाएं पहले ही चालू हैं, जिन पर सरकार पैसे खर्च कर रही है। इस विधेयक द्वारा सरकार पर जो खर्च बढ़ेगा वह केवल 30 हज़ार करोड़ का है, यही सरकार पाँच लाख करोड़ रूपये का टैक्स माफ करती है। अगर यह टैक्स माफी अगर बंद  कर दी जाय तो आसानी से यह खर्च निकाल सकता है।  
योजना के निर्माण के समय ऐसा माना जा रहा था कि इस विधेयक से किसानों, विशेष तौर पर छोटे और मझौले किसानों की खेती करने में कम रूचि कम होगी, लेकिन अब योजना किसानों को वरदान के रूप में साबित हो रही है, क्योंकि खाद्यान्नों का उत्पादन किसानों के लिए आजीविका का एक माध्यम है, जिसके लिए उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य की पंहुच हर वर्ष बढ़ रही है और विधेयक के लागू होने के फलस्वरूप आवश्यकता बढ़ने के कारण ज्यादा से ज्यादा किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे में आएंगे। इसलिए किसानों को हतोत्साहित करने के बजाय विधेयक किसानों को अधिक उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करेगा। इसके अतिरिक्त सस्ती दरों पर खाद्यान्न मिलने से छोटे किसानों की सीमित आमदनी पर बोझ कम होगा और वो बचायी हुई रकम को अन्य आवश्यकताओं पर खर्च कर अपने जीवनस्तर में सुधार कर सकेंगे।   
क्या है खाद्य सुरक्षा योजना?
            इस योजना के तहत देश की करीब दो तिहाई आबादी को लाभ मिलने की उम्मीद है।  योजना के मुताबिक गरीबों को 2 रुपए किलो गेहूं, 3 रुपए किलो चावल और 1 रुपए किलो मोटा अनाज राशन दुकानों के माध्यम से दिया जा रहा है।  एक परिवार को हर माह 25 ‍किलो अनाज मिलेगा। गांवों की 75 फीसदी और शहरों में करीब 50 फीसदी आबादी तक यह योजना पहुंचने की उम्मीद है।  इस योजना को फिलहाल 3 साल के लिए लागू करने की बात कही जा रही है।
कितना और क्या देगी सरकार ?
            खाद्य सुरक्षा योजना के अंतर्गत मिड डे ‍मील, आईसीडीएस भी शामिल हो जाएंगे। अनुमान के मुताबिक इस योजना के लागू होने से सरकार को प्रतिवर्ष 1 लाख 24 करोड़ रुपए की ‍सब्सिडी देनी होगी।  एक किलो चावल पर 23.50 और गेहूं पर प्रति किलो 18 रुपए की सब्सिडी दी जा रही है। 3 साल में करीब 6 लाख करोड़ की सब्सिडी दिए जाने का अनुमान है।  
            आज इस योजना को जनमानस में लागू करने के लिए लगभग पर्याप्त खाद्यान्न उपलब्ध है। प्रति वर्ष अन्य लाभकारी योजनाओं के लिए खाद्यान्न की कुल मि‍लाकर 612.3 लाख टन खाद्यान्न की आवश्यकता होगी। खाद्यान्नों की खऱीद (गेंहू और चावल) जिसमें कुल मात्रा और उत्पादन का प्रतिशत शामिल है, उसमें हाल के वर्षों में प्रगति हुई है। औसतन खाद्यान्न की वार्षिक खऱीद जो वर्ष 2000-2001 से 2006-07 के दौरान कुल औसतन वार्षिक उत्पादन के 24.30 प्रतिशत के आधार पर 382.2 लाख टन थी वो वर्ष 2011-12 के दौरान औसतन वार्षिक उत्पादन 33.24 प्रतिशत कर 602.4 लाख टन पर पहुंच गई। इसलिए वर्तमान में खाद्यान्नों के उत्पादन और इसकी खरीद के आधार पर आवश्यकता पूरी की जा सकेगी। यहां तक कि वर्ष 2012-13 के दौरान खाद्यान्न के उत्पादन में हल्की कमी होने के अनुमान के बावजूद विधेयक की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकेगा।
            इस योजना को दो चरणों में लागू किया जाएगा। पहले चरण में 5.21 लाख परिवारों को शामिल किया गया है। इसमें गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) जीवन बसर करने वाले परिवार, एपीएल राशनकार्ड धारकों और अंत्योदय अन्न योजना के लाभार्थियों को शामिल किया जाएगा. वर्तमान में टीपीडीएस के अंतर्गत गरीबी रेखा से नीचे के 6.52 करोड़ परिवारों को अनाज दिया जाता है, जिसमें 2.50 करोड़ परिवार अंत्‍योदय अन्न योजना (एएवाई) भी शामिल है। इसके लिए भारत के महापंजीयक के 1999-2000 के लिए जनसंख्या के अनुमानों और योजना आयोग के वर्ष 1993-94 के आधार  पर निर्धन लोगों के 36 प्रतिशत होने को आधार माना गया है। शेष परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल) के अंतर्गत अनाज दिया जाता है। एएवाई और बीपीएल परिवारों को प्रति माह 35 किलो अनाज दिया जाता है। एपीएल परिवारों को अनाज इसकी उपलब्‍धता के आधार पर दिया जाता है। केंद्रीय वितरण मूल्य (सीआईपी) गेहूं/चावल प्रति किलो एएवाई को रूपए 2/3, बीपीएल परिवारों को 4.15/5.65 रूपए और एपीएल परिवारों को 6.10/8.30 रूपए की दर से दिया जाता है।

यहां यह उल्लेखनीय है कि वर्तमान में कुल प्रस्तावित परिवारों में से एक-चौथाई को ही 35 किलो प्रति परिवार के आधार पर नियत खाद्यान्न दिया जा रहा है। वहीं एनएफएसबी में अखिल भारतीय स्तर पर कुल जनसंख्या के 67 फीसदी हिस्से को 5 किलो खाद्यान्न देने का प्रस्ताव किया गया है। इसमें एएवाई परिवारों को, जो निर्धन में निधर्नतम हैं, को 35 किलो प्रति परिवार प्रति माह खाद्यान्न सुनिश्चित किया गया है। इसके साथ ही टीपीडीएस में अध्यादेश के तहत सभी परिवारों को वर्तमान के एएवाई मूल्यों के समान गेंहूं 3 रूपए और  चावल 2 रूपए की दर से दिया जाएगा। परिणाम स्वरूप वर्तमान में बीपीएल श्रेणी में आने वाले परिवार जिन्हें खाद्यान्न की मात्रा कम मिलेगी, उन्हें सब्सिडी दरों पर अनाज मिलने का फायदा मिलेगा।
खाद्य सुरक्षा योजना में प्रावधान
            योजना के तहत देश की 63.5 प्रतिशत आबादी को सस्ते दामों में अनाज मुहैया कराया जा रहा है।  खाद्य सुरक्षा विधेयक का बजट पिछले वित्तीय वर्ष के 63000 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 95000 करोड़ रुपए किया गया है। कृषि उत्पाद बढ़ाने के लिए 110000 करोड़ रुपए का निवेश प्रस्ताव भी अपेक्षित है।
खाद्य सुरक्षा योजना खास पहलू-
खाद्य सुरक्षा योजना से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण बिंदु निम्नलिखित हैं-
·       इस बिल के तहत 3 सालों तक चावल 3 रुपये किलो, गेहूं 2 रुपये किलो और मोटा अनाज 1 रुपये किलो देने का प्रावधान है।
·       योजना का लाभ पाने का हकदार कौन होगा, ये तय करने की जिम्मेदारी केंद्र ने राज्य सरकारों पर छोड़ दी है।
·       घर की सबसे बुजुर्ग महिला को परिवार का मुखिया माना जाएगा।
·       गर्भवती महिला और बच्चों को दूध पिलाने वाली महिलाओं को भोजन के अलावा अन्य मातृत्व लाभ (1000 रुपये) भी मिलेंगे।
·       योजना को लागू करने के लिए सरकार को इस वर्ष (2013-14) 612.3 लाख टन अनाज की जरूरत होगी।
·       केंद्र को अनाज के खरीद एवं वितरण के लिए 1.25 लाख करोड़ रुपये खर्च करने होंगे।
·       गांवों की 75 फीसदी और शहरों की 50 फीसदी आबादी इस योजना के दायरे में आएगी।
·       अगर राज्य सरकार सस्ता अनाज नहीं दे पाई तो केंद्र द्वारा मदद मुहैया कराई जाएगी।
·        6 से 14 वर्ष तक की आयु वाले बच्चों को आईसीडीएस और मिड-डे-मील योजना का लाभ मिलेगा।
·       शिकायतों को दूर करने के लिए सभी राज्यों को फूड पैनल या आयोग बनाना होगा. अगर कोई कानून का पालन नहीं करता तो आयोग उस पर कार्रवाई हो सकती है।
राज्य सरकार का दायित्व व कार्य-
 विधेयक को कार्यान्वित करने से पहले कुछ प्रारंभिक कार्य किया जाना आवश्यक है। उदाहरण के लिए नियमावली के तहत टीडीपीएस के अंतर्गत प्रत्येक राज्य और संघ शासित प्रदेशों में घरों की वास्तविक पहचान की जानी है। इसलिए राज्य सरकारों को इनकी पहचान के लिए उचित मानक बनाने और उसके बाद पहचान का वास्तविक कार्य करने की आवश्यकता है। विधेयक के तहत लाभार्थी घरों की पहचान पूरी होने के बाद ही खाद्यन्न का आवंटन और वितरण किया जा सकता है। इसलिए विधेयक में पहचान के कार्य के प्रारंभ होने के बाद इसे 180 दिनों में पूरा किए जाने का प्रावधान किया गया है। यह अवधि हर राज्य में अलग-अलग हो सकती है और यदि कोई राज्य इसे पहले लागू करना चाहता है तो उसे इसके लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
विधेयक को जारी करने के लिए इसमें वर्तमान में राज्य में लागू योजना और दिशानिर्देश आदि के जारी रहने के अस्थायी प्रावधान किए गए हैं। विधेयक में शिकायतें दूर करने के लिए जिला और राज्य स्तर पर एक प्रभावी और स्वतंत्र शिकायत निवारण प्रणाली का प्रावधान किया गया है। इसमें हर जिले के लिए पात्रता लागू करने और शिकायतें की जांच करने और दूर करने के लिए जिला शिकायत निवारण अधिकारी शामिल है। इसके अतिरिक्त पात्रता के उल्लंघन होने संबधी शिकायत प्राप्त होने या स्वयं से जांच करने के लिए राज्य खाद्य आयोग की स्थापना करने का भी प्रावधान है। आयोग डीजीआरओ के आदेशों के विरूद्ध सुनवाई करेगा और उसे दंड लगाने की शक्ति भी दी जाएगी। कोई भी शिकायतकर्ता इनका रूख कर सकता है।
    
 हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड और अरूणाचल प्रदेश में लागू हो गई योजना- 
            खाद्य सुरक्षा योजना पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती पर आज चार राज्यों  हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड और अरूणाचल प्रदेश में लागू हो गई। यहाँ पर यह योजना मुख्य रूप से अपनी भूमिका का निर्वहन कर रही है ।
निष्कर्ष –
कुपोषण एक गंभीर समस्या है जिसका पूरा देश सामना कर रहा है। लेकिन यह कहना गलत होगा कि योजना  में इसे पूरी तरह से नकारा गया है। इसमें गर्भवती महिलाओं और बच्चों के बीच कुपोषण की समस्या पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी है जो हमारी इस समस्या के समाधान की रणनीति‍ का केंद्रबिंदु होगा।
      महिलाओं और बच्चों को पोषण प्रदान करने पर विधेयक में खास ध्यान दिया गया है। गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माताओं को निर्धारित पोषकता मानकों के तहत पौष्टिक भोजन का अधिकार देने के साथ-साथ कम से कम 1000 रूपए के मातृत्व लाभ भी मिलेंगे।
6 माह से 6 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को घर में भोजन ले जाने या निर्धारित पोषकता मानकों के तहत गर्म पका हुआ भोजन पाने का अधिकार होगा। इसी आयु वर्ग के कुपोषण के शिकार बच्चों के लिए उच्च पोषकता मानक निर्धारित किए गए हैं। निचली और उच्च प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को निर्धारित पोषकता मानकों के तहत विद्यालयों में पोषक आहार दिया जाएगा।

 (यह आलेख प्रतियोगिता दर्पण के नवंबर 2014 अंक में प्रकाशित हुआ है। )

शुक्रवार, 26 जून 2015

मनोज कुमार गुप्ता स्त्री अध्ययन विषय में सीबीएसई-नेट परीक्षा उत्तीर्ण

मनोज कुमार गुप्ता स्त्री अध्ययन विषय में सीबीएसई-नेट परीक्षा उत्तीर्ण

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के स्त्री अध्ययन विभाग में अध्ययनरत पीएच.डी. शोधार्थी मनोज कुमार गुप्ता ने दिसंबर 2014 को सीबीएसई द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) में सफलता हासिल की। इसी सत्र में शोधार्थी को सीडब्ल्यूडीएस-आईसीएसएसआर डॉक्टोरल रिसर्च फ़ेलोशिप भी स्वीकृत हुई है। शोधार्थी की सफलता पर विभाग की प्रभारी अध्यक्ष डॉ. सुप्रिया पाठक, प्रोफ़ेसर शंभु गुप्त तथा सहायक प्रोफ़ेसर अवंतिका शुक्ला ने बहुत-बहुत बधाई दी है। इस सफलता पर मित्रों ने भी बधाई संप्रेषित किया है।  

शुक्रवार, 15 मई 2015

सामुदायिक रेडियो : एक नए युग की शुरुआत

मीडिया विस्फोट के इस दौर में जहाँ एक ओर भारतीय उपग्रह चैनल आपसी प्रतिस्पदर्धा में सिर्फ बाज़ार को दृष्टिगत रखते हुए, कार्यक्रमों का प्रसारण कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर निजी एफएम चैनलों की भीड़ फिल्संगीत और पॉप म्यूज़िक का प्रसारण कर राजस्व कमाने की होड़ में जुटी है। आकाशवाणी अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता को स्वीकारता है किन्तु राजस्व अर्जन के बढ़ते दबाव के चलते आकाशवाणी ज़बरदस्त बदलाव के दौर से गुज़र रहा है । आम भारतीय की स्थानीय समस्याओं और हितों को दृष्टिगत रखते हुए आकाशवाणी द्वारा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के प्रसारण के साथ- साथ देश भर में स्थानीय स्तर पर कई 'लोकल रेडियो स्टेशन' आरम्भ किए गए । देश भर में बिछे रेडियो चैनलों के जाल के बावजूद लगातार यह महसूस किया जाता रहा कि कुछ है जो छूट रहा है, छोटे समुदायों के प्रसारण हितों और अधिकारों का पूर्णतया संरक्षण नहीं हो पा रहा है। सम्भवत: इसीलिए भारत में सामुदायिक रेडियो को वैधानिक मान्यता मिलते ही कई समुदायों का ध्यान इस ओर गया है।

सामुदायिक रेडियो को किसी एक परिभाषा में बाँधना सम्भव नहीं है। प्रत्येक देश के संस्कृति सम्बन्धी क़ानूनों में अन्तर होने के कारण देश और काल के साथ इसकी परिभाषा बदल जाती है। किन्तु मोटे तौर पर किसी छोटे समुदाय द्वारा संचालित कम लागत वाला रेडियो स्टेशन जो समुदाय के हितों, उसकी पसंद और समुदाय के विकास को दृष्टिगत रखते हुए ग़ैरव्यावसायिक प्रसारण करता है, सामुदायिक रेडियो केन्द्र कहलाता है। ऐसे रेडियो केन्द्र द्वारा कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, समाज कल्याण, सामुदायिक विकास, संस्कृति सम्बन्धी कार्यक्रमों के प्रसारण के साथ-साथ समुदाय के लिए तात्कालिक प्रासंगिता के कार्यक्रमों का प्रसारण किया जा सकता है। सामुदायिक केन्द्र का उद्देशय समुदाय के सदस्यों को शामिल कर समुदाय के लिए कार्य करना है।

सामुदायिक रेडियो की शुरूआत अमरीका में बीसवी सदी के चौथे दशक में हो गई थी। इसके पूर्व तीसरे दशक में, डेविड आर्मस्ट्राँग, एफएम प्रसारण का अविष्कार कर रेडियो प्रसारण के एक नए युग का सूत्रपात कर चुके थे। अपने शुरूआती दिनों में अमरीकी रेडियो का स्वरूप मुख्यतया व्यावसायिक था। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन द्वारा एफएम बैंड की निचली आवृतियों (881 मेगा हर्ट्ज़ से 919 मेगा हार्ट्ज़ तक) शैक्षणिक रेडियो के लिए सुरक्षित रखने का प्रावधान किया गया। एफएम रेडियो की संभावनाओं को पहचानने का यह पहला प्रयास था। एफएम रेडियो तकनीक की सुविधाजनक प्रणाली और इसकी कम लागत को देखते हुए भविष्य दृष्टाओं को इसमें एक ओर संभावना नज़र आई सामुदायिक रेडियो केन्द्र की संभावना । सामुदायिक रेडियो की कल्पना ने जब साकार रूप लिया तो यह संचार के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी क़दम सिद्ध हुआ

पहला सामुदायिक रेडियो केन्द्र 'वेस्ट कोस्ट' में लुइस हिल नाम के मशहूर पत्रकार द्वारा आरम्भ किया गया। 1946 में इससे जुड़े प्रसारणकर्ताओं ने ''पेसिफिका फाउंडेशन'' की स्थापना की। विश्व युद्ध के पश्चात् उस समय विभिन्न राष्ट्रों के बीच समझ पैदा करने को आवश्यकता महसूस की जा रही थी।इसी उद्देश्य से पेसेफिका फाउंडेशन ने सामुदायिक रेडियो प्रसारण आरम्भ किया। इस फाउंडेशन से जुड़े शांतिप्रिय बुद्धिजीवी इस बात से भली भाँति परिचित थे कि रेडियो के प्रायोजक इसके कार्यक्रमों को अपने हितों के अनुरूप प्रभावित कर सकते हैं अत: यह निर्णय लिया गया कि श्रोताओं की सहायता से ही केन्द्र का व्यय वहन किया जाएगा। आवश्यक राशि जुटाने के बाद फाउंडेशन ने बर्कले, कैलिफोर्निया से 15 अप्रैल 1949 को प्रसारण आरम्भ कर दिया। इस रेडियो केन्द्र से आज भी प्रसारण हो रहा है और अपनी तरह का यह सबसे पुराना रेडियो केन्द्र है। लेटिन अमरीकी देश बोलीविया में खदान श्रमिकों द्वारा 1949 में आरम्भ किया गया रेडियो केन्द्र, सामुदायिक रेडियो का अनूठा उदाहरण है। बोलीविया अपनी चाँदी एवम् टिन की खानों के लिए एक समय विश्व प्रसिद्ध था। शहरों से मीलों दूर इन खानों में हज़ारों श्रमिक कार्य करते थे। इनके लिए मनोरंजन और संचार के माध्यमों का नितांत अभाव था। इन श्रमिकों ने अपने वेतन का एक भाग संचित कर उस राशि से एक रेडियो केन्द्र स्थापित किया । प्रसारण की लोकप्रियता इस कदर बढ़ी कि इसने स्थानीय पत्र और तार सेवा के महत्व को तक कम दिया। श्रमिकों के संदेश सांस्कृतिक गतिविधियों की सूचना आपातकालीन उदघोषणाएं , सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों सम्बन्धी जानकारियों के साथ-साथ ट्रेड यूनियन और सरकार के बीच संवाद के समाचार प्रसारित होने लगे। कुछ ही वर्षों में बोलीविया में ऐसे 26 सामुदायिक रेडियो केन्द्रों से प्रसारण आरम्भ हो गया। सैन्य शासन के दौरान कई बार इन केन्द्रों को कुचल दिया गया किन्तु इस विचार में इतनी शक्ति थी कि ये बार-बार उठ खड़ा हुआ । इंग्लैंड में कम्युनिटी रेडियो का विचार उन अवैधानिक रेडियो स्टेशनों से आरम्भ हुआ जो सत्तर के दशक में बरमिंघम, बिस्टल, लंदन और मैनचेस्टर में ऐफ्रो-कैरिबियाई अप्रवासियों द्वारा आरम्भ किए गए। हालांकि ब्रिटिश सरकार ने इन्हें 'पाइरेट रेडियो' की संज्ञा दी थी किन्तु अवैधानिक होने के बावजूद इन केन्द्रों ने कम्युनिटी रेडियो की शक्ति को सिद्ध कर दिया
में सामुदायिक रेडियो की आधारशिला सर्वोच्च न्यायालय ने 1995 में रखी जब उसने अपने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में यह कहा कि 'रेडियो तरंगे लोक सम्पति हैं'। अन्नामलाई विश्वविद्यालय , चेन्नई का 'अन्ना एफएम' भारत का पहला कैम्पस कम्युनिटी रेडियो केन्द्र बना, जिसका प्रसारण 01 फरवरी 2004 से आरम्भ हुआ। इसे ई अम आर सी ।द्वारा संचालित किया जाता है। 16 नवम्बर 2006 को भारत सरकार द्वारा एक नई कम्युनिटी रेडियो नीति को अधिसूचित किया गया । इसके अनुसार ग़ैरव्यावसायिक संस्थायें, जैसे स्वयंसेवी संस्थायें, कृषि विश्वविद्यालय ,सामाजिक संस्थायें, भारतीय कृषि अनुसंधान की संस्थायें, कृषि विज्ञान केन्द्र तथा शैक्षणिक संस्था कम्युनिटी रेडियो के लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकती हैं । ऐसी कोई भी संस्था, जो व्यावसायिक, राजनैतिक, आपराधिक गतिविधियों से सम्बद्ध हो या जिसे केन्द्र अथवा राज्य सरकार द्वारा अवैध घोषित किया गया हो, कम्युनिटी रेडियो खोलने की हक़दार नहीं है। व्यष्टि या व्यक्ति विशेष को भी यह अधिकार प्राप्त नहीं है। ऐसी पंजीकृत संस्थायें जो कम से कम तीन वर्षों से सामुदायिक सेवा के क्षेत्र में कार्य कर रही हों, कम्युनिट रेडियो के लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकती हैं । इसके लिए कोई लाइसेंस फीस देय नहीं है । आवेदक को रु 2500- क़े मामूली प्रोसेसिंग शुल्क के अतिरिक्त रु 25,000- क़ी बैंक गारंटी जमा करनी होती है । लाइसेंस मिलने पर इन्हें 100 वॉट के एफएम ट्रांसमिटर के ज़रिए प्रसारण करने की अनुमति मिलती है । इसका एंटेना अधिकतम 30 मीटर ऊँचाई तक स्थापित किया जा सकता है । ऐसे ट्रांसमीटर की पहुँच 12 किमी क़े घेरे तक सीमित होती है । केन्द्रों को अपने आधे कार्यक्रम यथासंभव स्थानीय भाषा या बोली में, स्थानीय स्तर पर ही बनाने होते हैं। भारत में निजी एफएम और कम्युनिटी रेडियो पर अब तक समाचारों के प्रसारण की अनुमति नहीं हैं। एक घंटे के प्रसारण समय में पाँच मिनट के विज्ञापन बजाए जा सकते हैं। प्रायोजित कार्यक्रमों के प्रसारण की अनुमति नहीं है किन्तु राज्य अथवा केन्द्र सरकार से प्रायोजित कार्यक्रम प्राप्त होने की दशा में इन्हें प्रसारित किया जा सकता है । आने वाले कुछ वर्षों में भारत भर में लगभग चार हज़ार कम्युनिटी रेडियो केन्द्र खोले जाने का अनुमान है मीडिया का निजीकरण और पूर्णत: स्वतंत्र मीडिया आम भारतीय के लिए मायने नहीं रखता। आज भी भारत, गाँव में बसता है और भारतीय ग्रामीणों की प्रसारण आवश्कताओं की पूर्ति बड़े प्रसारक नहीं कर सकते। जिस देश में बहुत कम दूरियों पर लोगों की ज़रूरतें, भाषा और संस्कृति बदल जाती हो वहाँ यह संभव भी नहीं है। सामुदायिक रेडियो, सामुदायिक कल्याण, पर्यावरण जागरूकता, विविधता में एकता ओर समग्र विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकता है। यही नहीं कुछ और स्वतंत्रता मिलने पर यह छोटे-छोटे केन्द्र प्रजातंत्र को उसका सही अर्थ प्रदान कर सकते हैं। (साभार- संवाद समय) 


अहसास


                                                                                                मैं विधा नहीं जनता के अंतर्गत...  

अहसास...

मन था अकेला मन में था गुबार
देखी एक छाया हुआ उससे प्यार,
आगे फिर बात बढ़ी किया मैंने इज़हार
इज़हार हुआ कि इकरार ये शायद याद नहीं,
दिल ने धीरे से कहा
इक दूसरे से दूर रहने के मेरे पास वाद नहीं,
छाया बोली दिल उमंग से है भर गया
कोई हवा का झोंका मेरे कान में है कुछ कह गया,
क्या कहा ये मुझे भी याद नहीं

आपसे दूर रहने के मेरे पास वाद नहीं।  
                                                     रामशंकर 'विद्यार्थी'

सोमवार, 11 मई 2015

माध्यमिक शून्यवाद के प्रणेता : आचार्य नागार्जुन

माध्यमिक शून्यवाद के प्रणेता : आचार्य नागार्जुन
रामशंकर ‘विद्यार्थी’
ICSSR डॉक्टोरल रिसर्च फ़ेलो,
म्हटमा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा

नागार्जुन बौद्धाचार्य (जन्म -150 ई; मृत्यु -लगभग 250 ई) भारतीय बौद्ध भिक्षु-दार्शनिक और माध्यमिक (मध्य मार्ग) मत के संस्थापक, जिनकी ‘शून्यता’ (ख़ालीपन) की अवधारणा के स्पष्टीकरण को उच्चकोटि की बौद्धिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धि माना जाता है। बाद के कई बौद्ध मतों ने उन्हें प्राधि-धर्माध्यक्ष माना। दो मौलिक रचनाएं, जो काफ़ी हद तक उनकी हैं और संस्कृत में उपलब्ध रही- मूलमाध्यमिका कारिका (सामान्यत: माध्यमिका कारिका के रूप में जानी जाती) तथा विग्रहव्यवर्तिनी हैं, जो अस्तित्व की उत्पत्ति, ज्ञान के साधन और यथार्थ के स्वरूप पर विचारों का विवेचनात्मक विश्लेषण हैं।
नागार्जुन की जीवन कथा का आंरभिक विवरण चीनी भाषा में उपलब्ध है, जिसे क़रीब 405 ई. में प्रसिद्ध बौद्ध अनुवादक कुमारजीव ने उपलब्ध कराया। यह अन्य चीनी एवं तिब्बती वृत्तांत से सहमत हैं कि नागार्जुन दक्षिण भारत में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। ऐतिहासिक रूप से बचपन की उनकी कथाएं विवादास्प्रद हैं, लेकिन यह संकेत देती हैं कि उनके पास असाधारण बौद्धिक क्षमता थी तथा जब उन्होंने महायान बौद्ध धर्म के सिद्धांतों, जो इस समय पूर्वी एशिया में प्रचलित हैं, के गहन अर्थों को समझा, तब उनमें आध्यात्मिक परिवर्तन हुआ। कुमारजीव के वृत्तांत के अनुसार, नागार्जुन द्वारा बौद्ध धर्म के कुछ मूल विचार कुछ असंतुष्टि से सीखने के बाद एक 'महानाग बोधिसत्व' पर ज्ञान-प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर एक प्रमुख नागराज[1] ने दया दिखाई तथा उन्हें अत्यंत गूढ़ महायान श्लोकों के बारे में बताया। नागार्जुन ने कुछ ही समय में इनमें प्रवीणता हासिल की तथा भारत में सफलतापूर्वक सत्य (धर्म) का प्रचार किया और कई विरोधियों को बौद्धिक-दार्शनिक शास्त्रार्थ में परास्त किया। अनुश्रुत वृतांत यह भी संकेत देते हैं कि वह काफ़ी लंबी उम्र तक जिए तथा इसके बाद उन्होंने अपने जीवन का अंत करने का निर्णय लिया। विभिन्न वृत्तांत नागार्जुन के विभिन्न धार्मिक गुणों का वर्णन करते हैं तथा उनके जीवन का कालांकन 500 से अधिक वर्षों के दायरे में करते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि उपलब्ध संदर्भ कई व्यक्तियों के बारे में हो सकते हैं तथा इनमें कुछ काल्पनिक वृत्तांत भी शामिल होंगे। फिर भी नागार्जुन की जीवनी के विभिन्न तत्वों की पुष्टि एतिहासिक साम्रग्री से होती है। वर्तमान विद्वान संकेत देते हैं कि नागार्जुन 50 ई. और 280 ई. किसी अवधि में रहे होंगे। एक आम राय के मुताबिक़, उनका कालांकन 150-250 ई. है। कुछ पुरातात्विक सबूत : उनके द्वारा सातवाहन वंश के एक राजा, संभवत: यज्ञश्री (173-202) को लिखा एक पत्र (सुहारिल्लेख, ‘मैत्रिपूर्ण पत्र’) इस दावे की पुष्टि करता है कि वह दक्षिण भारत में रहते थे।
नागार्जुन माध्यमिक दर्शन के प्रतिष्ठापक और महायान बौद्ध दर्शन के प्रमुख आचार्य थे। भगवान बुद्ध ने शाश्वत और उच्छेद, सत् और असत्, भाव और अभाव इन दो अन्तों के बीच चलने का उपदेश दिया था। नागार्जुन ने तथागत द्वारा उपदिष्ठ इस मध्यम मार्ग की दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत की और बौद्ध परम्परा में प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धांत का दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत कर जगत को सापेक्ष, फलत: अनुत्पन्न, नि:स्वभाव और स्वभाव शून्य बताते हुए शून्यता के सिद्धांत को शास्त्रीय दृष्टि से प्रस्तुत किया। नागार्जुन ने जीवन एवं उनकी तिथि के विषय में कई प्रकार के प्रवाह और मत प्रचलित हैं। उन मतभेदों का विशद विवरण तो यहाँ सम्भव नहीं है, किन्तु उनके विषय में लंकावतारसूत्र, महामेघसूत्र, महामेरीसूत्र और मज्जुश्रीमूलकल्प में भविष्यवाणियाँ उपलब्ध होती हैं। सभी प्राणियों और परम्पराओं की समीक्षा से ज्ञात होता है कि भारतीय परम्परा में माध्यमिक दर्शन, रसेश्वर दर्शन, तन्त्र तथा आयुर्वेद से सम्बन्ध नागार्जुन नामधारी चार आचार्य हुए। इनमें प्राचीनतम बौद्ध नागार्जुन ही थे, जिनकी तिथि प्राय: ईसवी सन दूसरी शताब्दी के आस पास मानी गयी (146 – 217 ई.) है।
प्रभाव एवं रचनाएं
नागार्जुन का प्रभाव बौद्ध धर्म के माध्यमिक मत के अनुयायियों के ज़रिये जारी रहा। उनकी दार्शनिक स्थितियों की विवेचनात्मक पड़ताल तथा उपदेशात्मक व्याख्या का अध्ययन अब भी कई पूर्वी एशियाई मतों में चीनी बौद्ध धर्मशास्त्र (ता-त्सांग चिंग) के अंग के रूप में किया जाता है। इसी प्रकार तिब्बती बौद्ध धर्मशास्त्र के अंग की तरह बस्तान-ग्यूर में 17 माध्यमिका शोध प्रबंध हैं। इनमें से सभी प्रबंधों का श्रेय नागार्जुन को नहीं दिया और पारंपरिक तौर पर जिनका श्रेय उनको दिया जाता है, संभवत: वे भी उन्होंने नहीं लिखे हैं।
दो मूल रचनाएं, जो काफ़ी हद तक उनकी हैं, इस समय संस्कृत में उपलब्ध हैं; वे हैं- मूलमाध्यमिकाकारिका (माध्यमिका कारिका,’ मध्यम मार्ग के मूल सिद्धांत’) और विग्रहव्यवर्तनी (वाद-विवाद का निवारण), दोंनो सत्ता की उत्पत्ति, ज्ञान के साधन, तथा यथार्थ के स्वरूप के बारे में असत्य विचारों का विवेचनात्मक विश्लेषण है। जिन तीन महत्त्वपूर्ण, माध्यमिका रचनाओं का श्रेय नागार्जुन को दिया जाता है वे वर्तमान में केवल चीनी भाषा में उपलब्ध हैं, ता-चिह-तू-लुन (महाप्रज्ञपारमिता-शास्त्र, 'प्रज्ञा शोध प्रबंधों की महान पराकाषठा'), शी-चू-पी-पा-शा-लुन (दशमूमि-विभाष-शास्त्र, ’10 स्तरीय ग्रंथों की आभा'), तथा शिन-एर्ह-मेन-लुक (द्वादश-द्वार {निकाय} -शास्त्र, '12 प्रवेश मार्ग ग्रंथ') निम्नलिखित रचनाएं केवल तिब्बती धर्मशास्त्र में मिलती हैं तथा कई विद्वान इन्हें नागार्जुन की रचनाएं मानते हैं : रिग्स पा द्रग का पाही त्सिग लेहुर व्यास पा शेस ब्या बा (युक्ति-षष्टिका, 'संयोजन पर 60 छंद'), तोन पा निद दुन कु पाही त्सिग लेहूर ब्यास पा शेस ब्या बा (शुन्यता-सप्तति, 'शून्यता पर 70 छंद') और शिब भो नम्पर ह्तग पा शेस ब्या बहि म्दो (वैदालया-सूत्र, 'वैदालया श्रेणी का पवित्र ग्रंथ')।
माध्यमिक विश्लेषण के श्लोकों के अलावा तिब्बती अनुश्रुति ने कई तांत्रिक (जादुई) एवं चिकित्सा रचनाओं का श्रेय किसी 'नागार्जुन' को दिया है। बाद की भारतीय रचनाओं में नागार्जुन नाम के एक महान सिद्ध या तांत्रिक का ज़िक्र है, जिन्होंने तांत्रिक आचरण, यानी चमत्कारी मंत्रों एवं मंडलों की मदद से जादुई शक्तियां प्राप्त की तथा नियंत्रित आहार और औषधि से अस्तित्व की अभौतिकीय अगत तक पहुंचे। इन कथाओं के साथ एक शक्तिशाली कीमियागर की कहानी भी संबद्ध है, जिन्होंने अन्य उपलब्धियों के आलावा अमरता का अमृत खोज निकाला था। ठोस ऐतिहासिक आंकड़ों के अभाव तथा परस्पर विरोधी वृत्तांतों दूसरी सदी के इस दार्शनिक पर लागू नहीं माना जाता है।
माध्यमिक दार्शनिक के जीवन एवं दृष्टिकोण के बारे में कुछ जानकारी नागार्जुन की रचनाओं से भी मिल सकती है। उनके विवेचनात्मक विश्लेषणात्मक काव्यों और उनके उपदेशात्मक प्रबंध, पत्र एवं श्लोक लोगों के साथ विनियोजन में ‘अनासक्ति’ (यानि सभी चीजों की शून्यता का बोध करना और इसलिए उनसे निर्लिप्त होना) को व्यवहार में लाने के प्रति अनेक गहरे सरोकार का संकेत देते हैं। दुरूह तर्क के ज़रिये, जैसा माध्यमिका कारिका में है, उन्होंने अस्तित्व के बारे में हिंदू एवं बौद्ध दृष्टिकोणों की आलोचना की हैं। लेकिन उनके अधिकतर शास्त्रार्थ स्थविरवाद और सर्वास्तिवाद के बौद्ध मतों द्वारा प्रस्तातिव अस्तित्व की व्याख्या के प्रयास थे। नागार्जुन की स्थिती प्रारंभिक महायान साहित्य के प्रज्ञापारमिता-सूत्र (प्रज्ञा श्लोकों की पराकाष्ठा) से घनिष्ठ रूप से संबद्ध और संभवत: निर्भर है, जिसमें 'शून्य' का विचार ज्ञान के मार्ग पर चलने वालों से लिए महत्त्वपूर्ण था और माध्यमिका मत में विशिष्ट शब्द बन गया।
यह विचार बताता है कि अस्तित्व का स्वरूप संबंधात्मक है : कोई आत्मा नहीं है, कुछ नहीं है तथा इसके संदर्भ में स्वतंत्र कोई अवधारणा नहीं है; सभी चीज़े किसी से रिक्त हैं तथा केवल परिस्थिती के संदर्भ में विद्यमान हैं। परिवर्तनशील स्वरूपों के पीछे कोई शाश्वत सत्य नहीं है; यहां तक कि बिना किसी बंधन के निर्वाण (ज्ञान-प्राप्ति) भी अस्तित्व के बदलते स्वरूप से स्वतंत्र नहीं है। जिन व्यक्तियों ने ज्ञान में पूर्णता प्राप्त कर ली है, उन्हें निर्वाण एवं अस्तित्व के परिवर्तनशील प्रवाह का एक साथ बौद्ध होता है। यह पूर्णता उन दूसरी 'पूर्णताओं' को रुपांतरित करती है, जो बोधिसत्व (भावी बुद्ध) के मार्ग के अंग हैं, जैसे नैतिकता, सहनशीलता एवं ध्यान। विवेक की पराकाष्ठा पूर्णता के लिए प्रयासरत उत्साही व्यक्ति को पूर्णता की आसक्ति तक से मुक्ति दिला देती है, उस 'पूर्णता' से, जिसमें उसे क्षण के संबंधात्मक स्वरूप का बोध नहीं होता । अत: विवेक को करुणा से पृथक न करने वाले नागार्जुन के दृष्टिकोण से विद्वतापूर्ण शास्त्रार्थ में हिस्सा लेना, बुद्ध की शिक्षाओं की व्याख्या लिखना तथा श्लोकों में माया एवं पीड़ा से मुक्ति की प्रशंसा करना परम सत्य (धर्म) अनुकूल माने जाते हैं।
सत्ताईस अध्यायों में विभक्त और 448 कारिकाओं में निबद्ध माध्यमिक कारिका या मध्यमक शास्त्र नागार्जुन की सर्वाधिक विद्वत्तापूर्ण और प्रसिद्ध रचना है, जो सम्पूर्ण माध्यमिक प्रस्थान का आधार स्तम्भ है। विग्रहव्यावर्तनी में नागार्जुन के दर्शन का प्रमाण पक्ष स्फुट हुआ है। चतु:स्तव में बुद्ध की स्तुति है तो रत्नावली में राजा के आचार मार्ग का निर्देश और बौद्ध दर्शन के वास्तविक स्वरूप का विवेचन है। प्रतीत्यसमुत्पादहृदय, शून्यतासप्तति, युक्तिषष्टिका, उपायहृदय, भवसंक्रांतिशास्त्र, महाप्रज्ञापारमिताशास्त्र और वैदत्यसूत्र नागार्जुन की दूसरी असंदिग्ध रचनायें हैं, जिनमें उनके दर्शन के विविध पक्षों की अभिराम अभिव्यक्ति हुई है।
नागार्जुन की दृष्टि में मूल तत्व शून्य के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। ध्यान देने की बात यह है कि यह शून्य कोई निषेधात्मक वस्तु नहीं है जिसका अपलाप किया जा सके। किसी भी पदार्थ का स्वरूपनिर्णय करने में चार ही कोटियों का प्रयोग संभाव्य है - अस्ति (विद्यमान है), नास्ति (विद्यमान नहीं है), तदुभयम् (एक साथ ही अस्ति नास्ति दोनों) तथा नोभयम् (अस्ति नास्ति दोनों कल्पनाओं का निषेध)। परमार्थ इन चारों कोटियों से मुक्त होता है और इसीलिए उसके अभिधान के लिए "शून्य" शब्द का प्रयोग हम करते हैं। नागार्जुन के शब्दों में-
न सन् नासन् न सदसत् न चाप्यनुभयात्मकम्।
चतुष्कोटिर्विनिर्मुक्त तेत्वं माध्यमिका विदु:॥
शून्यवाद की सिद्धि के लिए नागार्जुन ने विध्वंसात्मक तर्क का उपयोग किया है - वह तर्क, जिसके सहारे पदार्थ का विश्लेषण करते करते वह केवल शून्यरूप में टिक जाता है। इस तर्क के बल पर द्रव्य, गति जाति, काल, संसर्ग, आत्मा, आदि तत्वों का बड़ा ही गंभीर, मार्मिक तथा मौलिक विवेचन करने का श्रेय नागार्जुन को है। इस मत में सत्य दो प्रकार का होता है - (1) सांवृतिक सत्य तथा (2) पारमार्थिक सत्य जिनमें प्रथम अविद्या से उत्पन्न व्यावहारिक सत्ता का संकेत करता है; द्वितीय प्रज्ञा जनित सत्य का प्रतिपादक है। "संवृति" शब्द का अर्थ है अविद्या। अविद्याजनित होने से व्यावहारिक सत्य सांवृतिक सत्य के नाम से जाना जाता है। सत्य की यह द्विविध व्याख्या नागार्जुन की दृष्टि में शून्यवाद के द्वारा उद्भावित नूतन कल्पना नहीं है, प्रत्युत बुद्ध के द्वारा ही प्राचीन काल में संकेतित की गई है। बुद्ध के कतिपय उपदेश व्यावहारिक सत्य के आधार पर दिए गए हैं; अन्य उपदेश पारमार्थिक सत्य के ऊपर आलंबित हैं। अभीष्ट दोनों है बुद्ध को -
द्वे सत्ये समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना।
लोक संवृतिसत्यं च सत्यं च परमार्थित: ॥
नागार्जुन दार्शनिक होते हुए भी व्यवहार की उपेक्षा करनेवाले आचार्य नहीं थे। वे जानते हैं कि व्यवहार का बिना आश्रय लिए परमार्थ का उपदेश ही नहीं हो सकता और परमार्थ की प्राप्ति के अभाव में निर्वाण मिल नहीं सकता। साधारण मानवों की बुद्धि व्यवहार में इतनी आसक्त है कि उसे परमार्थपथ पर लाने के लिए व्यवहार का अपलाप नहीं किया जा सकता। फलत: व्यवहार की असत्यता परमार्थ शब्दों के द्वारा प्रतिपाद्य वस्तु नहीं है। इसीलिए उसे "अनक्षरतत्व" के अभिधान से जानते हैं। परमार्थतत्व बुद्धिव्यापार इतनी आसक्त है कि उसे परमार्थ पथ पर लाने के लिए व्यवहार का अपलाप नहीं किया जा सकता। फलत: व्यवहार की "असत्यता" दिखलाकर ही साधक को परमार्थ में प्रतिष्ठित करना पड़ता है। परमार्थ शब्दों के द्वारा प्रतिपाद्य वस्तु नहीं है। इसीलिए उसे अनक्षर तत्व के अभिधान से जानते हैं।

परमार्थतत्व बुद्धिव्यापार से अगोचर, अविषय (ज्ञान की कल्पना से बाहर), सर्वप्रपंचनिर्मुक्त तथा कल्पनाविरहित है, परंतु उसके ऊपर जागतिक पदार्थों का समारोप करने से ही उसका ज्ञान हमें हो सकता है। यह तत्व वेदांतियों के अध्यारोप तथा अपवादविधि से निमांत सादृश्य रखता है।