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गुरुवार, 30 नवंबर 2017

प्रयोगात्मक शोध : अवधारणात्मक स्पष्टता

प्रयोगात्मक शोध

प्रयोगात्मक शोध, शोध की एक प्रमुख विधि है। प्रयोगात्मक शोध में कार्य कारण संबंध स्थापित किया जाता है। कार्य कारण संबंध स्थापित करने के लिये दो स्थितियों को संतुष्ट करना होता है। पहले तो यह सिद्ध करना होता है कि यदि कारण है तो उसका प्रभाव होगा। यह स्थिति आवश्यक है लेकिन पर्याप्त नहीं है। दूसरा हमें यह भी सिद्ध करना होता हैकि यदि कारण नहीं है तो प्रभाव भी नहीं होगा। यदि वही कारण न हो फिर भी प्रभाव हो तो इसका अर्थ यह हुआ कि प्रभाव का वह कारण नहीं है जो हम अपेक्षा कर रहे थे। प्रयोगात्मक शोध में कारण की उपस्थिति प्रभाव केा दिखाती है तथा कारण की अनुपस्थिति प्रभाव केा नहीं दिखाती है। इन्ही दो स्थितियों केा सन्तुष्ट करने के बाद हम सही कार्य-कारण संबंध स्थापित कर सकते हैं ।
प्रयोगात्मक शोध, जान स्टुअर्ट के ‘‘एकल चर के नियम’’ (Law of Single Variable) पर आधारित है। प्रयोगात्मक शोध का आधार ‘‘अन्तर की विधि (Method of Difference ) है। इस विधि के अनुसार - ‘‘ यदि दो परिस्थितियां सभी दृष्टियों से समान है तथा यदि किसी चर को एक परिस्थिति में जोड़ दिया जाए तथा दूसरी स्थिति में नहीं जोड़ा जाए और यदि पहली परिस्थिति में केार्इ परिवर्तन दिखार्इ पड़े तो वह परिवर्तन उस चर के जोड़ने के कारण होगा। यदि किसी एक परिस्थिति में एक चर हटा लिया तथा दूसरी परिस्थिति में उस चर को न हटाए तब यदि पहली परिस्थिति में केार्इ परिवर्तन होगा तो वह उस चर के हटा लेने के कारण होगा।’’
                                                                                       
चर - प्रयोगात्मक शोध में निम्नलिखित चरों का वर्णन किया जाता है-
1. स्वतन्त्र चर (Independent Variable ) –जिस चर में प्रयोगकर्ता परिवर्तन या जोड़-तोड़ करता है, उसे स्वतन्त्र चर कहा जाता है। स्वतन्त्र चर को ‘कारण चर’ (cause variable) भी कहा जाता है। इसे ‘प्रभावित करने वाला चर’ (Influencing variable) कहा जाता है क्येांकि यह किसी दूसरे चर को प्रभावित करता है। उदाहरण - पढ़ाने का तरीका, बुद्धि, अभिवृत्ति, व्यक्तित्व, प्रेरणा, आयु । स्वतन्त्र चर दो प्रकार के होते हैं -
ü संचालित चर (Treatment variable)
ü जैविक चर (organismic variable)
जिन चरों में शोधकर्ता द्वारा जोड़-तोड़ करना सम्भव होता है उसे संचालित चर कहते हैं, जैसे - पढ़ाने का तरीका, दण्ड, पुरस्कार आदि। जिन चरों में शोधकर्ता द्वारा परिवर्तन सम्भव नहीं होता है उन्हें जैविक चर कहते हैं जैसे -बुद्धि, प्रजाति, आयु आदि।
2. आश्रित चर (Dependent Variable) - स्वतन्त्र चर में जोड़-तोड़ के बाद उसका प्रभाव जिस चर पर देखा जाता है उसे आश्रित चर कहा जाता है। इसी कारण आश्रित चर को ‘प्रभाव चर’ (Effect Variable) कहा जाता है। आश्रित चर के अवलोकन के बाद उसकी रिकार्डिग शोधकर्ता द्वारा की जाती है।यदि पढ़ाने की विधि के प्रभाव का अध्ययन हम शैक्षिक उपस्थित पर करना चाहते हैं तथा दो या तीन भिन्न-भिन्न विधियों से बच्चों को पढ़ाया जाए तथा इसका प्रभाव उनकी शैक्षिक उपलब्धि पर देखा जाए तो इस अध्ययन में ‘पढ़ाने की विधि’ एक स्वतन्त्र चर है तथा ‘शैक्षिक उपलब्धि’ एक आश्रित चर है।
 3. समाकलित चर (Confounding Variable) –किसी भी अध्ययन में स्वतऩ् चर के अतिरिक्त ऐसे कुछ चर होते हैं तो आश्रित चर केा प्रभावित करते हैं। स्वतन्त्र चर का प्रभाव हमें आश्रित चर पर देखना होता है। चयनित स्वतन्त्र चर के अतिरिक्त सभी चर भी आश्रित चर केा प्रभावित कर सकते हैं। इन चरों केा समाकलित चर कहा जाता है। समाकलित चर दो प्रकार के होते हैं -
क. हस्तक्षेपी चर (Intervening Variable) - कछु चर ऐसे होते हैं जिन्हें हम सीधे नियंत्रित नहीं कर सकते और न ही उनका मापन कर सकते हैं लेकिन उनकी उपस्थिति का आश्रित चर पर प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार के चरों का उदाहरण -दुश्चिन्ता, प्रेरणा तथा थकान आदि है। इन चरों का अवलोकन तथा संक्रियात्मक परिभाषीकरण करना भी मुश्किल  होता है लेकिन इनको अनदेखा नहीं किया जा सकता। उपयुक्त शोध-डिजाइन के प्रयोग द्वारा इन्हें हम नियन्त्रित कर सकते हैं।
ख. वाह्य चर (Extraneous Variable) - स्वतन्त्र चर का प्रभाव हम आश्रित चर पर देखते हैं। ऐसे चर जिनका अध्ययन हमे नहीं करना होता या “शोधकर्ता जिनमें केार्इ जोड़-तोड़ नहीं करना उनका प्रभाव भी आश्रित चर पर पड़ता है। इसलिये ऐसे चरों केा नियन्त्रित करना आवश्यक होता है। इन्हे ही वाह्य चर कहते हैं। वाह्य चरों पर नियन्त्रण कर्इ विधियों से किया जाता है। वाहय चर अध्ययन के परिणाम को प्रभावित करते हैं तथा यह स्वतन्त्र चर तथा आश्रित चर दोनो से सहसम्बन्धित होते हैं।
स्वतन्त्र चर - अध्यापक
आश्रित चर - परीक्षा परिणाम
वाह्य चर - विद्यालय का वातावरण

4. प्रयोगात्मक समूह तथा नियन्त्रित समूह (Experimental Group and Control Group) - कार्य-कारण सम्बन्धों केा स्थापित करने के लिये हमें दो पारिस्थितियों केा संतुष्ट करना होता है। पहली परिस्थिति मे में यह देखना होता है यदि कारण है तो प्रभाव होगा तथा दूसरी परिस्थिति में हमें यह देखना हेाता है कि यदि कारण नहीं है तो प्रभाव भी नहीं हेागा। इसी कारण प्रयोगात्मक शोध में दो समूह होते हैं - एक प्रयोगात्मक समूह तथा दूसरा नियन्त्रित समूह।
प्रयोगात्मक समूह - इस समहू में शोधकर्ता द्वारा स्वतन्त्ऱ चर में जोड - तोड  किया जाता है। यह सिद्ध किया जाता है कि यदि कारण है तो इसका प्रभाव होगा। जोड़-तोड़ का प्रभाव आश्रित चर पर देखा जाता है। नियन्त्रित समूह - इस समहू मं  शोधकर्ता  द्वारा स्वतन्त्र चर में कोर्इ जोड - तोड  नहीं किया जाता है। यह सिद्ध किया जाता है कि यदि कारण नहीं है तो इसका प्रभाव भी नहीं है।


प्रयोगात्मक शोध की विशेषताएं :
प्रयोगात्मक शोध की चार प्रमुख विशेषताएं होती है ।

1. नियन्त्रण (Control)
2. जोड़-तोड़ (Manipulation)
3. अवलोकन (Observation)
4. पुनरावृत्ति (Replication)

1. नियन्त्रण (Control) :-नियन्त्रण प्रयोगात्मक शोध की एक प्रमुख विशेषता है। प्रयोगात्मक शोध में हमें स्वतन्त्र चर का प्रभाव आश्रित चर पर देखना होता है। विष्वसनीय परिणाम पाने के लिये वाहय चरों का नियन्त्रण अतिआवश्यक होता है। नियन्त्रण कर्इ विधियो से किया जा सकता है।
(क) विलोपन (Elimination) :- वाहय चरों को नियन्त्रित करने का सबसे आसान तरीका है कि इन चरो को अध्ययन से निष्कासित कर दिया जाए ताकि आश्रित चर पर उसके प्रभाव को विलोपित किया जा सके। यदि बुद्धि वाहय चर है तो दोनों समूहों में समान बुद्धिलब्धि (IQ) के प्रयोज्यों को रखकर इस चर केा नियन्त्रित किया जा सकता है। यदि आयु वाहय चर है तो एक समान आयु के प्रयोज्यों पर अध्ययन करके आयु को नियन्त्रित किया जा सकता है। परन्तु इस विधि से नियन्त्रण करने के बाद अध्ययन का सामान्यीकरण केवल उन प्रयोज्यों पर ही किया जा सकता है जिनकेा अध्ययन में शामिल किया गया है। अध्ययन के परिणाम में हम उसी आयु वर्ग में सामान्यीकृत किया जा सकेगा।
(ख) यादृच्छिकीकरण (Randomization) :- यादृच्छिकीकरण केवल एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा सभी वाहय चरों समूह तथा नियन्त्रित समूह असमतुल्य हो सकते है लेकिन फिर भी उनके समान होने की प्रायिकता बहुत अधिक होती है। जहां तक सम्भव हो प्रयोगात्मक समूह में यादृच्छिक ढ़ंग से प्रयोज्यों केा आबंटित किया जाना चाहिए तथा यादृच्छिक ढ़ंग से आबंटित स्थितियों को प्रयोगात्मक समूह केा दिया जाना चाहिए।
(ग) वाह्य चर को स्वतन्त्र चर के रूप में बदलना (To convert the Extraneous variable into a independent variable) :- वाह्य चरों केा नियन्त्रित करने का एक तरीका यह भी है कि जिस वाहय चर को हमें नियन्त्रित करना है उसका हम अपने अध्ययन में शामिल कर लें। यदि आयु या बुद्धि हमारे अध्ययन में वाहय चर है तो हम इन चरों को भी अपने अध्ययन में शामिल कर लें। इन चरों (बुद्धि और आयु ) का प्रभाव आश्रित चर पर देंखे्रेगे तथा इन चरों की आपस में अन्तक्रिया का प्रभाव क्या होगा ? यह भी अध्ययन किया जाएगा।
(घ) प्रयोज्यों को सुमेलित करना (Matching Cases) :- इस विधि में वाह्य चरों को नियन्त्रित करने में ऐसे प्रयोज्यों को लिया जाता है जो एक समान विशेषताएं रखते हैं तथा इनमें से कुछ को प्रयोगात्मक समूह में तथा कुछ को नियन्त्रित समूह में रखा जाता है।इस विधि की अपनी कुछ सीमाएं है जैसे एक से अधिक चरों के आधार पर प्रयोज्यों केा सुमेलित करना एक कठिन कार्य है। बहुत से प्रयोज्यों केा अध्ययन से अलग करना पड़ता है क्येांकि वह सुमेलित नहीं हो पाते ।
(ड़) समूहों को सुमेलित करना (Group Matching) :- इस विधि से वाह्य चरों केा नियन्त्रित करने में प्रयोगात्मक समूह तथा नियन्त्रित समूह में प्रयोज्यों को इस प्रकार आबंटित किया जाता है कि जहां तक सम्भव होता है दोनों समूहों का मध्यमान तथा प्रसरण लगभगसमान हो।
(च) सह प्रसरण विश्लेषण (Analysis of covariance ) :- वाहय चरों के आधार पर प्रयोगात्मक समूह तथा नियन्त्रित समूह में होने वाले प्रारम्भिक अन्तर केा सांख्यिकीय विधि से दूर किया जाता है।
2. जोड़़-तोड (Manipulation) :- प्रयोगात्मक शोध की प्रमुख विशेषता है - स्वतंत्र चर में जोड़-तोड़ करना। स्वतन्त्र चर में जेाड़-तोड़ करके उसके प्रभाव केा आश्रित चर पर देखा जाता है। स्वतन्त्र चर के उदाहरण है-आयु, सामाजिक-आर्थिक स्तर, कक्षा का वातावरण, व्यक्तित्व की विशेषता आदि। इनमें से कुछ चरों में शोधकर्ता के द्वारा परिवर्तन किया जा सकता है। जैसे-शिक्षण विधि तथा पढ़ाने का विषय आदि। कुछ चरों में सीधे परिवर्तन न करके चयन द्वारा परिवर्तन किया जाता है जैसे- आयु, बुद्धि, आदि। शोधकर्ता एक समय में एक या एक से अधिक स्वतन्त्र चरों में जोड़-तोड़ कर सकता है।
3. अवलोकन (Observation ) :- प्रयोगात्मक शोध में स्वतन्त्र चर मे जोड़-तोड़ करके उसके प्रभाव केा आश्रित चर पर देखा जाता है। आश्रित चर पर पड़ने वाले प्रभाव को सीधे नहीं देखा जा सकता। शैक्षिक उपलब्धि तथा अधिगम यदि आश्रित चर है तो इनकेा सीधे नहीं देखा जा सकता है। शैक्षिक उपलब्धि को परीक्षा में प्राप्त अंकों के अवलोकन के आधार पर देखा जाएगा।
4. पुनरावृत्ति (Replication) :- प्रयोगात्मक शोध में यदि सभी वाहय चरों को नियन्त्रित करने का प्रयास किया गया तथा प्रयोज्यों को आबंटन यादृच्छिक विधि से किया जाए तब भी ऐसे बहुत से कारक हो सकते हैं जो अध्ययन के परिणामों केा प्रभावित कर सकते हैं। पुनरावृत्ति के द्वारा इस तरह के समस्या का समाधान किया जा सकता है । यदि किसी प्रयोग में 15-15 प्रयोज्य प्रयोगात्मक तथा नियन्त्रित समूह में है तथा उनका आबंटन यादृच्छिक विधि से किया गया है तो यह एक प्रयोग न होकर 15 समानान्तर प्रयोग होते हैं। प्रत्येक जोड़े को अपने आप में एक प्रयोग माना जाता है।
प्रयोगात्मक अभिकल्प :
जिस प्रकार कोई भवन निर्माणकर्ता किसी भवन के निर्माण के लिये पहले एक ब्लूप्रिन्ट तैयार करता है, उसी प्रकार एक शोधकर्ता शोध कार्य केा सुचारू रूप से करने के लिए एक प्रयोगात्मक अभिकल्प (Research Design) तैयार करता है। प्रायोगिक अभिकल्प में उन चरों का वर्णन किया जाता है जिनका हमें अध्ययन करना हेाता है, चरों को मापने के लिए जिन उपकरणों का प्रयोग किया जाएगा उसका वर्णन किया जाता है, न्यादर्श जिसका हमें अध्ययन करना है उसका वर्णन किया जाता है, ऑकड़ों को इकट्ठा करने की विधि तथा आंकड़ो को विश्लेषित करने की सांख्यिकीय विधियों के बारे में बताया जाता है।
1. प्रयोगात्मक अभिकल्प प्रसरण नियन्त्रण प्रणाली के रूप में (Experimental Design as Variance Control Mechanism) :- शोध अभिकल्प केा प्रसरण नियन्त्रण प्रणाली के रूप में देखा जाता है। इसमें प्रसरण केा नियन्त्रित किया जाता है। प्रयोगात्मक प्रसरण (Experimental variance) या क्रमबद्ध प्रसरण (Systematic variance) को उच्चतम किया जाता है, त्रुटि प्रसरण (Error variance) केा निम्नवत किया जाता है तथा वाहय चरों (Extraneous variables) का नियन्त्रण किया जाता है। प्रायोगात्मक अभिकल्प के द्वारा प्रसरण को नियन्त्रित करने के सांख्यिकीय सिद्धान्त केा ‘‘अधिकतम-न्यूनतम-नियन्त्रण सिद्धान्त’’ (Principal of Max-Min-Con) कहा जा सकता है।
2. प्रयोगात्मक प्रसरण को अधिकतम करना (Maximize Experimental Variance) – प्रयोगात्मक प्रसरण का अर्थ है- आश्रित चर में उत्पन्न प्रसरण जो कि शोधकर्ता द्वारा स्वतन्त्र चर मे जोड़-तोड़ करके किया जाता है। शोध अभिकल्प का तकनीकी उद्देश्य होता है कि प्रयोगात्मक प्रसरण को अधिकतम किया जाए। शोध अभिकल्प ऐसा हेा जिसमें जहां तक सम्भव हो प्रयोगात्मक अवस्थाएं (Experimental Conditions) एक दूसरे से अधिक से अधिक अन्तर रखती हों। प्रयोगात्मक अवस्थाएं जितनी अधिक से अधिक भिन्न होगी, आश्रित चर पर उतना ही अधिक प्रयोगात्मक प्रसरण देखा जा सकेगा।
3. त्रुटि प्रसरण को निम्नतम करना (Minimize Error Variance ) - प्रयोगात्मक अभिकल्प का उद्देश्य है त्रुटि प्रसरणको निम्नतम करना। किसीभी प्रयोग में त्रुटि प्रसरण को कम करने का प्रयास किया जाना चाहिए। त्रुटि प्रसरण वैसे प्रसरण को कहा जाता है जो शोध में ऐसे कारकों से उत्पन्न होता है जेा शोधकर्ता के नियन्त्रण से बाहर होता है। व्यक्तिगत विभिन्नताओं के कारण त्रुटि प्रसरण होता है जो शोधकर्ता के नियन्त्रण से बाहर होता है।त्रुटि प्रसरण का दूसरा कारक मापन त्रुटियों से सम्बन्धित होता है। ऐसे कारकों में एक प्रयास से दूसरे प्रयास में होने वाली अनुक्रियाओं में भिन्नता, प्रयोज्यों द्वारा अनुमान लगाना तथा थकान आदि है।
त्रुटि प्रसरण केा प्रभावित करने वाले विभिन्न कारक एक दूसरे से अन्तक्रिया करके एक-दूसरे से प्रभाव को समाप्त करने की प्रवृत्ति रखते हैं। इस प्रवृत्ति के कारण त्रुटि प्रसरण को आत्मपूरक (Self-Compensating) कहा जाता है। त्रुटि प्रसरण यादृच्छिक त्रुटियों पर आधारित होता है इसलिये यह अपूर्वकथनीय (Unpredictable) होता है।त्रुटि प्रसरण को दो विधियों से कम किया जा सकत
(i) नियन्त्रित दशाओं में यदि प्रयोग किया जाए तो त्रुटि प्रसरण को कम किया जा सकता है।
(ii) मापन की विश्वसनीयता को बढ़ाकर त्रुटि प्रसरण को निम्नतम किय जा सकता है।
4. वाह्य चरों को नियन्त्रित करना (To Control Extraneous Variable) :- वाह्य चरों का जहां तक सम्भव हो नियन्त्रण किया जाना चाहिये। वाह्य चरों का नियन्त्रण कर्इ विधियों से किया जा सकता है, जैसे- विलोपन, यादृच्छिकीकरण, वाहय चर को स्वतन्त्र चर के रूप में बदलकर, प्रयोज्यो केा सुमेलित करके, समूहों को सुमेलित करके तथा सह प्रसरण विश्लेषण।

एक अच्छे प्रायोगिक अभिकल्प की कसौटी :
1. उपयुक्तता (Appropriateness) - प्रायोगिक अभिकल्प को उपयुक्त हेाना चाहिए तभी प्रयोग के विष्वसनीय परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं। प्रायोगिक अभिकल्प जटिल या सरल न हेाकर उपयुक्त होनी चाहिये। उपयुक्त अभिकल्प के चयन द्वारा शोधकर्ता अध्ययन की आवश्यकता केा ध्यान में रखते हुए वस्तुनिष्ठ विधि से प्रयोगात्मक अवस्थाएं व्यवस्थित करता है।
2. पर्याप्त नियन्त्रण (Adequacy of Control) - प्रायोगिक अभिकल्प ऐसा हेाना चाहिए जिसमें वाह्य चरों पर पर्याप्त नियन्त्रण किया जा सके। वाह्य चरों पर पर्याप्त नियन्त्रण से ही शोध के विश्वसनीय परिणाम प्राप्त किये जा सकते है। वाह्य चरों का नियन्त्रण कर्इ विस्थिायों से किया जाता है परन्तु यादृच्छिकीकरण के द्वारा सभी वाह्य चरों का नियन्त्रण किया जा सकता है।
3. वैधता (Validity) - किसी भी प्रायोगिक अभिकल्प के लिये तीसरी कसौटी है- वैधता। प्रायोगिक अभिकल्प को वैध होना चाहिए। वैधता दो प्रकार की होती है-आन्तरिक वैधता तथा वाहय वैधता।
4. आन्तरिक वैधता - प्रयोगात्मक शोध का उद्देश्य है कि स्वतन्त्र चर का प्रभाव आश्रित चर देखा जाए, इसके लिये सभी वाहय चरों पर नियन्त्रण किया जाए। किसी भी प्रयोगात्मक अभिकल्प में इस उद्देश्य को किस सीमा तक प्राप्त किया गया है, उसकी आन्तरिक वैधता केा बताता है। आन्तरिक वैधता मूलरूप से नियन्त्रण की समस्या से सम्बन्धित है। कैम्पबेल तथा स्टैनले के अनुसार आठ प्रकार के वाह्य चर किसी भी प्रायोगिक अभिकल्प की आन्तरिक वैधता को प्रभावित करते हैं।
(i) इतिहास (History) :- इतिहास का अर्थ है कछु अपत््रयाशित घटनाएं जो प्रयोग के समय सकारात्मक रूप से या नकारात्मक रूप से आश्रित चर को प्रभावित करती हैं। यदि किसी शिक्षक केा प्रयोग के लिए प्रशिक्षित किया जाए लेकिन प्रयोग पूरा होने से पहले उसका स्थानान्तरण हो जाए तो प्रयोग का परिणाम प्रभावित होगा। यदि किसी राजनीतिक कारण से अप्रत्याशित रूप से स्कूल बन्द हेा जाए प्रयोग के बीच में या छात्रों के द्वारा हड़ताल कर दी जाए तो यह सभी कारण प्रयोग के पारिणाम केा प्रभावित करेंगे । इन कारकों का प्रभाव भी आश्रित चर पर पड़ेगा।
(ii) परिपक्वता (Maturity) :- लम्बे समय तक चलने वाले पय्रोगो में यह देखा जाता है कि प्रयोग की अवधि में प्रयोज्यों में परिवर्तन, परिपक्वता की वजह से हो जाते हैं। उक्त सभी आश्रित चर में होने वाले परिवर्तन के कारण हो सकते हैं तथा प्रयोग के परिणाम केा प्रभावित करते हैं। यदि किसी प्रशिक्षण का प्रभाव हमें शैक्षिक उपलब्धि पर देखना है तथा प्रशिक्षण एव वर्ष का हो तो शैक्षिक उपलब्धि में होने वाला परिवर्तन केवल प्रशिक्षण का प्रभाव नही हो सकता। एक वर्ष में छात्रों की मानसिक योग्यता का विकास अधिक हो सकता है, उसके कारण भी शैक्षिक उपलब्धि बढ़ सकती है।
(iii) पूर्व-परीक्षण (Pre-testing ) :- बहतु से प्रयोगात्मक शोध में पूर्व - परीक्षण किये जाते हैं तथा फिर उपचार देने के बाद (स्वतन्त्र चर में जोड़-तोड़ करने के बाद) उसी परीक्षण को उन्हीं प्रयोज्यों पर पुन: प्रशासित किया जाता है। सामान्य रूप से यह देखने को मिलता है कि पूर्व-परीक्षण अभ्यास का कार्य करता है। पश्च-परीक्षण में जो प्राप्तांक आते हैं वह केवल उपचार के कारण न होकर पूर्व-परीक्षण का अभ्यास के रूप में कार्य करने के कारण भी हो सकता है तथा आन्तरिक वैधता केा प्रभावित करते हैं।
(iv) मापन त्रुटि (Measurement Error) :- किसी चर का मापन करने के लिए विभिन्न प्रकार के उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। यदि प्रयोग मे लाए गये उपकरण विश्वसनीय नहीं है तो प्रयोग की आन्तरिक वैधता प्रभावित होती है। शोधकर्ता यदि उपकरण का सही तरीके से प्रयोग नहीं कर पाता तथा यदि परीक्षण को प्रशासित करने के लिए प्रशिक्षण नहीं दिया गया तो चर के मापन में त्रुटि हो सकती है।
(v) सांख्यिकीय प्रतिगमन (Statistical Regression) :- कछु पय्रोगों में पूर्व-परीक्षण तथा पश्च-परीक्षण दोनों करना आवश्यक हेाता है। यदि शोधकर्ता किसी ऐसे प्रयोज्य का चयन कर लेता है जो अपने गुणों में या तो अति श्रेश्ठ है या निकृष्ट (Extreme cases) तो सामान्य रूप से ऐसा देखा जाता है कि जो प्रयोज्य पूर्व -परीक्षण पर निम्न अंक प्राप्त करते हैं वह पश्च-परीक्षण पर उच्च अंक प्राप्त करते हैं। जेा प्रयोज्य पूर्व-परीक्षण पर उच्च अंक प्राप्त करते हैं वह पश्र्च-परीक्षण पर निम्न अंक प्राप्त करते हैं इसे ही सांख्यिकीय प्रतिगमन कहते हैं। पश्च-परीक्षण पर प्राप्त अंक उपचार के कारण न हेाकर सांख्यिकीय प्रतिगमन के कारण हो सकते है। इस घटना से प्रयोग की आन्तरिक वैधता प्रभावित होती है।
(vi) प्रायोगिक नश्वरता (Experimental Mortality) :- जो पय्रोग लम्बे समय तक चलते हैं, उनमें सामान्य रूप से यह देखा जाता है कि प्रयोग की अवधि में ही कुछ प्रयोज्यों की अनुपलब्धता हो जाती है। प्रयोगकर्ता प्रायोगिक समूह तथा नियन्त्रित समूह में यादृच्छिकीकरण विधि से प्रयोज्यों को आबंटित करता है लेकिन बीच में कुछ प्रयोज्यों केा छोड़ देने से प्रयोग के अन्तिम परिणाम प्रभावित होते हैं।
(vii) चयन पूर्वाग्रह (Selection Bias) :- न्यादर्श को जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। यादृच्छिक न्यादर्श प्रविधियों के प्रयोग से ऐसा न्यादर्श चुना जा सकता है। यदि शोधकर्ता ने यादृच्छिक विधि से न्यादर्श चयन नही किया है या प्रयोगात्मक समूह तथा नियन्त्रित समूह को समतुल्य नहीं बनाया गया तो न्यादर्श का चयन सही नहीं होगा। इस कारण सही परिणाम नहीं प्राप्त हो सकेंगे।
(viii) चयन तथा परिपक्वता की अन्त:क्रिया (Interaction Effect ) :- न्यादर्श का चयन तथा परिपक्वता का प्रभाव प्रयोग की आन्तरिक वैधता केा प्रभावित करता है लेकिन इन दोनेां की अन्तर्क्रिया का प्रभाव भी आन्तरिक वैधता पर पड़ता है। इस तरह की अन्तर्क्रिया का प्रभाव उस स्थिति में पड़ता है जब उपचार को यादृच्छिक ढ़ंग से न आंबटित करके प्रयोज्य स्वयं किसी एक प्रकार के उपचार का चयन कर लेते हैं। किसी विशेष प्रकार के उपचार के चयन का कारण आश्रित चर को प्रभावित कर सकता है।
यदि दो विधियों से किसी एक प्रकरण को पढ़ाया जाए तथा इन विधियों की प्रभावशीलता का अध्यन किया जाए, तथा समूह का चयन ऐसे किया कि एक समूह में अधिक परिपक्व प्रयोज्य हो तो देानों विधियों की प्रभावशीलता का सही आंकलन नहीं किया जा सकता।
(ख) वाहय वैधता (External validity) :- किसी भी पय्र ागे के परिणामों को कितनी अधिक जनसंख्या में सामान्यीकृत किया जा सकता है यह उस प्रयोग की वाहय वैधता होती है। परिणामों को जितनी अधिक जनंसख्या पर सामान्यीकृत किया जा सकता है उस प्रयोग की वाहय वैधता उतनी ही अधिक होती है। वाहय वैधता केा निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं।
(i) पूर्व-उपचार (Pre- treatment) :- जब एक ही समहू नियन्त्रित तथा प्रयोगात्मक दोनों रूपों में कार्य करता है तो पूर्व-उपचार का प्रभाव वाहय वैधता पर पड़ता है। एक ही समूह केा बारी-बारी से नियन्त्रित समूह तथा प्रयोगात्मक समूह बनाया जाता है तो पूर्व-उपचार के प्रभाव केा पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता। इस स्थिति में उन प्रयोज्यों पर परिणामों केा सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता जिन पर पूर्व उपचार नहीं किया गया है।
(ii) प्रयोग की कृत्रिम परिस्थिति (Artificiality of Experimental Setting)- पय्रोगशाला अनसु न्धान (Laboratory Experiment) में लगभग सभी वाहय चरों केा नियन्त्रित करने का प्रयास किया जाता है और यही नियन्त्रण प्रयोग केा कृत्रिम बनाता है। वास्तविक जीवन की स्थितियों में इस प्रकार की कृत्रिमता नहीं होती और न ही यह सम्भव है कि कृत्रिम स्थितियों केा उत्पन्न किया जा सके। इसी कारण इन कृत्रिम परिस्थितियों में किए गये शोध के परिणामों केा सामान्यीकृत करने की बहुत सीमाएं हेाती है। इन परिस्थितियों में किए गये अनुसन्ध् ाानों की वाहय वैधता बहुत कम होती है।
प्रायोगिक अभिकल्प के प्रकार :
प्रायोगिक अभिकल्प विभिन्न प्रकार के हेाते हैं। इनमें अन्तर उनकी जटिलता तथा नियन्त्रण की पर्याप्तता का होता है। किसी भी प्रायोगिक अभिकल्प का चुनाव कुछ कारकों पर निर्भर करता है जैसे - प्रयोग के उद्देश्य तथा प्रकृति में, चरों के प्रकार पर जिन्हें संचालित (Monipulates) करना है, प्रयोग की सुविधा तथा प्रयोग की परिस्थितियों पर तथा शोधकर्ता की कार्यकुशलता पर। अभिकल्प रचना में सामान्यत: समूह के अक्षर G से, RG यादृच्छिक चयनित समूह, MG समेल समूह, T उपचार, C नियन्त्रण तथा O प्रेक्षण या निरीक्षण के लिये उपुयक्त किये जाते हैं। प्रायोगिक अभिकल्प को मुख्य रूप से तीन भागों में वर्गीकृत किया जाता है-

(1) पूर्व-प्रायोगिक अभिकल्प (Pre-experimental design)
(2) अर्ध प्रयोगिक अभिकल्प (Quasi-experimental design)
(3) वास्तविक प्रायोगिक अभिकल्प (True-experimental design)
1. पूर्व- प्रायोगिक अभिकल्प (Pre-experimental design) पूर्व प्रायोगिक अभिकल्प में वाहय चरों पर नियन्त्रण बहुत कम या बिल्कुल नहीं होता है। इसमें या तो नियन्त्रित समूह होता ही नही है और यदि होता भी है तो नियन्त्रित तथा प्रायोगिक समूह को समतुल्य नहीं बनाया जाता है । इस प्रकार के अभिकल्प सबसे कम प्रभावशाली होते हैं। यह तीन प्रकार के अभिकल्प होते हैं।
(i) एकल प्रयास अध्ययन (One shot case study) :- इस पक्रार के अभिकल्प में शोधकर्ता द्वारा एक समूह का चयन किया जाता है तथा उसकेा उपचार दिया जाता है तथा उस समूह पर पश्च-परीक्षण किया जाता है तथा परिणाम केा उपचार का कारण माना जाता है । इस अभिकल्प से प्राप्त परिणामों केा सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता है तथा इसमें आन्तरिक वैधता की कमी पायी जाती है।
G : TO
(ii) एकल समूह पूर्व परीक्षण-पश्च परीक्षण अभिकल्प (The Single group Pre-test treatment Post-test design) :- इस प्रकार के अभिकल्प में एक समूह का चयन किया जाता है उस पर पूर्व परीक्षण किया जाता है तथा आश्रित चर का मापन किया जाता है। इसके बाद उस समूह केा उपचार (Treatment) दिया जाता है। उपचार के बाद पश्च-परीक्षण किया जाता है तथा फिर से आश्रित चर का मापन किया जाता है। पूर्व-परीक्षण के बाद तथा पश्च-परीक्षण के बाद आश्रित चर के मानों के अन्तर केा उपचार का प्रभाव माना जाता है।
इस अभिकल्प में वाहय चरों पर कोर्इ नियन्त्रण नहीं किया जाता तथा इनमें केार्इ नियन्त्रित समूह नही होता है इसलिए प्रयोगात्मक शोध की दूसरी शर्त कि यदि ‘‘कारण नही है तो प्रभाव भी नहीं’’ केा सत्यापित नहीं किया जा सकता।
G : पूर्व परीक्षण O
G : T पश्च परीक्षण O
(iii) स्थिर समूह अभिकल्प (Static group comparison) :- इस पक्र ार के अभिकल्प में दो समूहों का चयन किया जाता है तथा एक समूह केा उपचार दिया जाता है तथा दूसरे समूह को किसी भी प्रकार का उपचार नहीं दिया जाता है। पश्च-परीक्षण दोनो समूहों का किया जाता है। दोनो समूहों के पश्च-परीक्षण के परिणामों में अन्तर उपचार का प्रभाव होता है, ऐसा माना जाता है। यद्यपि इस अभिकल्प में एक नियन्त्रित समूह होता है लेकिन नियन्त्रित तथा प्रयोगात्मक समूह केा समतुल्य नहीं बनाया जाता। यदि दोनों समूह में शुरू से ही आश्रित चर पर अन्तर होता है तो पश्च-परीक्षण के परिणामों में अन्तर केा पूरी तरह से उपचार का प्रभाव नहीं माना जा सकता। इस प्रकार के अभिकल्प में आन्तरिक वैधता की कमी पायी जाती है।
G1 : PRT T O POT
G2 : PRT T O POT
2. प्रायोगिक कल्प अभिकल्प (Quasi-experimental design) प्रायोगिक कल्प अभिकल्प में जहां तक सम्भव होता है वाहय चरों को नियन्त्रित किया जाता है। प्रयोग में दो समूह होते हैं प्रयोगात्मक समूह तथा नियन्त्रित समूह, लेकिन प्रयोगात्मक समूह तथा नियन्त्रित समूहों में प्रयोज्यों का आबंटन यादृच्छिक तरीके से न हो पाने के कारण दोनों समूहों केा समतुल्य नहीं बनाया जा पाता। बहुत सी ऐसी परिस्थितियां हेाती है जब यादृच्छिकीकरण से न्यादर्श का चयन नहीं हो सकता तथा यादृच्छिक आबंटन की अनुमति भी नहीं मिल पाती। इन परिस्थितियों में केवल प्रयोगिक कल्प अभिकल्प का ही प्रयोग किया जा सकता है।
(i) असमतुल्य पूर्व परीक्षण-पश्च परीक्षण अभिकल्प (Non Equivalent Pretest –Posttest design) :- कभी -कभी व्यवहारिक रूप से यह सम्भव नहीं होता है कि स्कूलों में या किसी स्कूल के दो वर्गो में यादृच्छिक आबंटन द्वारा दो समूह का निर्माण किया जा सके। इन परिस्थितियों में स्कूलों केा या किसी एक स्कूल के दो वर्गो को यादृच्छिक रूप से एक स्कूल या एक वर्ग को प्रयोगात्मक समूह या दूसरे स्कूल या दूसरे वर्ग केा नियन्त्रित समूह मान लिया जाता है। पूर्व-परीक्षण दोनों समूहों का किया जाता है जबकि उपचार केवल प्रायोगिक समूह केा दिया जाता है। पश्च-परीक्षण दोनों समूहों का किया जाता है। प्रयोगात्मक समूह के पूर्व-परीक्षण तथा पश्च-परीक्षण के बीच अन्तर ज्ञात किया जाता है तथा इसी प्रकार नियन्त्रित समूह के पूर्व-परीक्षण तथा पश्च-परीक्षण के अन्तर केा ज्ञात किया जाता है। यदि इन दोनों के बीच का अन्तर सार्थक होता है तो यह निश्कर्ष निकलता है कि उपचार प्रभावी है।
जब यादृच्छिक आबंटन सम्भव नहीं होता है तब इस अभिकल्प का प्रयोग किया जाता है। इस अभिकल्प की सबसे बड़ी सीमा यह है कि यदि दोनो समूहों में पूर्व-परीक्षण में आश्रित चर के मान में केार्इ अन्तर नहीं आता है तब तो ठीक है लेकिन यदि प्रारम्भिक अवस्था में दोनों समूहों में अन्तर आता है तो हम इस अन्तर केा सांख्यिकीय रूप से सह प्रसरण विश्लेषण प्रविधि के द्वारा नियन्त्रित करने का प्रयास करते हैं।
(ii) प्रति सन्तुलित अभिकल्प (Counter Balanced Design) :- जब हम समूहों केा यादृच्छिक रूप से आबंटित नही कर सकते हैं तथा हमें दो या तीन प्रकार के उपचार देने हेाते हैं तो इस प्रकार के अभिकल्प का प्रयोग किया जाता है। इस अभिकल्प में सभी समूहों केा सभी तरह के उपचार यादृच्छिक रूप से दिये जाते है। प्रत्येक समूह केा प्रत्येक तरह का उपचार क्रम बदल-बदल कर दिया जाता है। प्रयोग के शुरूआत में सभी समूहों पर पूर्व-परीक्षण किया जाता है तथा प्रत्येक समय अन्तराल के बाद पश्च-परीक्षण किया जाता है तथा अन्त में एक पश्च -परीक्षण सभी समूहों का किया जाता है।


यदि चार प्रकार के उपचार है तो हमें चार समूह लेगे। इस अभिकल्प में उपचारों की संख्या तथा समूहों की संख्या को संतुलित किया जाता है इसलिये इसे प्रतिसंतुलित अभिकल्प कहा जाता है। इस अभिकल्प में उच्च केाटि की आन्तरिक वैधता होती है।
3. वास्तविक प्रायोगिक अभिकल्प (True-experimental design) वास्तविक प्रायोगिक अभिकल्प में प्रायोगिक समूह तथा नियन्त्रित समूह केा यादृच्छिक आबंटन के द्वारा समतुल्य बनाया जाता है। इसी कारण इस अभिकल्प में आन्तरिक वैधता के सभी कारकेां को नियन्त्रित किया जाता है। वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में वास्तविक प्रायोगिक अभिकल्प का प्रयोग एक कठिन कार्य है क्योंकि इन परिस्थितियों में सभी चरों का नियन्त्रण सम्भव नहीं होता तथा यादृच्छिक आबंटन भी सम्भव नहीं हो पाता। इस अभिकल्प का प्रयोग एक कठिन कार्य है लेकिन जहाँ तक सम्भव हो इसी प्रकार के अभिकल्प का प्रयोग किया जाना चाहिए क्येांकि इसमें प्रयोगात्मक शोध के सभी सिद्धान्तों का पालन किया जाता है।वास्तविक प्रयोगिक अभिकल्प कर्इ प्रकार के होते हैं :-
(i) केवल पश्च समतुल्य समूह अभिकल्प (The Post test only, Equivalent Groups Design) :- इस अभिकल्प में यादृच्छिक आबंटन के द्वारा दो समतुल्य समूह बनाए जाते हैं। किसी एक समूह केा यादृच्छिक रूप से उपचार दिया जाता है तथा उसे प्रायोगिक समूह मान लिया जाता है तथा दूसरे समूह को नियन्त्रित समूह मान लिया जाता है। उपचार केवल प्रायोगिक समूह केा दिया जाता है लेकिन आश्रित चर का मापान दोनों समूहों के लिये किया जाता है। दोनों समूहों में आने वाला अन्तर उपचार का प्रभाव माना जाता है। इस अभिकल्प में समूहों का निर्माण यादृच्छिक आबंटन के द्वारा होता है इसलिये इन दोनों समूहों में समतुल्यता होती है। इस कारण आश्रित चर में आने वाला अन्तर उपचार का प्रभाव ही माना जाता है।
Gr1 (ER) T P0T
Gr2 (CR ) P0T
(ii) पूर्व परीक्षण पश्च समतुल्ल्ल्य समूह अभिकल्प (The Pre-test - Post Test Equivalent Groups Design) :- यह अभिकल्प पहले वाले अभिकल्प से केवल इसमें अन्तर रखता है कि इसमें पूर्व परीक्षण भी किया जाता है। इस अभिकल्प में यादृच्छिक आबंटन के द्वारा प्रायोगिक समूह तथा नियन्त्रित समूह में प्रयोज्यों केा रखा जाता है तथा दोनों समूहों का पूर्व-परीक्षण किया जाता है। इसके बाद शोधकर्ता केवल प्रायोगिक समूह केा उपचार देता है। प्रयोग के अन्त में दोनों समूहों पर पश्च-परीक्षण किया जाता है । आश्रित चर का मापन किया जाता है। पूर्व-परीक्षण तथा पश्च-परीक्षण के बीच आने वाले अन्तर को उपयुक्त सांख्यिकीय प्रविधियों के द्वारा ज्ञात किया जाता है। यदि दोनों के बीच सार्थक अन्तर आता है तो इसे उपचार का प्रभाव माना जाता है।
Gr1 (ER) PrT T P0T
Gr2 (CR ) PrT - P0T
(iii) सोलोमन चार समूह अभिकल्प (Soloman Four Groups Design) :- कभी-कभी पूर्व परीक्षण का प्रभाव उपचार के प्रभाव केा प्रभावित करता है। पूर्व-परीक्षण के प्रभाव को ज्ञात करने के लिये इस अभिकल्प का प्रयोग किया जाता है। इस अभिकल्प में चार समूह होते हैं। दो प्रायोगिक समूह होते हैं जिसमें एक पर पूर्व-परीक्षण किया जाता है तथा दूसरे समूह पर कोर्इ पूर्व परीक्षण नहीं किया जाता है। इसी प्रकार दो नियन्त्रित समूह होते हैं एक में पूर्व-परीक्षण किया जाता है तथा दूसरे में केार्इ पूर्व-परीक्षण नहीं किया जाता है। इन सभी समूहों में प्रयोज्यों की आबंटन यादृच्छिक विधि से किया जाता है। पश्च परीक्षण चारों समूहेां पर किया जाता है।
Gr1      ER       Pr T1       T       P0 T1
Gr2       CR       Pr T2       _       P0 T2
Gr3       ER       _       T       P0 T3
Gr4       CR       _       _       P0 T4


वर्णनात्मक बनाम प्रायोगिक अनुसंधान
वर्णनात्मक अनुसंधान और प्रयोगात्मक अनुसंधान दो प्रकार के अनुसंधान हैं जो उनके विशेषताओं में उनके बीच कुछ अंतर दिखाते हैं। जब अनुसंधान की बात करते हैं, तो विभिन्न प्रकार के शोध होते हैं जैसे वर्णनात्मक अनुसंधान और प्रयोगात्मक अनुसंधान प्रत्येक श्रेणी में, कई शोध विधियों का उपयोग किया जा सकता है चूंकि इस लेख का दायरा वर्णनात्मक और प्रयोगात्मक अनुसंधान है, सबसे पहले, हम इन दो शोधों को परिभाषित करते हैं। वर्णनात्मक शोध अध्ययन के संदर्भ में एक घटना का वर्णन करता है या फिर किसी समूह का अध्ययन करता है। यह समूह या घटना की विभिन्न विशेषताओं की पड़ताल करता है। दूसरी तरफ, प्रयोगात्मक अनुसंधान से पता चलता है कि शोधकर्ता ने निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए वेरिएबल का उपयोग किया है या फिर निष्कर्षों में आने के लिए। 
·       वर्णनात्मक शोध में, शोधकर्ता एक अध्ययन समूह या एक घटना के विभिन्न विशेषताओं को समझने की कोशिश करता है इसके लिए, शोधकर्ता सर्वेक्षण, साक्षात्कार, अवलोकन पद्धति, मामले के अध्ययन आदि जैसे कई शोध विधियों का उपयोग कर सकता है।
·       प्रायोगिक अनुसंधान एक शोध है, जहां निष्कर्ष पर पहुंचने वाले शोधकर्ता द्वारा चर का उपयोग किया जाता है - या निष्कर्षों में आ सकता है वर्णनात्मक अनुसंधान के मामले में विपरीत, प्रयोगात्मक अनुसंधान में, जनसंख्या का वर्णन करने पर ध्यान नहीं दिया जाता है;परिकल्पना का परीक्षण मुख्य ध्यान है अर्ध-प्रयोगों, एकल विषय अध्ययन, सहसंबंध अध्ययन आदि जैसे विभिन्न प्रकार के प्रयोग हैं।
·       वर्णनात्मक अनुसंधान: वर्णनात्मक शोध एक शोध का संदर्भ देता है जो एक घटना का वर्णन करता है या फिर किसी समूह के अध्ययन के तहत।
·       प्रायोगिक अनुसंधान: प्रायोगिक अनुसंधान शोध को संदर्भित करता है जहां शोधकर्ता निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए चर का उपयोग करता है या फिर निष्कर्षों में आने के लिए।


बुधवार, 8 नवंबर 2017

जनसंपर्क एवं विज्ञापन की आचार संहिता

जनसंपर्क एवं विज्ञापन की आचार संहिता
लेखक- डॉ. रामशंकर
            किसी भी लोकतंत्र में जनसंपर्क को उसकी सफलता की धुरी माना जाता है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में जनसंपर्क के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है क्योंकि लोकतंत्र में पग-पग पर जन स्वीकृति नितांत आवश्यक होती है। आज जनसंपर्क विधा कला एवं सामाजिक विज्ञान के मिले जुले रूप से
अपना एक नया स्वरूप निर्मित कर रही है, जो सूचना तथा संप्रेषण पर आधारित है। सामान्य संदर्भ में हम कह सकते हैं कि मानव अपने संपर्क की कला द्वारा जनसंपर्क की संगठन या संस्था के लिए सार्वजनिक अनुकूलता प्राप्त करने का एक आधुनिकतम विज्ञान है जिसमें संप्रेषण के विभिन्न माध्यमों का प्रयोग किया जाता है। वर्तमान में जनसंपर्क एक ऐसी प्रबंधकीय और प्रशासकीय प्रक्रिया है जो जनता के हितों को दृष्टिगत रखती है। जनसंपर्क जनता में सामाजिक, राजनैतिक बुराइयों की विरोध की मानसिकता को तैयार कर उन बुराइयों के विरुद्ध जब जनमत का निर्माण करता है तो उसमें जनपक्ष के हितों की प्रबलता होती है। उदाहरणार्थ, जघन्य बीमारियों के विरुद्ध, दहेज के विरुद्ध, महिला उत्पीड़न के विरुद्ध तथा अन्य बुराइयों के विरुद्ध जनता में समझ विकसित करने के लिए समय समय पर अनेक जनसंपर्कीय कार्यक्रम चलाये जाते हैं।
             “जन-संपर्क का मूल उद्देश्य है- अपेक्षित दिशा में जनमत का निर्माण।”1 आजादी से पूर्व स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में सुव्यवस्थित प्रयास के रूप में जनसंपर्क ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। महात्मा गांधी तथा अन्य नेताओं ने जनसंपर्क के माध्यम से ही भारतीय जनमानस में संघर्षमयी राष्ट्रीय चेतना का संचार कर आजादी के मार्ग को आगे बढ़ाया। गांधी जी की दांडी यात्रा जनसंपर्क का एक विशिष्ट रूप है।
            जनसंपर्क का लक्ष्य, नीति और कार्य से जनता को सूचित व जागृत करना तथा उसके विचारों और भावनाओं को प्रेरित व शिक्षित कर अपने पक्ष में एक आम समझ व जनमत का निर्माण करना होता है। आज किसी भी संस्था की साख बनाने के लिए जनसंपर्क एक आवश्यक अंग माना जाता है। सरकारों के अलावा निजी संस्थाएं भी जनसंपर्क के माध्यम से अपनी साख बनाने का कार्य करती है। जनसंपर्क को संक्षेप में ऐसा कार्य कहा जाता है, जिसे जनता द्वारा सराहा जाए। जनसंपर्क का पहला तत्व है अच्छा प्रदर्शन। किसी संगठन या किसी संस्था का जनता के साथ जो संबंध बनता है, उससे जनसंपर्क बढ़ता है।
            जनसंपर्क के लिए लोक-संपर्क शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। जन अथवा लोक तथा संपर्क, दो शब्दों से मिलकर बना यह शब्द जनता से संपर्क को प्रतिबिम्बित करता है। जनसंवाद भी इसी अर्थ का द्योतक है जिसमें आपस में साम्य की स्थिति उत्पन्न कर संवाद (बातचीत) किया जाता है। “जनसंपर्क को अंग्रेजी में पब्लिक रिलेशन अर्थात जनता से संबंध। इसे संक्षिप्त में पी आर कहते हैं। ‘पी’ का तात्पर्य परफ़ार्मेंस (Performance) तथा ‘आर’ रिकगनिशन (Recognition) या स्वीकृत से लिया जाता है।”2
            जनसंपर्क में जन शब्द का अर्थ जनता से है जिसका सामान्य अर्थ मानव समूह से लिया जाता है। जनता का अंग्रेजी शब्द Public है। Public शब्द लैटिन भाषा के Publicus शब्द से बना है जिसका सामान्य अर्थ जन समूह होता है। जनता की एकता एक स्थान पर एकत्र होने से नहीं बल्कि समान विचारों के आपस में सामंजस्य से होती है। जनता को और अधिक स्पष्ट करते हुये विचारक डेविस कहते हैं कि “जनता एक विचारशील तथा भावात्मक समूह है।”3 जो लोग एक विषय या समस्या पर समान विचार रखते हैं, वे जनता हैं।  दूसरा शब्द ‘संपर्क’ है जिसका सामान्य अर्थ किसी एक का किसी दूसरे के साथ दैहिक या मानसिक स्पर्श संबंध उपस्थित होना अर्थात परस्पर संबंध भाव स्थापित होना ही संपर्क है।
            सामान्य अर्थ में जनसंपर्क, जनता से संपर्क है। जनसंपर्क द्विपक्षीय संप्रेषण है, जिसमें सहमति के आधार पर सत्य व ज्ञान पर आधारित सम्पूर्ण सूचनाएँ उपलब्ध कराकर आपसी सौहार्द संबंध निर्मित किए जाते हैं। जनसंपर्क के अंतर्गत विवेकयुक्त योजनाबद्ध सतत प्रयास से ज्ञानवर्धक व उपयोगी सूचनाओं द्वारा किसी व्यक्ति, संगठन व संस्थान का दूसरे व्यक्तियों, विशिष्ट जनता या समुदाय के साथ परस्पर घनिष्ठ संबंध स्थापित किया जाता है। जनसंपर्क के विशेषज्ञ एडवर्ड एल. बर्नेज ने जनसंपर्क के संदर्भ में कहा है कि “सूचना के आधार पर जनता तथा किसी संस्थान के व्यवहार एवं क्रिया को निश्चित लक्ष्य की ओर परिवर्तित करने की प्रक्रिया जनसंपर्क है, जिसमें संस्थान और जनता दोनों की सहभागिता महत्त्वपूर्ण होती है।”4  सामान्यतः समाज द्वारा अपनाए गए द्विपक्षीय प्रयास को आधार मानकर वर्तमान का निर्माण करना ही जनसंपर्क कहा जा सकता है।
            उपरोक्त विचारकों एवं विश्लेषकों के कथन एवं शब्दों के उदघटन के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि जनसंपर्क एक सतत चलने वाली योजनाबद्ध प्रक्रिया है। जनसंपर्क के अंतर्गत निरंतर प्रयास के द्वारा संगठन एवं जनता के बीच परस्पर सहमति बनाए रखी जाती है। जब कोई जनता, संगठन या संस्था के योजनाबद्ध प्रयास द्वारा जनसंपर्क के माध्यम से जनता के लिए के लिए सही सूचना और तथ्य जुटाकर अपने अनुकूल वातावरण का निर्माण करती है तो  संस्था व संगठन के छवि निर्माण होने पर भी जनसंपर्क की भूमिका समाप्त नहीं हो जाती बल्कि वांछित छवि को बनाए रखने के कुछ समय के लिए या दीर्घ अवधि तक निरंतर प्रयत्नशील व सक्रिय रहना पड़ता है।
जनसंपर्क आचार संहिता
            सामाजिक संदर्भ में प्रत्येक कार्य हेतु समाज के द्वारा निर्धारित एक नियम प्रक्रिया का पालन करना होता है ताकि व्यवस्थ को सुचार रूप से क्रियान्वित किया जा सके। आचार-संहिता के अनुरूप रहकर एक अच्छे समाज की संकल्पना की जा सकती है। जनसम्पर्क व्यवसाय की भी अपनी एक आधारभूत आचार संहिता है जिसको प्रत्येक जनसंपर्क कर्मी द्वारा स्वीकारा जाता है। विभिन्न देशों की जनसंपर्क की परिषदें हैं जिसमें भारत भी शामिल है एक अंतर्राष्ट्रीय जनसंपर्क नीति का अनुसरण कर रहीं हैं। एसे कोड ऑफ एथेंस के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि वर्ष 1965 में अंतर्राष्ट्रीय जनसंपर्क सम्मेलन एथेंस में हुआ था, उस सम्मेलन में आचार संहिता संबंधी विषय पर विमर्श किया आचार संहिता बनाई गयी थी।
जनसंपर्क की अंतर्राष्ट्रीय आचार संहिता
            संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य देश इस बात पर सहमत हैं और विश्वास प्रगत करते हैं कि सभी देशों के  प्रतिष्ठान या संस्था के सभी सदस्य जनसंपर्क की आचार संहिता का पालन करेंगे। जनसंपर्क कार्यकर्ताओं को दिशा निर्देश देने वाले सरकारी गज़ट में प्रकाशित जनसंपर्क नियमावली डॉ. कुमुद शर्मा की पुस्तक ‘जनसंपर्क प्रबंधन’ से यहां उद्घटित किया गया है-
जनसंपर्क व्यवसायकर्ता और प्रेस अधिकारी की परिभाषा5
            सूचना मंत्रालय के अधिकारों से संबद्ध मूल आज्ञा-पत्र नं. 65-1523, दिनांक 19 दिसंबर, 1962 ई. संशोधित आज्ञा-पत्र नं. 61-898, 26 अगस्त, 1964 ई. के अनुसार-
धारा एक : जनसंपर्ककर्ता, चाहे वह किसी संगठन या संस्था से संबंधित है अथवा स्वतंत्र रूप से व्यवसाय करता है, उसका कर्तव्य है कि वह अपनी संस्था या संगठन को,जिसके सेवार्थ वह नियुक्त है उसे जनता से सह-अभिमति और आपसी विश्वास के आधार पर संपर्क स्थापित करने में परामर्श दे और उसे कार्यान्वित करे। वह जनता को संगठन की उपलब्धियों और कार्यों से भलीभांति परिचित रखे।
इन कर्तव्यों का विस्तार करके इनमें संगठन और कर्मचारियों के मध्य आपसी सम्बन्धों को भी सम्मिलित किया जाय। जनसंपर्ककर्ता संगठन की नीतियों को लागू करके उनके परिणामों की जांच का भी जिम्मेदार है।
संगठन के बारे में वह जो भी सूचना दे, उसका स्रोत स्पष्ट हो और यह सूचना तथ्यात्मक एवं बिना किसी व्यावसायिक प्रचार, प्रोपेगेंडा और विज्ञापन सामग्री के ही हो।
धारा दो : प्रेस अधिकारी उपर्युक्त कर्तव्यों का पालन प्रेस, रेडियो, फिल्म और टेलीविज़न के माध्यमों से संपर्क विशेषज्ञ के रूप में करेगा।
धारा तीन : जनसंपर्क कर्ता और प्रेस अधिकारी के कार्य का व्यावहारिक रूप एक एक कार्यरत पत्रकार (प्रोफेशनल जर्नलिस्ट) और विज्ञापन एजेंट से भिन्न है।
धारा चार : प्रेस और जनसंपर्क के कार्य का पारिश्रमिक वह ग्राहक या संगठन देगा जिसके लिए यह कार्य किया जाएगा।
धारा पाँच : यह रेगुलेशन ‘जनरल ऑफ़िशियल द लॉ रिपब्लिक फ्रांस’ में प्रकाशित किया जाएगा।  
अंतर्राष्ट्रीय जनसंपर्क संस्था की आचार- संहिता के अनुसार जनसंपर्क संस्थाओं का प्रत्येक सदस्य निम्न अर्थों में आचार संहिता के आदेशों का पालन करेगा-
1.      मानव के समग्र विकास में सहयोग करेगा।
2.      उसका प्रयत्न होगा कि वह ऐसी संचार व्यवस्था कायम करे जो सही व तथ्यपरक सूचनाओं का निर्बाध प्रवाह प्रत्येक सदस्य तक पहुंचा सके।
3.      वह अपने व्यवसाय और जनता के बीच संतुलित संबंध बनाए रखने की दिशा में प्रयत्नशील रहेगा।
4.      मानवअधिकारों के मौलिक घोषणापत्र का सम्मान करते हुये वह कार्यक्रमों को कार्यान्वित करेगा।
5.      प्रत्येक मनुष्य की गरिमा और उसके अधिकार का पूर्ण आदर करेगा।
6.      मनुष्य की नैतिक, मनोवैज्ञानिक और बौद्धिक प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करेगा, ताकि वे विचार विमर्श प्रक्रिया में भागीदारी निभा सकें।
जनसंपर्क की अंतरराष्ट्रीय आचार संहिता में प्रमुख वर्जनाएं –
1.      असत्य वर्जित है। ऐसे तथ्यों को नहीं प्रसारित किया जाएगा जिनकी पुष्टि न हो सके।
2.      किसी ऐसे कम में सहयोग देना वर्जित है जिसका संबंध अनैतिकता या हेरा-फेरी से हो।
3.      ऐसे असाधारण साधनों अथवा तकनीक का प्रयोग वर्जित है जो मानवीय प्रवित्तियों को इस प्रकार उकसाये कि मनुष्य स्वयं पर नियंत्रण न रह सके।
            21 अप्रैल, 1968 को अखिल भारतीय जनसंपर्क की पहली बैठक नई दिल्ली में आयोजित हुई। सम्मेलन में आचार संहिता के उपरोक्त सभी महत्त्वपूर्ण बिंदुओं पर सभी सदस्यों से अपेक्षा की गयी हैं।
अंतरराष्ट्रीय जनसंपर्क संघ6  ने भी एक नियमावली तैयार की है, जिसके अनुसार –
1.      जनसंपर्ककर्ता को अपने ग्राहकों, नियोक्ता और उससे संबंधित लोगों के साथ स्पष्टता व ईमानदारी से पेश आना चाहिए।
2.      जनसंपर्ककर्ता को जनहित अथवा जन-रुचि को ध्यान में रखते हुये अपने कार्य विशेष से जुड़ी गतिविधियों को आगे बढ़ाना चाहिए।
3.      कंपनी का जनसंपर्क किसी भी ऐसी गतिविधि में शामिल जिससे कंपनी और जनता के मध्य जनसंचार के माध्यमों को लेकर किसी तरह का तनाव उत्पन्न हो।
4.      जनसंपर्ककर्ता संस्थान या संथा का उपयोग घोषित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही करेगा।
5.      कंपनी से विवाद के क्षणों के बाद किसी भी ऐसे समाचार या तथ्य का प्रसारण नहीं करेगा जिसको कंपनी गुप्त रखना चाहती है।
6.      जनसंपर्ककर्ता किसी भी विभागीय सदस्य को व्यापार के प्रति आकर्षित करने के लिए विज्ञापन या गलत अनुमति नहीं देगा। सदस्य को किसी अन्य संस्था या संगठन से सम्बद्ध नहीं होना चाहिए जिसकी संस्था से कोई संबंध न हो।
            जनसंपर्क के क्षेत्र में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक आचार संहिताएँ बनीं हैं जिसके मूलतः लगभग एक जैसे दिशा निर्देश दिये गए हो। जनसंपर्क और मीडिया में जहां कई जगह इन आचार- संहिताओं का पालन हो रहा है तो कहीं धड़ल्ले से इसका उल्लंघन भी हो रहा है। आज आवश्यकता है कि जनसंपर्क और पत्रकारिता के क्षेत्र में आचार-संहिता का निष्ठापूर्वक पालन करते हुये व्यावसायिक और सामाजिक दयितत्व का निर्वहन किया जाए तभी आचार-संहिता की उपयोगिता सिद्ध हो पाएगी।
विज्ञापन संबधित कानून
विकसित एवं प्रोत्साहित करने के लिए आचार के निम्नलिखित मानक निर्धारित किए जाते हैं। इन नियमों के अनुपालन की जिम्मेदारी विज्ञापनकर्ता और विज्ञापन एजेंसी दोनों की समान रूप से है । उन सभी से, जो विज्ञापन कार्य में लगे हुए हैं, यह जोरदार सिफारिश की जाती है कि वे देश में विज्ञापनों पर प्रभाव डालने वाले विधानसे औरविशेष रूप से निम्नलिखित अधिनियमों और उनके अधीन बनाए गए नियमों की अच्छी प्रकार से जानकारी प्राप्त कर लें:-
औषधि और प्रसाधन अधिनियम,1940
औषधि नियंत्रण अधिनियम, 1950
औषधि और चमत्कारिक उपचार (आक्षेपणीय विज्ञापन) अधिनियम,1954प्रतिलिप्याधिकार अधिनियम,1957
व्यापार और पण्य वस्तु चिन्ह अधिनियम, 1958
खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954
 पुरस्कार प्रतियोगिता अधिनियम, 1955
संप्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोग निवारण) अधिनियम, 1950
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986
महिला अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986


विज्ञापन में आचार-संहिता के सामान्य नियम
विज्ञापन इस तरह डिजाइन किया जाना चाहिए कि वह देश की विधि केअनुरूप हो और लोगों की नैतिकता, शालीनता और धार्मिकभावनाओं पर आक्षेप न करता हो ।किसी भी ऐसे विज्ञापन के लिए अनुमति नही दी जाएगी जो
        I.            किसी प्रजाति, जाति, रंग, धर्म और राष्ट्रीयता का उपहास करता हो ।
     II.            भारत के संविधान के किसी निर्देशक सिद्धांत किसी अन्य उपबंध के विरुद्ध हो ।
   III.            लोगों को अपराध की ओर बढ़ावा देता है या अशान्ति, हिंसा या कानून भंगकरने को बढ़ावा देता है अथवा किसी भी प्रकार से हिंसा या अश्लीलता को महिमामंडित करता है;
  IV.            आपराधिक भावना को वांछनीय बतलाता है;
    V.             विदेशी राज्यों के साथ् मैत्रीपूर्ण संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है;
  VI.            राष्ट्रीय प्रतीक या संविधान के किसी भाग या किसी व्यक्ति या किसी राष्ट्रीय नेता या राज्य के उच्चाधिकारी के व्यक्तित्व का अनुचित लाभ उठाता हो;
VII.            सिगरेट और तम्बाकू उत्पादों, मदिरा, शराब और अन्य मादक पदार्थों के बारे में है या उन्हें बढ़ावा देता है;
VIII.            महिलाओं के चित्रण में सभी नागरिकों की स्थिति एवं अवसर की समानता तथा व्यक्तिगत मान मर्यादा की संवैधानिक गारंटी काउल्लंघन करता है । विशेषकर, किसी भी ऐसे विज्ञापन की अनुमति नहीं दी जाएगी जिसमें महिलाओं की अपमानजनक छविप्रस्तुत की गई हो । महिलाओं का चित्रांकन इस ढंग से कदापि नहीं किया जाना चाहिए जो निष्क्रियता एवं दब्बु स्वभाव पर बल देता हो और परिवार एवं समाज में उनकी अधीनस्थ और गौण भूमिका को प्रोत्साहित करता हो ।  
     संदर्भ ग्रंथ-

1.      राय,अ.कु. संचार के सात सोपान (2006). नई दिल्ली : यूनिवर्सिटी प्रकाशन नई दिल्ली. पृष्ठ संख्या-371
2.      कुमार, अमित ‘जनसंपर्क’ (2006). नईदिल्ली : डायमंड पॉकेट बुक्स(प्रा.) लि X-30, ओखला मार्ग इंडस्ट्रियल एरिया, फेज-2,पृष्ठ संख्या -8
3.      मिश्र, शिवगोपाल  ‘जनरल नॉलेज एनसाइक्लोपीडिया’ (2008). नई दिल्ली : प्रभात प्रकाशन, आसफ आली रोड़, पृष्ठ संख्या-124
4.      शर्मा, कुमुद ‘जनसंपर्क प्रबंधन’ (2006). दिल्ली : ज्ञान गंगा, 205-सी चावडी बाज़ार, पृष्ठ संख्या -14 
5.      वही, पृष्ठ संख्या -187-188
6.      वही, पृष्ठ संख्या- 194

7.      डॉ. तिवारी अर्जुन, ‘आधुनिक विज्ञापन कला एवं व्यवहार’ विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक वाराणसी   

शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

एक सरल संवादात्मक प्रक्रिया : टेलीकॉन्फ्रेंसिंग

एक सरल संवादात्मक प्रक्रिया : टेलीकॉन्फ्रेंसिंग
पृष्ठभूमि   
आज मानव समाज में तकनीक आधारित संचार हमारे दैनिक जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। पूरा समाज तकनीक पर ही आधारित हो चुका है। एक पल में हम और आप दुनिया के एक भाग से दूसरे भाग को संचार तकनीक के द्वारा सिर्फ बात-चीत ही नहीं कर रहे हैं बल्कि एक-दूसरे-तीसरे के बीच एक साथ टेली, वीडियो, कंप्यूटर और अब मोबाइल कान्फ्रेंसिंग कर एक-दूसरे से अपनी बात आनलाइन और लाइव शेयर कर सकते है। संचार क्रांति ने साइबर स्पेस ‘विलियम गिब्सन’ की फंतासी नहीं बल्कि वास्तविक दुनिया इसका हिस्सा बन चुकी है। आज टेली-मेडीसिन, टेली-डेमोक्रेसी, टेली-बिजनेस, टेली-शॉपिंग, साइबर सरवेंट आदि जीवन के हिस्सों के अंग बनते जा रहे हैं। आजकल कंप्यूटर, टेलीविजन और टेलीफोन द्वारा बैठक और संगोष्ठियाँ आयोजित करने का प्रचलन धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है।  
टेली कान्फ्रेंस-
टेलीकांफ्रेंसिंग एक इलेक्ट्रॉनिक साधन है जो एक विषय पर चर्चा करने के लिए दो या दो से अधिक भिन्न-भिन्न स्थानों पर स्थित दो या दो से अधिक व्यक्तियों को एक साथ मिला सकता है।
टेलीकांफ्रेंसिंग का अर्थ (meaning of teleconferencing)
   दूरवर्ती शिक्षा के लिए शैक्षिक टेलीकांफ्रेंसिंग एक महत्वपूर्ण माध्यम है।इसमें कई प्रकार के माध्यमो का प्रयोग किया जाता है और द्वि-पक्षीय प्रसारण द्वारा परस्पर कार्यशील सामूहिक सम्प्रेषण की सुविधा प्रदान की जाती है।
टेलीकांफ्रेंसिंग का शाब्दिक अर्थ (Literal meaning)- टेलीकांफ्रेंसिंग शब्द को 'दूर संवाद प्रणाली' या ' दूर संभाषण प्रणाली' भी कहा जाता है।
टेलीकांफ्रेंसिंग का अर्थ- एक दूसरे से दूर होते हुए भी प्रतियोगियों के बीच संवाद बनाये रखना है।टेली कान्फ्रेंसिंग का तात्पर्य दूरसंचार माध्यमों के द्वारा आयोजित होने वाले एक बैठक से होता है। यह इलेक्ट्रानिक्स तकनीकी साधनों द्वारा दो या अधिक स्थानों के बीच बैठे लोगों को जोड़ते हुए किसी मुद्दे पर बात-चीत के आयोजित है।
दूरसंचार साधनों द्वारा दो या दो से अधिक स्थानों पर तीन या तीन से अधिक व्यक्तियों का आपस में विचार-विमर्श करना टेली कान्फ्रेंस कहलाता है। संचार साधन के रूप में टेलीकान्फ्रेंसिंग तथा वीडियो कान्फ्रेंसिंग एक सशक्त माध्यम के रूप में सामने आया है। इसमें कई प्रकार के माध्यमों का प्रयोग किया जाता है और पारस्परिक समूह के द्वारा दो पक्षीय प्रसारण संप्रेषण की सुविधा होती है। सामान्यतः टेली कान्फ्रेंसिंग के सात प्रकार इस प्रकार निम्नलिखित हैं-
1.      आडियो टेली कान्फ्रेंसिंग (Audio Tele Conferencing)
2.      विडियो टेली कान्फ्रेंसिंग (Video Tele Conferencing)
3.      आडियो ग्राफिक टेली कान्फ्रेंसिंग (Audio graphic Tele Conferencing)
4.      कंप्यूटर टेली कान्फ्रेंसिंग (Computer Tele Conferencing)
5.      मोबाइल कान्फ्रेंसिंग (Mobile Tele Conferencing)
प्रौद्दोगिकी के क्षेत्र के अनुसार इसके प्रयोग अलग-अलग है, लेकिन टेली कान्फ्रेंसिंग के कुछ सामान्य कारक निम्नलिखित है- एक दूरसंचार चैनल का उपयोग, कई स्थानों पर लोगों को लिंक करना, परस्पर द्वि-मार्गी संचार के लिए, सक्रिय भागीदारी आदि।
संवादात्मक तकनीक (Interactive Technologies)-
उपयोगकर्ता को जवाबी बात करने की क्षमता एवं नए सिस्टम के तहत अन्तरक्रियाशीलता का ज्ञान क्षमता बढ़ती है। इसके द्वारा हम उपग्रहों, कंप्यूटर, Tele text, View Data, कैसेट, केबल, और videodiscs सभी को एक उभरते पैटर्न में के रूप में देख सकते हैं। इससे व्यक्तियों, जन-दर्शकों के बीच  एक जानकारी दिया जा रहा है जो हमें इस प्रक्रिया में एक सक्रिय भूमिका लेने के लिए तरीके प्रदान करते हैं। इन प्रौद्दोगिकी के सहारे एक विशेष संदेश को बृहद स्तर पर दर्शकों के बीच प्रत्येक व्यक्ति के साथ बातचीत की जा सकती है।
1.      आडियो टेली कान्फ्रेंसिंग (Audio Tele Conferencing)-
आडियो कान्फ्रेंस में भाग लेने वाले व्यक्ति एक-दूसरे से बात-चीत कर सकते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे को देख नहीं सकते हैं। इस प्रकार के कान्फ्रेंस सामान्यतः टेलीफोन के द्वारा आय फिर प्रथम जेनरेशन के मोबाइल द्वारा किए जाते है। इस टेली कान्फ्रेंसिंग में आवाज ही प्रमुख होता है और कभी कभी सम्मेलन बुला बुलाया। संवादात्मक टेलीफोन लाइनों के माध्यम से दूर-दराज के स्थानों में लोगों को जोड़ता है। सभी लाइनों को जोड़ने का ऑडियो एक पुल का काम का करता है। बैठक ऑडियो सम्मेलन के माध्यम से आयोजित किया जा सकता है। पूर्व की योजना बना, एक एजेंडा तय कर और समीक्षा बैठक भी की जा सकती है। दूरस्थ शिक्षा ऑडियो सम्मेलन द्वारा आयोजित किया जा सकता है। वास्तव में, यह उपयोग के तहत सबसे अधिक में से एक, अभी तक शिक्षा के लिए उपलब्ध लागत प्रभावी तरीकों है। अनुदेशक सबसे अच्छा दूरस्थ शिक्षा के अन्य रूपों को बढ़ाने के लिए ऑडियो सम्मेलनों का उपयोग करने के बारे में प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए।
2.      वीडियो टेली कान्फ्रेंसिंग (Video Tele Conferencing)-
विडियो कान्फ्रेंसिंग में भाग लेने वाले लोग एक-दूसरे को देख भी सकते हैं तथा आपस में एक-दूसरे से बात भी कर सकते हैं। विडियो कान्फ्रेंसिंग और वीडियो चित्र प्रदान करने के लिए वीडियो को जोड़ती है। एक तरह से वीडियो / दो तरह से ऑडियो, या दो तरह से वीडियो / दो तरह से ऑडियो हो सकता है। यह एक टीवी कैमरे द्वारा कब्जा किया जा सकता है कि कुछ भी प्रदर्शित कर सकते हैं। इसमें लाभ चलती छवियों को प्रदर्शित करने की क्षमता है। दो तरह ऑडियो / वीडियो सिस्टम में, एक आम आवेदन का सामना करने वाली चेहरा बैठकों और कक्षाओं में जैसा दिखता है और दूरस्थ स्थलों पर प्रतिभागियों के चेहरे का भाव और शारीरिक आचरण देखने के लिए सक्षम बनाता है कि एक सामाजिक उपस्थिति बनाता है जो लोगों को दिखाने के लिए है। ग्राफिक्स समझ बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग साइटों की एक संख्या को पढ़ाने वाले एक शिक्षक का उपयोग करने के लिए एक कारगर तरीका है। यह प्रत्येक साइट में नामांकित छात्रों की एक छोटी संख्या हो सकता है जो कक्षाओं के लिए प्रभावी बहुत लागत है। कई मामलों में, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, क्योंकि एक असामान्य विषय क्षेत्र में एक शिक्षक उपलब्ध कराने की लागत से अन्यथा समर्थित नहीं किया जा सकता है जो संस्था या कम होने के कारण नामांकन या करने के लिए रद्द कर दिया जाएगा जो पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने के लिए संस्थानों के एक समूह के लिए सक्षम बनाता है।
आडियो ग्राफिक टेली कान्फ्रेंसिंग (Audio graphic Tele Conferencing)-
इस तरह के संचार आवाज के लिए एक सहायक के रूप में ग्राफिक्स, अल्फा-अंकीय, दस्तावेजों, और वीडियो चित्र के रूप में दृश्य सूचना प्रेषित करने नैरोबैंड दूरसंचार चैनलों का उपयोग करता। अन्य नियम डेस्क टॉप कंप्यूटर कॉन्फ्रेंसिंग और बढ़ाया ऑडियो हैं। उपकरणों इलेक्ट्रॉनिक गोलियाँ / बोर्डों, फ्रीज फ्रेम वीडियो टर्मिनलों, एकीकृत ग्राफिक्स प्रणाली (पर्सनल कंप्यूटर के हिस्से के रूप में), फैक्स, रिमोट एक्सेस सूक्ष्मिका और स्लाइड प्रोजेक्टर, ऑप्टिकल ग्राफिक स्कैनर, और आवाज / डाटा टर्मिनलों में शामिल हैं। Audio graphics टेली कान्फ्रेंसिंग का आयोजन दूरस्थ शिक्षा के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
3.         कंप्यूटर कान्फ्रेंस (Computer Tele Conferencing)-
कंप्यूटर कान्फ्रेंसिंग में लोग अलग-अलग स्थानों अपर बैठे व्यक्ति कंप्यूटर को प्रयोग में लाकर सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। दो या दो से अधिक कंप्यूटर और मोडेम कनेक्ट करने के लिए टेलीफोन लाइनों का उपयोग किया जाता है। एक कंप्यूटर पर भी किया जा सकता है और लाइनों पर भेजा जा सकता है। यह तुल्यकालिक या अतुल्यकालिक हो सकता है। एक अतुल्यकालिक विधा का एक उदाहरण इलेक्ट्रॉनिक मेल है। इलेक्ट्रॉनिक मेल (ई-मेल) का उपयोग करना, ज्ञापन, रिपोर्ट, अपडेट, न्यूज़लेटर लोकल एरिया नेटवर्क (लैन) या वाइड एरिया नेटवर्क (वैन) पर किसी को भी भेजा जा सकता है। सामान्य रूप से मुद्रित और फिर प्रतिकृति द्वारा भेजा जाता है जो कंप्यूटर पर उत्पन्न आइटम सूचना ई-मेल द्वारा भेजा जा सकता है।
कंप्यूटर के माध्यम से, शिक्षकों, छात्रों और प्रशासकों के लिए आसान एक दूसरे के लिए उपयोग के साथ ही पुस्तकालयों के माध्यम से प्रदान डेटाबेस संसाधनों का उपयोग किया है। पुस्तकालयों और विशेष संसाधनों की शैक्षिक संसाधनों ऐसे ओसीएलसी, एरिक, और इंटरनेट के रूप में पहुँचा जा सकता है। व्यवस्थापकों, छात्र फ़ाइलों का उपयोग ऐसे जिले या प्रणाली कार्यालयों, सरकारी एजेंसियों के रूप में केंद्रीय खजाने से संस्थागत जानकारी प्राप्त करें, या एक दूसरे के साथ संवाद कर सकते हैं। अन्य संसाधन ऐसे राज्य या संघीय कानून पर अद्यतन के रूप में बनाया जा सकता है।
4.         मोबाइल कान्फ्रेंसिंग (Mobile Tele Conferencing)-
मोबाइल कान्फ्रेंसिंग आज शहर उयर गाँवों के बीच की दूरी को कम कर दिया है। मोबाइल धारक को आज गाँव और शहर में मोबाइल कांफ्रेंसिंग करते हुए देखा जा सकता है। व्यवसाय के क्षेत्र में बहुत तेजी के साथ इसका प्रयोग किया जा रहा है।  मोबाइल कान्फ्रेंसिंग में एक साथ तीन-चार लोगों से बात किया जा सकता है। आज कल मोबाइल कान्फ्रेंस पर ही एक साथ कई मित्रों और नाते-रिश्तेदारों को बात करते हुए देखा गया है। आज यह सरल और उपयुक्त संसाधन बन चुका है। इसकी सबसे बड़ी विषेशता यह है कि कहीं भी और किसी समय चाहे दिन हो या रात इसके माध्यम से हम कान्फ्रेंसिंग करते हैं। 
टेली कान्फ्रेंसिंग के उपयोग
यह बहुत ही अतुल्यकालिक हैं जो एक ही समय में व्यक्तियों के लिए सुविधाजनक समय पर एक संदेश भेजने या प्राप्त करता हैं। यह एक चर को समय पर काबू पाने और उसे प्रभावित करने के लिए संचार के रूप में किया जाता है। यह तकनीक वीडियो, डेटा और आवाज वितरण प्रणाली और यात्रा में लगने वाले समय और धन को कम कर देता है। सामग्री एक रिकार्डेड वीडियो या डिस्क में ले लिया जाता है समय को बचाया जाता है। रिकार्डेड सामग्री को किसी भी समय और कहीं पर भी प्रयोग में लाया जा सकता है। इसे और अधिक संवादात्मक प्रौद्योगिकियों के रूप में एक स्वतंत्र शिक्षार्थी होने के मूल्य में वृद्धि होगी। यह तकनीक अनुसंधान के नई प्रौद्योगिकियों को सीखने के रूप में प्रभावी होता है। इससे बड़े समूहों तक एक ही जानकारी देने में प्रभावी होता है।
टेली कान्फ्रेंसिंग के लाभ
1.      समय की बचत होती है।
2.      कम लागत लगती है।
3.      एकता स्थापित करता है।
4.    इंटरएक्टिव मीडियम है।
टेलीकांफ्रेंसिंग की विशेषताएँ

1.      परस्पर क्रियाशील सम्प्रेषण-टेलीकांफ्रेंसिंग दो या दो से अधिक लोगों में परस्पर क्रियाशील सामूहिक सम्प्रेषण है।अनुभवों का आदान-प्रदान और दूरवर्ती शिक्षा का टेलीकांफ्रेंसिंग महत्वपूर्ण और उपयोगी अंग है।
2.      इलेक्ट्रॉनिक साधन-  टेलीकांफ्रेंसिंग एक इलेक्ट्रॉनिक साधन है।जो एक विषय पर चर्चा करने के लिए दो या दो से अधिक भिन्न-भिन्न स्थानों पर स्थित दो या दो से अधिक व्यक्तियों को एक साथ मिला सकता है।
3.      भिन्न-भिन्न स्थान-टेलीकांफ्रेंसिंग दो या दो से अधिक स्थानों पर दो या दो से अधिक लोगों के बीच परस्पर क्रिया है।
4.      दूरवर्ती शिक्षा के लिए माध्यम - शेक्षिक टेलीकांफ्रेंसिंग दूरवर्ती शिक्षा के लिए विशेष रूप से उपयोगी माध्यम हो सकता है।