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बुधवार, 6 मार्च 2013

भ्रष्टाचार और आंदोलित समाज


क़ानून संसद बनाती है,  और लोगों की इस प्रक्रिया में सीधी कोई भूमिका नहीं है। लेकिन शायद वे भूल गए कि हमारे संविधान का पहला वाक्य है "हम भारत के लोग..."!  इसी संविधान में अधिकारों के साथ-साथ नागरिकों के कर्त्तव्य भी परिभाषित किये गए हैं।  जिनके तहत यदि संसद कोई ऐसा काम करती है, जो लोकतंत्र और संविधान की भावना के अनुरूप न हो तो लोग उसकी खिलाफत कर सकते हैं, विरोध कर सकते हैं और उसे सुधारने का काम कर सकते हैं।
        बड़ा ही सुखद क्षण है जब हम देख रहे हैं कि पहले सरकार लोगों के सामने शर्तें रखती है और दबाव डालती है कि जन समूह वैसे ही आन्दोलन करें जैसा सरकार चाहती है, पर जब आन्दोलन के साथ जन जुड़ जाता है तब लोग सरकार के सामने शर्तें रखते हैं और सरकार को उसके कृत्यों के लिए शर्मसार कर देते हैं। राष्ट्र में भ्रष्टाचार केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं रह गया।  यह केवल जन आन्दोलन का मुद्दा भी नहीं रह गया. भारत में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन ने अब एक गैर दलीय राजनीतिक आन्दोलन का रूप ले लिया है। जो कुछ भी घट रहा है, हमें उसे एक व्यापक सन्दर्भ में देखने की ज़रूरत है। ऐसा नहीं था कि अब से दो साल पहले भारत में भ्रष्टाचार नहीं था, या लोग उससे त्रस्त नहीं थे।  मुद्दा तो था पर कमी मात्र इतनी थी कि कोई नेतृत्व नहीं मिल पा रहा था।  अप्रैल २०११ में जब इस जन आन्दोलन का पहला जमावड़ा दिल्ली में हुआ तब किसी को (न सरकार को और न ही टीम अन्ना को) नहीं पता था कि उनका यह प्रयास क्या रूप लेगा ?  पर उस जमावड़े और  अन्ना हजारे के पहले अनशन के बीच देश में उम्मीदों के भरपूर पैदावार हुई और लोग उससे अपने आप ही जुड़ते चले गए।

अब चूँकि बार-बार बहुत से घोटाले उभर कर जनता के सामने आ रहे थे।  कामनवेल्थ खेल और दूरसंचार के भ्रष्टाचार ने तो मानो यू॰ पी॰ ए॰ की  राजनैतिक छवि को पूरा कचरा ही कर दिया था।  ऐसे में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन ने लोगों को अपनी मन की उदगार सामने लाने का एक मंच प्रदान किया ।  इस आन्दोलन ने यह भी सिद्ध किया है कि आज देश में एक ऐसा लोकतंत्र है जहाँ लोक को तंत्र के दुष्कर्मों के खिलाफ अपने मन के बात कहने के मंच ही नहीं हैं।  वह न्याय की तलाश में अदालत जाता है।  वहां न्याय तो नहीं मिलता है, बल्कि वह अन्याय के एक नए कुचक्र में फँस जाता है। जिस मीडिया से उम्मीद की जा रही थी, वह खुद दूरसंचार घोटाले का हिस्सा बना नज़र आया।  संगठित होकर अपने हकों को समानता की लहर चलाने की मंशा रखने वालों को राष्ट्रविरोधी कह कर  ऐसा फंसाया  जाने लगा कि लोगों का लोकतंत्र और राज्य दोनों  से विश्वास डगमगाने लगा ।
 इन परिस्थितियों में इस आन्दोलन ने उन बिखरी हुई उम्मीदों को समेटने का काम किया. और यूपीए की सरकार को बताया गया कि अब यह कोई एन॰ जी॰ ओ॰ कार्यक्रम नहीं रह गया है। अब जन यानी नागरिक इससे जुड़ रहे हैं।  सरकार कभी इस बात के लिए गंभीर नहीं रही कि भ्रष्टाचार देश के लिए एक गंभीर चुनौती है।  उसके लिए तकलीफदेय बात मामला यह था कि उसके आलाकमान (मंत्री ,सांसद अफसरशाह आदि) द्वारा की गयी करतूतें सामने आ रही थीं।  स्विस बैंक में जमा धन के बारे में कयास लगाए जाते रहे कि वहां अरबों हजार डालर के बराबर का कालाधन जमा है।  इस पर सरकार मौन रही तो सर्वोच्च न्यायालय ने कदम उठाना शुरू कर दिए और विशेष जांच टीम बना दी।  जब सरकार फँसी, तब यह तय हुआ की नगर समुदाय जिसे सिविल सोसायटी के नाम से परिभाषित किया जाता रहा।  सरकार के नुमाइन्दो के साथ मिलकर लोकपाल की ऐसी कानूनी व्यवस्था के लिए क़ानून का एक प्रारूप बनायेंगे, जो भ्रष्टाचार पर लगाम लगाए और जो लोग या पद अभी तक मौजूदा क़ानून के लचरपन के कारण बचते रहे, उन्हें सजा दी जा सके।  पर सरकार के नुमायिंदे लोकपाल की  व्यवस्था के दायरे से प्रधानमन्त्री और निचले अधिकारियों-कर्मचारियों को स्वतंत्र रखने चाहते थे।  उन्होंने ऐसा ही किया और अपनी तानाशाही का परिचय देते हुए अन्ना हजारे के नेतृत्व वाली सिविल सोसायटी की मूल मांगों को नकार दिया।  सरकार ने अपने प्रस्तावित क़ानून में भ्रष्टाचार करने वाले के लिए कम और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले के लिए ज्यादा सजा का प्रावधान भी किया। मंत्रियों के इस समूह ने शुरू की ताकत और मुद्दों से ध्यान बटाने की राजनीति।  कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम, प्रणव मुखर्जी  ने मोर्चा संभाला और यह कहा कि सिविल सोसाइटी संविधान से ऊपर नहीं है।
 क़ानून संसद बनाती है,  और लोगों की इस प्रक्रिया में सीधी कोई भूमिका नहीं है। लेकिन शायद वे भूल गए कि हमारे संविधान का पहला वाक्य है "हम भारत के लोग..."!  इसी संविधान में अधिकारों के साथ-साथ नागरिकों के कर्त्तव्य भी परिभाषित किये गए हैं।  जिनके तहत यदि संसद कोई ऐसा काम करती है, जो लोकतंत्र और संविधान की भावना के अनुरूप न हो तो लोग उसकी खिलाफत कर सकते हैं, विरोध कर सकते हैं और उसे सुधारने का काम कर सकते हैं।  इस तरह कपिल सिब्बल सहित कुछ लोगों के  द्वारा दिए गए इस तरह के बयान के कोई मायने नहीं रह जाते कि अन्ना और उनके साथियों को चुनाव लड़ कर संसद में आकर अपनी मर्ज़ी का क़ानून बनवाना चाहिए। यही एक मात्र रास्ता है।  जो बात सरकार कह रही है, उससे तो यही परिलक्षित होता है कि संसद और सरकार यदि कुछ गलत करे भी तो किसी को उसका विरोध करने का कोई हक़ नहीं होता है ।  और जो विरोध  करेगा, उसे बंदी बना लिया जाएगा।  यह तो लोकतंत्र की मूल भावना नहीं है। केंद्र सरकार ने अन्ना के अनशन और आन्दोलन को रोकने की जो भी कोशिशें की वे बेहद कमज़ोर समझ, अपरिपक्व नज़रिए और बचकाना हरकतों की परिचायक हैं।  इससे यह भी सिद्ध हुआ कि कांग्रेस और  केंद्र सरकार के बीच सही तालमेल नहीं है। उनके रणनीतिकार जनमानस को महसूस करने की क्षमता खो चुके हैं।
अन्ना हजारे के आन्दोलन ने सत्ता के इस दंभ को तोडा है कि वही सर्वोपरि है. उन्होंने बता दिया है कि हमारी व्यवस्था में लोक तंत्र से बड़ा और ताकतवर है, उसकी बात सुनना पड़ेगी. सरकार के रणनीतिकारों का आंकलन था कि यह समूह देश को केवल यह बताना चाहता है कि हम सरकार के साथ एक दस्तावेज बनाने की प्रक्रिया में जुड़े हैं।  वे मान रहे थे कि बस एक दस्तावेज बन जाएगा तो यह आन्दोलन भी ख़त्म हो जाएगा, पर उनका यह आंकलन फिर गलत साबित हूँ ।  अन्ना ने कह दिया कि यदि हमा––री बातें इसमें शामिल नहीं हुई और  विधेयक संसद में पेश नहीं किया गया तो आन्दोलन फिर से होगा। कपिल सिब्बल कहने लगे कि ठीक है विधेयक पेश कर देंगे, पारित कब होगा यह तो संसद ही तय करेगी।  यानि उनका मन साफ़ नहीं था, वे कुटिल चालें चल रहे थे और सन्देश देने की कोशिश कर रहे थे कि सरकार की ताकत के सामने लोग कुछ नहीं हैं। 
इसी दौरान टीम अन्ना के सदस्यों पर व्यक्तिगत रूप से कीचड उछालना शुरू कर दिया गया। अंत में कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने १४ अगस्त २०११ तो उस वक्त हद कर दी जब उन्होंने यह आरोप लगाया कि तुम (अन्ना) खुद गले तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन चलाते हैं ।  ४ घंटे बाद उसी दिन जो करारा  जवाब अन्ना ने कांग्रेस को दिया उससे कांग्रेस की साँसें फूल गयी।  अन्ना ने कहा कि जब तक आप मेरे ऊपर लगाए गए आरोपों पर कार्यवाही करके सिद्ध नहीं करते तब तक मेरा अनशन जारी रहेगा।  अन्ना हजारे अब एक ऐसी शख्सियत बन चुके हैं, जो गाँधी के उस मूल वाक्य का पालन करते हैं - जो बदलाव तुम लाना चाहते हो, उसके परिचायक तुम खुद बनों।  इसीलिए केंद्र सरकार और कांग्रेस के हर आक्रमण को उन्होंने निस्तेज कर दिया।  वे जिस अंदाज़ में १५ अगस्त को महात्मा गांधी की समाधि पर २ घंटे ध्यान में बैठे, उस छवि ने लोगों के मानस में एक गहरी छाप छोड़ी।  और फिर वे लगातार आह्वान करते रहे कि आन्दोलन अहिंसक होगा।  यह कहकर उन्होंने पी चिदंबरम को सोचने पर मजबूर कर दिया , जो जन आन्दोलनों को क़ानून और शस्त्रों से दबाने में विश्वास रखते हैं।
यह बात साफ़ है कि सरकार को यह समझ ही  नहीं पड़ा कि वह करे क्या? ऐसे में उसने १६ अगस्त को अन्ना और उनके साथियों को गिरफ्तार करके बड़ा संकट मोल ले लिया पिछले साढ़े चार महीनों में सरकार के गुप्तचर सूत्रों ने हमेशा उन्हें  बताया कि यह जन आन्दोलन है, पर राजनैतिक रूप से कांग्रेस इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हुई और अन्ना को अपना व्यक्तिगत दुश्मन मान कर काम करने लगा।  उनका हर  विश्लेषण गलत साबित हुआ और उन्हें अपने हर निर्णय को पलटने के लिए मजबूर होना पड़ा।  १६ अगस्त को अन्ना को गिरफ्तार करना तो सरकार के हाथ में था, पर रात ९ बजे अन्ना ने बता दिया कि अब रिहा करना सरकार के हाथ में नहीं है ।  पहले सरकार उन पर अनशन करने से जुडी शर्तें थोप रही थी, जब जनदबाव बढ़ता गया तब  सरकार ने उन्हें रिहा करने का निर्णय लिया तो अन्ना ने रिहा होने के लिए शर्तें रख दी।
गांधी की कांग्रेस तो अब अन्ना सिखा रहे थे कि गांधीवादी सत्याग्रह कैसे किया जाता है। एक नेतृत्व को खड़ा करना और उसे स्थापित करना, इस आन्दोलन की एक बड़ी खासियत रही है।  यदि ऐसा नहीं होता तो यह आन्दोलन भी बिखर गया होता। कभी यह २२ लोगों का केन्द्रीय समूह होता है, तो कभी ५ लोगों का, पर केंद्र एक ही है - अन्ना हजारे। यहाँ हम केन्द्रीयकरण की वकालत नहीं कर सकते, पर यह सीखने की बात है कि नेतृत्व के  केन्द्रीय होने का मतलब है नैतिक, वैचारिक, चारित्रिक, और राजनीतिक समझ के साथ परिपक्व होना।
        जब अप्रैल में अन्ना का अनशन-आन्दोलन हुआ था तब सोनिया गांधी नेपथ्य से सूत्रधार की भूमिका निभा रही थी। उन्होंने मामले तो राजनैतिक नज़रिए से भांपा था।  इसीलिए सरकार और अन्ना समूह एक मंच पर आया। पर अभी वे बीमार है और इलाज़ कराने के लिए विदेश गयी हुई हैं। उनकी बीमारी कांग्रेस को भारी पड़ गयी।  उनकी अनुपस्थिति में १६ अगस्त के दिन को सरकारी नज़रिए से गुज़ारने की कोशिश हुई, राजनैतिक नजरिया गायब हो गया।  और हड़बड़ी में गड़बड़ी होती रही।  यह सिद्ध हो गया कि यदि गांधी परिवार का सदस्य न हो तो कांग्रेस की और से कोई राजनैतिक दबाव         सरकार के ऊपर नहीं होता है।  जब १५ अगस्त को राहुल गांधी भारत वापस आये, तब इस मसले को राजनैतिक नज़रिए से देखने की कोशिश हुई। 
वास्तव में मनमोहन सिंह का राजनैतिक व्यक्तित्व बेहद कमज़ोर व्यक्तित्व साबित हुआ।  फिर १७ अगस्त को संसद में जिस तरह का बयान प्रधानमंत्री ने दिया, उसमे वही सब कुछ कहा जो कपिल सिब्बल, अम्बिका सोनी और पी चि कुछ लोग १२१ करोड़ लोगों को दे सकें। जिन्दा लोकतंत्र  में तो संसद के गलत कदम को भी चुनौती ही  मिलेगी, जो यह सरकारें नहीं चाहती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गुजरात में सम्प्रदाय के नाम पर लोकतंत्र की हत्या हुई है।  उत्तर-पूर्व में पहचान और स्वायत्तता  को सीमित करने के नाम पर और काश्मीर में कश्मीर के नाम पर लोकतंत्र को बार-बार मारा गया है।  वहां प्रधानमन्त्री, कांग्रेस और अब अन्ना के साथ होने का दावा करने वाले राजनैतिक दलों को संसद की गरिमा और संविधान का स्मरण क्यों नहीं आता? पिछले १० वर्षों से अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करते हुए अनशन कर रही इरोम शर्मीला का समरण क्यों नहीं आता है।  आप इस बात को मत भूलिए कि ये सभी राजनैतिक सवाल हैं और यदि हम इनके जवाब खोजना चाहते हैं तो भ्रष्टाचार के इस आन्दोलन को एक राजनीतिक आन्दोलन का रूप देना ही होगा।  
         मीडिया बहुत सक्रिय है, इस सक्रियता का अध्ययन जरूर होना चाहिए।  मुझे लगता है कि इस मामले में मीडिया और जनसमुदाय ने एक-दूसरे को सहारा दिया है।  और शायद सरकार के मानस को बनाने में  गुप्तचर व्यवस्था से ज्यादा मीडिया ने धारदार भूमिका निभाई है।  अभी यह मानना बहुत जल्दबाजी होगी कि क्या मीडिया जनपक्षीय भूमिका निभाने लगा है या जिस तरह मीडिया की प्रतिबद्धता पर भी सवाल खड़े हो चुके हैं, वह उनसे पाक साफ़ निकलने के लिए २४ में १८ घंटे अन्ना के आन्दोलन के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है।   
        अब हमें कुछ और बातें समझ आती हैं।  भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगी हुई है।  आन्दोलन एक मुकाम पर पहुँच चुका है । अब सचेत रहना होगा कि यह भ्रष्ट लोगों के हाथ ना जाने पाए। मैं फिर कहना चाहता हूँ कि केवल यूपीए ही कीचड से सनी हुई नहीं है।  हाँ  वह तुलनात्मक रूप से ज्यादा भ्रष्ट है, क्यूंकि उसने ज्यादा समय तक शासन किया हाँ  और उदारीकरण- निजीकरण में उसकी ज्यादा रूचि इसीलिए रही है क्यूंकि उसमे पूँजी का प्रवाह ज्यादा तरलता के साथ होता है।  एक तरफ तो अच्छा है कि राजनैतिक दल भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के साथ आ रहे (मजबूरी में) हैं। पर उनके मंतव्य क्या है? कांग्रेस तो अपना किया भोग ही रही है, पर ऐसे में हमें एआईएडीएम्के, आरजेडी, समाजवादी पार्टी और बीजेपी को नहीं भूल जाना चाहिए, क्यूंकि इस आन्दोलन में झंडा थाम कर अब ये गंगा स्नान करने चले हैं।  कुल मिला कर हमारे जनप्रतिनिधियों ने ही हमें अपना उपनिवेश बना लिया, क्यूंकि अपने स्वभाव के अनिसार हम यान लोग मौन रहे।  एक बार बोले तो राजनीति के पुराधाओं की लुटिया डूबने लगी।  अभी यह बात साफ़ होने में थोडा समय लगेगा कि लोग सरकार के खिलाफ हैं या व्यवस्था के खिलाफ, पर राजनैतिक दलों के माथे पर चिंता की लकीरें उभारना स्वाभाविक है क्यूंकि जनता अब केवल मतदाता के रूप में सामने नहीं है, वह सवाल पूछने लगी है।
पिछले ४ दिनों में बार-बार इस आन्दोलन की तुलना १९९७४-७५ के जेपी की आन्दोलन से की गयी है । इसमें कोई शक नहीं कि अब यह आन्दोलन बड़ा रूप ले चुका है, पर यह उत्तरोत्तर सही दिशा में बढेगा, इस पर विमर्श कम ही हो रहा है।  मुझे लगता है कि शायद सरकार छोटी-छोटी गलतियाँ इसलिए कर रही है ताकि सबका ध्यान उस और लगा रहे। सरकार शायद अनशन की अनुमति ना देकर और अन्ना को गिरफ्तार करके मामले को भावनात्मक बना रही है ताकि लोग उत्तेजित हो। राज्य ऐसा कर सकता है, यह विश्लेषण सामने आना चाहिए।  इस आन्दोलन से देश का माध्यम वर्ग जुडा है, जो अपनी जरूरतों के आगे सोचता नहीं है, उसे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के मसलों पर बहस करना समय की बर्बादी लगता है।  वह केवल इतना मानता है कि भ्रष्टाचार से उसके जीवन की शैली महंगी हो जाती है और उसे ज्यादा खर्च करना पड़ता है उसे इस बात से कोई इत्तेफाक नहीं है कि बिना भ्रष्टाचार  के भी नीतियां बनाकर सरकार पिछले 8 सालों में २२ लाख करोड़ रूपए की रियायत कारपोरेट सेक्टर को दे चुकी है।  वह यह नहीं सोचना चाहता कि जो नीतियां लागू की गयी हैं वे हमारे भविष्य को एक दबड़े में सीमित कर देंगी और हमारे सारे संसाधनों को पूंजीवादियों के सुपुर्द कर दिया जाएगा। 
इस नज़रिए पर अगर युवाओं और माध्यम वर्ग का शिक्षण प्रशिक्षण नहीं होता है, तो लोगों का यह गुबार कुछ दिनों में निकल जाएगा और लोग अपने काम  धंधों पर लौट जायेंगे।  आज एक अवसर है जब छात्र, किसान, माध्यम वर्ग, मजदूर, ऑटोवाले सरीखे अलग-अलग वर्ग एक साथ हैं, क्या यह साथ एक गठबंधन का रूप ले सकता है? यदि ऐसा हो सके तो हम वास्तव में एक जनवादी और समतामूलक समाज के निर्माण की दिशा में व्यवस्था परिवर्तन के सपने को साकार कर पायेंगे।
                                                                        रामशंकर ‘विद्यार्थी‘
                                                                   पीएच॰डी॰ जनसंचार (शोधार्थी)
                                    

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

संचारक के रूप में विवेकानंद

संचारक के रूप में विवेकानंद

                                                                                                                              रामशंकर*
                                                                                                                             
        अब से करीब 117 साल पहले 11 सितंबर, 1893 को स्वामी विवेकानंद ने शिकागो पार्लियामेंट आफ रिलीजन में भाषण दिया था, उसे आज भी दुनिया भुला नहीं पाती। इसे रोमा रोलां[1] ने 'ज्वाला की जबान' बताया था। इस भाषण से दुनिया के तमाम पंथ आज भी सबक ले सकते हैं। इस अकेली घटना ने पश्चिम में भारत की एक ऐसी छवि बना दी, जो आजादी से पहले और इसके बाद सैकड़ों राजदूत मिलकर भी नहीं बना सके। स्वामी विवेकाननंद के इस भाषण के बाद भारत को एक अनोखी संस्कृति के देश के रूप में देखा जाने लगा। अमेरिकी प्रेस ने विवेकानंद को उस धर्म संसद की महानतम विभूति बताया था। उस समय अभिभूत अमेरिकी मीडिया ने स्वामी विवेकानंद के बारे में लिखा था, 'उन्हें सुनने के बाद हमें महसूस हो रहा है कि भारत जैसे एक प्रबुद्ध राष्ट्र में मिशनरियों को भेजकर हम कितनी बड़ी मूर्खता कर रहे थे।'
           
            जब शिकागो धर्म संसद के पहले दिन अंत में विवेकानंद संबोधन के लिए खड़े हुए और उन्होंने कहा- अमेरिका के भाइयो और बहनो, तो तालियों की जबरदस्त गड़गड़ाहट के साथ उनका स्वागत हुआ, लेकिन इसके बाद उन्होंने हिंदू धर्म की जो सारगर्भित विवेचना की, वह कल्पनातीत थी। उन्होंने यह कहकर सभी श्रोताओं के अंतर्मन को छू लिया कि हिंदू तमाम पंथों को सर्वशक्तिमान की खोज के प्रयास के रूप में देखते हैं। वे जन्म या साहचर्य की दशा से निर्धारित होते हैं, प्रत्येक प्रगति के एक चरण को चिह्निंत करते हैं। अन्य तमाम पंथ कुछ मत या सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं और समाज को इन्हें अपनाने को बाध्य करते हैं। वे समाज के सामने केवल एक कोट पेश करते हैं, जो जैक, जान या हेनरी या इसी तरह के अन्य लोगों को पहनाना चाहते हैं। अगर जान या हेनरी को यह कोट फिट नहीं होता तो उन्होंने बिना कोट पहने ही जाना पड़ता है। धर्म संसद के आखिरी सत्र में विवेकानंद ने अपने निरूपण की व्याख्या को इस तरह आगे बढ़ाया- ईसाई एक हिंदू या बौद्ध नहीं बनता है न ही एक हिंदू या बौद्ध ईसाई बनता है, लेकिन प्रत्येक पंथ के लोगों को एक दूसरे की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए।[2]
            उन्होंने उम्मीद जताई कि हर पंथ के बैनर पर जल्द ही लिखा मिलेगा समावेश,विध्वंश नहीं। सौहा‌र्द्र और शांति, फूट नहीं। मंत्रमुग्ध करने वाले उनके शब्द हाल की दीवारों के भीतर ही गुम नहीं हो गए। वे अमेरिका के मानस को भेदते चले गए, लेकिन उस समय भी आम धारणा यही थी कि हर कोई विवेकानंद से प्रभावित नहीं हुआ। उन्हें न केवल कुछ पादरियों के क्रोध का कोपभाजन बनना पड़ा बल्कि हिंदू धर्म के ही कुछ वर्गो ने उन्हें फक्कड़ साधु बताया जो किसी के प्रति आस्थावान नहीं है। उन्होंने विवेकानंद पर काफी कीचड़ उछाला। उनके पास यह सब चुपचाप झेलने के अलावा और कोई अन्य चारा नहीं था। स्वामी विवेकानंद ने तब जबरदस्त प्रतिबद्धता का परिचय दिया, जब एक अन्य अवसर पर उन्होंने ईसाई श्रोताओं के सामने कहा- तमाम डींगों और शेखी बखारने के बावजूद तलवार के बिना ईसाईयत कहां कामयाब हुई? जो ईसा मसीह की बात करते हैं वे अमीरों के अलावा किसकी परवाह करते हैं! ईसा को एक भी ऐसा पत्थर नहीं मिलेगा, जिस पर सिर रखकर वह आप लोगों के बीच स्थान तलाश सके..आप ईसाई नहीं हैं। आप लोग फिर से ईसा के पास जाएं

            स्वामी विवेकानन्द ज्यादा बड़े संन्यासी थे या उससे बड़े संचारक (कम्युनिकेटर) या फिर उससे बड़े प्रबंधक ? ये सवाल हैरत में जरूर डालेगा पर उत्तर हैरत में डालनेवाला नहीं है क्योंकि वे एक नहीं, तीनों ही क्षेत्रों में शिखर पर हैं। वे एक अच्छे कम्युनिकेटर हैं, प्रबंधक हैं और संन्यासी तो वे हैं ही। भगवा कपड़ों में लिपटा एक संन्यासी अगर युवाओं का रोल मॉडल बन जाए तो यह साधारण घटना नहीं है, किंतु विवेकानन्द के माध्यम से भारत और विश्व ने यह होते हुए देखा। आज के डेढ़ सौ साल पहले कोलकाता में जन्मे विवेकानन्द और उनके विचार अगर आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं तो समय के पार देखने की उनकी क्षमता को महसूस कीजिए। एक बहुत छोटी-सी जिंदगी पाकर भी उन्होंने जो कर दिखाया वह इस धरती पर तो चमत्कार सरीखा ही था। उनकी डेढ़ सौं वीं जयंती वर्ष पर देशभर में हो रहे आयोजन और उनमें युवाओं का उत्साहपूर्वक सहभाग बताता है कि देश के नौजवान आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हैं और स्वामी विवेकानन्द उनके वास्तविक हीरो हैं।
             स्वामी विवेकानन्द की बहुत छोटी जिंदगी का पाठ बहुत बड़ा है। वे अपने समय के सवालों पर जिस प्रखरता से टिप्पणियां करते हैं वे परम्परागत धार्मिक नेताओं से उन्हें अलग खड़ा कर देती हैं। वे समाज से भागे हुए संन्यासी नहीं हैं। वे समाज में रच बस कर उसके सामने खड़े प्रश्नों से मुठभेड़ का साहस दिखाते हैं। वे विश्वमंच पर सही मायने में भारत, उसके अध्यात्म, पुरूषार्थ और वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को स्थापित करने वाले नायक हैं। वे एक गुलाम देश के नागरिक हैं पर उनकी आत्मा, वाणी और कृति स्वतंत्र है। वे सोते हुए देश और उसके नौजवानों को झकझोर कर जगाते हैं और नवजागरण का सूत्रपात करते हैं। धर्म को वे जीवन से पलायन का रास्ता बनाने के बजाए राष्ट्रप्रेम, राष्ट्र के लोगों से प्रेम और पूरी मानवता से प्रेम में बदल देते हैं। शायद इसीलिए वे कह पाए- व्यावहार में देशभक्ति सिर्फ एक भावना या मातृभूमि के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है। देशभक्ति का अर्थ है अपने साथी देशवासियों की सेवा करने का जज्बा।
            अपने जीवन, लेखन, व्याख्यानों में वे जिस प्रकार की परिपक्वता दिखाते हैं, पूर्णता दिखाते हैं वह सीखने की चीज है। उनमें अप्रतिम नेतृत्व क्षमता, कुशल प्रबंधन के गुर, परम्परा और आधुनिकता का तालमेल दिखता है। उनमें परम्परा का सौंदर्य है और बदलते समय का स्वीकार भी है। वे आधुनिकता से भागते नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल करते हुए नए समय में संवाद को ज्यादा प्रभावकारी बना पाते हैं। स्वामीजी का लेखन और संवाद कला उन्हें अपने समय में ही नहीं, समय के पार भी एक नायक का दर्जा दिला देती है। आज के समय में जब संचार और प्रबंधन की विधाएं एक अनुशासन के रूप में हमारे सामने हैं तब हमें पता चलता है कि स्वामीजी ने कैसे अपने पूरे जीवन में इन दोनों विधाओं को साधने का काम किया। यह वह समय था जब मीडिया का इतना कोलाहल न था फिर भी छोटी आयु पाकर भी वे न सिर्फ भारत वरन दुनिया में भी जाने गए। अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाया और उनकी स्वीकृति पाई। क्या कम्युनिकेशन की ताकत और प्रबंधन को समझे बिना उस दौर में यह संभव था। स्वामीजी के व्यक्तित्व और उनकी पूरी देहभाषा को समझने पर उनमें प्रगतिशीलता के गुण नजर आते हैं। उनका अध्यात्म उन्हें कमजोर नहीं बनाता, बल्कि शक्ति देता है कि वे अपने समय के प्रश्नों पर बात कर सकें। उनका एक ही वाक्य ‘उठो ! जागो !! और तब तक मत रूको जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता।' उनकी संचार और संवाद कला के प्रभाव को स्थापित करने के लिए पर्याप्त हैं। यह वाक्य हर निराश व्यक्ति के लिए एक प्रभावकारी स्लोगन बन गया। इसे पढ़कर जाने कितने सोए, निराश, हताश युवाओं में जीवन के प्रति एक उत्साह पैदा हो जाता है। जोश और ऊर्जा का संचार होने लगता है।
             स्वामीजी ने अपने जीवन से भी हमें सिखाया। उनकी व्यवस्थित प्रस्तुति, साफा बांधने की शैली जिसमें कुछ बाल बाहर झांकते हैं, बताती है कि उनमें एक सौंदर्यबोध भी है। वे स्वयं को भी एक तेजस्वी युवा के रूप में प्रस्तुत करते हैं और उनके विचार भी उसी युवा चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शास्त्रीय प्रसंगों की भी ऐसी सरस व्याख्या करते हैं कि उनकी संचारकला स्वत: स्थापित हो जाती है। अपने कर्म, जीवन, लेखन, भाषण और सम्पूर्ण प्रस्तुति में उनका एक आदर्श प्रबंधक और कम्युनिकेटर का स्वरूप प्रकट होता है। किस बात को किस समय और कितने जोर से कहना यह उन्हें पता है। अमेरिका के विश्व धर्म सम्मेलन में वे अपने संबोधन से ही लोगों को सम्मोहित कर लेते हैं। भारत राष्ट्र और उसके लोगों से उनका प्रेम उनके इस वाक्य से प्रकट होता है- ‘आपको सिखाया गया है अतिथि देवो भव, पितृ देवो भव, मातृदेवो भव। पर मैं आपसे कहता हूं - दरिद्र देवो भव, अज्ञानी देवो भव, मूर्ख देवो भव।' यह बात बताती है कि कैसे वे अपनी संचार कला से लोगों के बीच गरीब, असहाय और कमजोर लोगों के प्रति संवेदना का प्रसार करते नजर आते हैं।
             समाज के कमजोर लोगों को भगवान समझकर उनकी सेवा का भाव विवेकानन्दजी ने लोगों के बीच भरना चाहा। वे साफ कहते हैं- ‘यदि तुम्हें भगवान की सेवा करनी हो तो, मनुष्य की सेवा करो। भगवान ही रोगी मनुष्य, दरिद्र पुरूष के रूप में हमारे सामने खड़ा हैं। वह नर वेश में नारायण है।'[3] संचार की यह शक्ति कैसे धर्म को एक व्यापक सामाजिक सरोकारों से जोड़ देती है यह स्वामीजी बताते हैं। सही मायने में विवेकानन्दजी एक ऐसे युगपुरूष के रूप में सामने आते हैं जिनकी बातें आज के समय में ज्यादा प्रासंगिक हो गयी दिखती हैं। धर्म के सच्चे स्वरूप को स्थापित कर उन्होंने जड़ता को तोड़ने और नए भारत के निर्माण पर जोर दिया। भारतीय समाज में आत्मविश्वास भरकर उन्हें हिंदुत्व के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान दिया जिसमें सबका स्वीकार है और सभी विचारों का आदर करने का भाव है। इसलिए वे कहते थे भारत का उदय अमराईयों से होगा। अमराइयां का मायने था छोटी झोपड़ियाँ। वे भारतीय संदर्भ में सामाजिक न्याय के सबसे प्रखर प्रवक्ता हैं। वे दिखावटी संवेदना के खिलाफ थे और इसलिए स्वामीजी को जीवन में उतारना एक कठिन संकल्प है।
 आज जबकि कुपोषण, पर्यावरण के सवालों पर बातें हो रही हैं। स्वामीजी इन मुद्दों पर बहुत सधी भाषा में अपनी बात कर चुके हैं। वे बेहतर स्वास्थ्य को एक नियामत मानते हैं। इसीलिए वे कह पाए कि गीता पढ़ने से पहले फुटबाल खेलो, तभी गीता में वर्णित श्री कृष्ण के शक्तिदायी संदेश को अनुभव कर सकोगे। एक स्वस्थ शरीर के बिना भारत सबल न होगा यह उनकी मान्यता थी। मात्र 39 साल की आयु में वे हमसे विदा हो गए किंतु वे कितने मोर्चों पर कितनी बातें कह और कर गए हैं कि वे हमें आश्चर्य में डालती हैं। एक साधारण इंसान कैसे अपने आपको विवेकानन्द के रूप में बदलता है। इसमें एक प्रेरणा भी है और प्रोत्साहन भी। आज की युवा शक्ति उनसे प्रेरणा ले सकती है। स्वामी विवेकानन्द ने सही मायने में भारतीय समाज को एक आत्मविश्वास दिया, शक्ति दी और उसके महत्व का उसे पुर्नस्मरण कराया। सोते हुए भारत को उन्होंने झकझोरकर जगाया और अपने समूचे जीवन से सिखाया कि किस तरह भारतीयता को पूरे विश्वमंच पर स्थापित किया जा सकता है।
             एक बेहतर कम्युनिकेटर, एक प्रबंधन गुरु, एक आध्यात्मिक गुरु, वेदांत का भाष्य करने वाला संन्यासी, धार्मिकता और आधुनिकता को साधनेवाला साधक, अंतिम व्यक्ति की पीड़ा और उसके संघर्षों में उसके साथ खड़ा सेवक, देशप्रेमी, कुशल संगठनकर्ता, लेखक एवं सम्पादक, एक आदर्श शिष्य जैसी न जाने कितनी छवियां स्वामी विवेकानन्द से जुड़ीं हैं। किंतु हर छवि में वे अव्वल नजर आते हैं। देश में विवेकानन्द के विचारों के साथ-साथ जीवन में भी उनकी उपस्थिति बने तो यही भारत मां के माथे पर सौभाग्य का टीका साबित होगी।
निष्कर्ष-
            समाज के कमजोर लोगों को भगवान समझकर उनकी सेवा का भाव विवेकानन्दजी ने लोगों के बीच भरना चाहा। वे साफ कहते हैं- ‘यदि तुम्हें भगवान की सेवा करनी हो तो, मनुष्य की सेवा करो। भगवान ही रोगी मनुष्य, दरिद्र पुरूष के रूप में हमारे सामने खड़ा हैं। वह नर वेश में नारायण है।' संचार की यह शक्ति कैसे धर्म को एक व्यापक सामाजिक सरोकारों से जोड़ देती है यह स्वामीजी बताते हैं। अपने जीवन, लेखन, व्याख्यानों में वे जिस प्रकार की परिपक्वता दिखाते हैं, पूर्णता दिखाते हैं वह सीखने की चीज है। उनमें अप्रतिम नेतृत्व क्षमता, कुशल प्रबंधन के गुर, परम्परा और आधुनिकता का तालमेल दिखता है। उनमें परम्परा का सौंदर्य है और बदलते समय का स्वीकार भी है। वे आधुनिकता से भागते नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल करते हुए नए समय में संवाद को ज्यादा प्रभावकारी बना पाते हैं। स्वामीजी का लेखन और संवाद कला उन्हें अपने समय में ही नहीं, समय के पार भी एक नायक का दर्जा दिला देती है
संदर्भ-
1.       http://in.linkedin.com/pub/vivekanand-p/7/293/917
3.      http://www.pravakta.com/tag/स्वामी -विवेकानंद
6.      http://www.pravakta.com/saints-of-communication-science
                                                                                                                  अध्येता
                                                                                                   रामशंकर पीएच.डी.जनसंचार (शोधार्थी)                                                                                                              
                                                                                                        म.गां.अं.हि.वि.वि.,वर्धा  (महाराष्ट्र)
                                                                                                   
     



[1] जोशी,पूरन चन्द्र ‘यादों से रची यात्रा विकल्प की तलाश’,पृष्ठ 203
[2] http://www.apnihindi.com/2011/04/blog-post_27.html
[3] नवभारत टाइम्स ‘विवेकानंद जी का प्रसिद्ध भाषण’ सितंबर11,2012

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

सोशल मीडिया : संभावनाएँ और चुनौतियाँ



सोशल मीडिया किसी परिचय का मोहताज नहीं है,इसका नाम दिमाग में आते ही सबसे पहले फेसबुक,टिवटर,लिंकइन,यू-टूब,ब्लागॅ हमारे दिमाग में आता है। आज के वैश्विक परिवेश में सोशल मीडिया की लोकप्रियता और उपयोगिता का अंदाजा इस रिपोर्ट से लगाया जा सकता है।अमरिका के यूनाईटेड साईबर स्कूल के मुताबिक रेडियो को 50मिलियन लोगों तक पहुँचने में 38 साल, टीबी को 13 साल, इंटरनेट को 4 साल और फेसबुक को 100मिलियन लोगों तक पहुँचने में मात्र नौ महीने का समय लगा। एक और ध्यान देने वाली बात है कि यह केवल युवाओं की पंसद नहीं बल्कि 60-80 साल के बुजुर्ग भी इसपर सक्रिय रहतें है।
सोशल मीडिया ने आम लोगों को एक ऐसा मंच दिया है जिससे वो अपनी बातें बिना किसी डर के दुनिया के किसी भी व्यक्ति के पास पलक झपकते ही पहुचाँ सकते है। पंसद,नापंसद,अभिवयक्ति की आजादी जैसे शब्दों को सही साबित करने में इस मंच का योगदान सराहनीय रहा है।आज ज्यादातर युवा जानकारी के लिए इस पर निर्भर रहतें है। यूके में 75प्रतिशत लोग अपनी जानकारी बढाने के लिए ब्लागॅ का इस्तेमाल करते हैं। एक तरह से सूचनाओं,जानकारियों का विक्रेन्दीकरण हुआ है,अब लोग किसी सूचना के लिए एक व्यक्ति या संस्था पर आश्रित नहीं हैं।बस एक क्लिक करने की जरुरत है,सूचनाओं का भंडार आपके सामने है।सही मायने में सोशल मीडिया गाँव के चौपाल की तरह है जँहा इसका हर एक सदस्य अपने साथियों के साथ तुरतं और लगातार सूचनाओं को साझा और उसपर प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकता है।इस तरह किसी भी सूचना या विचार को एक साथ कई व्यक्ति तक पहुँचने में कुछ सेकेंड का ही ससमय लगता है।यही इसकी सबसे बडी खूबी है,वहीं ट्रेडिशनल मीडिया में प्रतिक्रिया व्यक्त करने का कोई माध्यम हीं नहीं है।
अरब क्रातिं, वाल स्ट्रीट जैसे आंदोलन में सोशल मीडिया की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता।लीबीया,इजीपट,ट्यूनिशया जैसे देशों में कुछ युवकों ने फेसबुक,टवीटर,यू-टूब का इस्तेमाल कर लोगों को संगठित किया। संगठन को एक दिशा देकर तानाशाहों को सता से बाहर भी कर दिया।यँहा अगर सोशल मीडिया नहीं होता तो सरकार लोगों को गोलबंद होने का मौका नहीं देती और उनकी आवाज दब कर रह जाती। लेकिन सोशल मीडिया उन देशों की सरकार या किसी समूह के नियत्रंण में नहीं था जिस वजह से लोगों को एकजुट करने में सफल रहा। वहीं अब समाजसेवी संस्थाएँ भी इसका उपयोग अपने आंदोलन को संगठित करने और जनता को जोडने,जागरुक करने में कर रहे हैं। बात चाहे अन्ना आंदोलन की हो या बाबा रामदेव की उनका आंदोलन इतना संगठित और सफल इसकी वजह से ही हो पाया है।
पर इसके साथ हीं सोशल मीडिया के लिए चुनौतियाँ भी कम नहीं है।इसके बढते ताकत को देखते हुए कई देशों की सरकार इस पर सेंसर लगाने की वकालत कर रही है। यह सही है कि इसका दुरुपयोग भी होता है जैसे अगर भारत में असम हिंसा की बात करें तो इसका उपयोग कर लोगों को भयभीत किया गया,एक बडे वर्ग को डरा कर उन्हें पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया गया। वहीं आजकल साईबर आंतकवाद भी इसके दुरुपयोग की ही बानगी है।आम लोगों की तरह आंतकवादी भी इसका उपयोग अपने नापाक इरादों को अंजाम देने के लिए कर रहें हैं। हैकिंग की समस्या भी इसी की एक कडी है, जिसका इस्तेमाल दुश्मन एक दूसरे की महत्वपूर्ण जानकारियाँ चुराने के लिए करतें है। एक और समस्या कम उम्र के युवाओं का सोशल मीडिया की तरफ बढते रुझान को लेकर है,रिपोर्ट में इस बात का पता चला कि फेसबुक इस्तेमाल करने वाले 1करोड से ज्यादा सदस्य 14साल से कम उम्र के हैं।
अगर इन चुनौतियों पर काबू पाना है तो लोगों को सोशल मीडिया के बारे में ज्यादा जागरुक और शिक्षित करना होगा।