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बुधवार, 8 नवंबर 2017

जनसंपर्क एवं विज्ञापन की आचार संहिता

जनसंपर्क एवं विज्ञापन की आचार संहिता
लेखक- डॉ. रामशंकर
            किसी भी लोकतंत्र में जनसंपर्क को उसकी सफलता की धुरी माना जाता है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में जनसंपर्क के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है क्योंकि लोकतंत्र में पग-पग पर जन स्वीकृति नितांत आवश्यक होती है। आज जनसंपर्क विधा कला एवं सामाजिक विज्ञान के मिले जुले रूप से
अपना एक नया स्वरूप निर्मित कर रही है, जो सूचना तथा संप्रेषण पर आधारित है। सामान्य संदर्भ में हम कह सकते हैं कि मानव अपने संपर्क की कला द्वारा जनसंपर्क की संगठन या संस्था के लिए सार्वजनिक अनुकूलता प्राप्त करने का एक आधुनिकतम विज्ञान है जिसमें संप्रेषण के विभिन्न माध्यमों का प्रयोग किया जाता है। वर्तमान में जनसंपर्क एक ऐसी प्रबंधकीय और प्रशासकीय प्रक्रिया है जो जनता के हितों को दृष्टिगत रखती है। जनसंपर्क जनता में सामाजिक, राजनैतिक बुराइयों की विरोध की मानसिकता को तैयार कर उन बुराइयों के विरुद्ध जब जनमत का निर्माण करता है तो उसमें जनपक्ष के हितों की प्रबलता होती है। उदाहरणार्थ, जघन्य बीमारियों के विरुद्ध, दहेज के विरुद्ध, महिला उत्पीड़न के विरुद्ध तथा अन्य बुराइयों के विरुद्ध जनता में समझ विकसित करने के लिए समय समय पर अनेक जनसंपर्कीय कार्यक्रम चलाये जाते हैं।
             “जन-संपर्क का मूल उद्देश्य है- अपेक्षित दिशा में जनमत का निर्माण।”1 आजादी से पूर्व स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में सुव्यवस्थित प्रयास के रूप में जनसंपर्क ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। महात्मा गांधी तथा अन्य नेताओं ने जनसंपर्क के माध्यम से ही भारतीय जनमानस में संघर्षमयी राष्ट्रीय चेतना का संचार कर आजादी के मार्ग को आगे बढ़ाया। गांधी जी की दांडी यात्रा जनसंपर्क का एक विशिष्ट रूप है।
            जनसंपर्क का लक्ष्य, नीति और कार्य से जनता को सूचित व जागृत करना तथा उसके विचारों और भावनाओं को प्रेरित व शिक्षित कर अपने पक्ष में एक आम समझ व जनमत का निर्माण करना होता है। आज किसी भी संस्था की साख बनाने के लिए जनसंपर्क एक आवश्यक अंग माना जाता है। सरकारों के अलावा निजी संस्थाएं भी जनसंपर्क के माध्यम से अपनी साख बनाने का कार्य करती है। जनसंपर्क को संक्षेप में ऐसा कार्य कहा जाता है, जिसे जनता द्वारा सराहा जाए। जनसंपर्क का पहला तत्व है अच्छा प्रदर्शन। किसी संगठन या किसी संस्था का जनता के साथ जो संबंध बनता है, उससे जनसंपर्क बढ़ता है।
            जनसंपर्क के लिए लोक-संपर्क शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। जन अथवा लोक तथा संपर्क, दो शब्दों से मिलकर बना यह शब्द जनता से संपर्क को प्रतिबिम्बित करता है। जनसंवाद भी इसी अर्थ का द्योतक है जिसमें आपस में साम्य की स्थिति उत्पन्न कर संवाद (बातचीत) किया जाता है। “जनसंपर्क को अंग्रेजी में पब्लिक रिलेशन अर्थात जनता से संबंध। इसे संक्षिप्त में पी आर कहते हैं। पी का तात्पर्य परफ़ार्मेंस (Performance) तथा आर रिकगनिशन (Recognition) या स्वीकृत से लिया जाता है।”2
            जनसंपर्क में जन शब्द का अर्थ जनता से है जिसका सामान्य अर्थ मानव समूह से लिया जाता है। जनता का अंग्रेजी शब्द Public है। Public शब्द लैटिन भाषा के Publicus शब्द से बना है जिसका सामान्य अर्थ जन समूह होता है। जनता की एकता एक स्थान पर एकत्र होने से नहीं बल्कि समान विचारों के आपस में सामंजस्य से होती है। जनता को और अधिक स्पष्ट करते हुये विचारक डेविस कहते हैं कि “जनता एक विचारशील तथा भावात्मक समूह है।”3 जो लोग एक विषय या समस्या पर समान विचार रखते हैं, वे जनता हैं।  दूसरा शब्द संपर्क है जिसका सामान्य अर्थ किसी एक का किसी दूसरे के साथ दैहिक या मानसिक स्पर्श संबंध उपस्थित होना अर्थात परस्पर संबंध भाव स्थापित होना ही संपर्क है।
            सामान्य अर्थ में जनसंपर्क, जनता से संपर्क है। जनसंपर्क द्विपक्षीय संप्रेषण है, जिसमें सहमति के आधार पर सत्य व ज्ञान पर आधारित सम्पूर्ण सूचनाएँ उपलब्ध कराकर आपसी सौहार्द संबंध निर्मित किए जाते हैं। जनसंपर्क के अंतर्गत विवेकयुक्त योजनाबद्ध सतत प्रयास से ज्ञानवर्धक व उपयोगी सूचनाओं द्वारा किसी व्यक्ति, संगठन व संस्थान का दूसरे व्यक्तियों, विशिष्ट जनता या समुदाय के साथ परस्पर घनिष्ठ संबंध स्थापित किया जाता है। जनसंपर्क के विशेषज्ञ एडवर्ड एल. बर्नेज ने जनसंपर्क के संदर्भ में कहा है कि “सूचना के आधार पर जनता तथा किसी संस्थान के व्यवहार एवं क्रिया को निश्चित लक्ष्य की ओर परिवर्तित करने की प्रक्रिया जनसंपर्क है, जिसमें संस्थान और जनता दोनों की सहभागिता महत्त्वपूर्ण होती है।”4  सामान्यतः समाज द्वारा अपनाए गए द्विपक्षीय प्रयास को आधार मानकर वर्तमान का निर्माण करना ही जनसंपर्क कहा जा सकता है।
            उपरोक्त विचारकों एवं विश्लेषकों के कथन एवं शब्दों के उदघटन के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि जनसंपर्क एक सतत चलने वाली योजनाबद्ध प्रक्रिया है। जनसंपर्क के अंतर्गत निरंतर प्रयास के द्वारा संगठन एवं जनता के बीच परस्पर सहमति बनाए रखी जाती है। जब कोई जनता, संगठन या संस्था के योजनाबद्ध प्रयास द्वारा जनसंपर्क के माध्यम से जनता के लिए के लिए सही सूचना और तथ्य जुटाकर अपने अनुकूल वातावरण का निर्माण करती है तो  संस्था व संगठन के छवि निर्माण होने पर भी जनसंपर्क की भूमिका समाप्त नहीं हो जाती बल्कि वांछित छवि को बनाए रखने के कुछ समय के लिए या दीर्घ अवधि तक निरंतर प्रयत्नशील व सक्रिय रहना पड़ता है।
जनसंपर्क आचार संहिता
            सामाजिक संदर्भ में प्रत्येक कार्य हेतु समाज के द्वारा निर्धारित एक नियम प्रक्रिया का पालन करना होता है ताकि व्यवस्थ को सुचार रूप से क्रियान्वित किया जा सके। आचार-संहिता के अनुरूप रहकर एक अच्छे समाज की संकल्पना की जा सकती है। जनसम्पर्क व्यवसाय की भी अपनी एक आधारभूत आचार संहिता है जिसको प्रत्येक जनसंपर्क कर्मी द्वारा स्वीकारा जाता है। विभिन्न देशों की जनसंपर्क की परिषदें हैं जिसमें भारत भी शामिल है एक अंतर्राष्ट्रीय जनसंपर्क नीति का अनुसरण कर रहीं हैं। एसे कोड ऑफ एथेंस के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि वर्ष 1965 में अंतर्राष्ट्रीय जनसंपर्क सम्मेलन एथेंस में हुआ था, उस सम्मेलन में आचार संहिता संबंधी विषय पर विमर्श किया आचार संहिता बनाई गयी थी।
जनसंपर्क की अंतर्राष्ट्रीय आचार संहिता
            संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य देश इस बात पर सहमत हैं और विश्वास प्रगत करते हैं कि सभी देशों के  प्रतिष्ठान या संस्था के सभी सदस्य जनसंपर्क की आचार संहिता का पालन करेंगे। जनसंपर्क कार्यकर्ताओं को दिशा निर्देश देने वाले सरकारी गज़ट में प्रकाशित जनसंपर्क नियमावली डॉ. कुमुद शर्मा की पुस्तक जनसंपर्क प्रबंधन से यहां उद्घटित किया गया है-
जनसंपर्क व्यवसायकर्ता और प्रेस अधिकारी की परिभाषा5
            सूचना मंत्रालय के अधिकारों से संबद्ध मूल आज्ञा-पत्र नं. 65-1523, दिनांक 19 दिसंबर, 1962 ई. संशोधित आज्ञा-पत्र नं. 61-898, 26 अगस्त, 1964 ई. के अनुसार-
धारा एक : जनसंपर्ककर्ता, चाहे वह किसी संगठन या संस्था से संबंधित है अथवा स्वतंत्र रूप से व्यवसाय करता है, उसका कर्तव्य है कि वह अपनी संस्था या संगठन को,जिसके सेवार्थ वह नियुक्त है उसे जनता से सह-अभिमति और आपसी विश्वास के आधार पर संपर्क स्थापित करने में परामर्श दे और उसे कार्यान्वित करे। वह जनता को संगठन की उपलब्धियों और कार्यों से भलीभांति परिचित रखे।
इन कर्तव्यों का विस्तार करके इनमें संगठन और कर्मचारियों के मध्य आपसी सम्बन्धों को भी सम्मिलित किया जाय। जनसंपर्ककर्ता संगठन की नीतियों को लागू करके उनके परिणामों की जांच का भी जिम्मेदार है।
संगठन के बारे में वह जो भी सूचना दे, उसका स्रोत स्पष्ट हो और यह सूचना तथ्यात्मक एवं बिना किसी व्यावसायिक प्रचार, प्रोपेगेंडा और विज्ञापन सामग्री के ही हो।
धारा दो : प्रेस अधिकारी उपर्युक्त कर्तव्यों का पालन प्रेस, रेडियो, फिल्म और टेलीविज़न के माध्यमों से संपर्क विशेषज्ञ के रूप में करेगा।
धारा तीन : जनसंपर्क कर्ता और प्रेस अधिकारी के कार्य का व्यावहारिक रूप एक एक कार्यरत पत्रकार (प्रोफेशनल जर्नलिस्ट) और विज्ञापन एजेंट से भिन्न है।
धारा चार : प्रेस और जनसंपर्क के कार्य का पारिश्रमिक वह ग्राहक या संगठन देगा जिसके लिए यह कार्य किया जाएगा।
धारा पाँच : यह रेगुलेशन जनरल ऑफ़िशियल द लॉ रिपब्लिक फ्रांस में प्रकाशित किया जाएगा।  
अंतर्राष्ट्रीय जनसंपर्क संस्था की आचार- संहिता के अनुसार जनसंपर्क संस्थाओं का प्रत्येक सदस्य निम्न अर्थों में आचार संहिता के आदेशों का पालन करेगा-
1.      मानव के समग्र विकास में सहयोग करेगा।
2.      उसका प्रयत्न होगा कि वह ऐसी संचार व्यवस्था कायम करे जो सही व तथ्यपरक सूचनाओं का निर्बाध प्रवाह प्रत्येक सदस्य तक पहुंचा सके।
3.      वह अपने व्यवसाय और जनता के बीच संतुलित संबंध बनाए रखने की दिशा में प्रयत्नशील रहेगा।
4.      मानवअधिकारों के मौलिक घोषणापत्र का सम्मान करते हुये वह कार्यक्रमों को कार्यान्वित करेगा।
5.      प्रत्येक मनुष्य की गरिमा और उसके अधिकार का पूर्ण आदर करेगा।
6.      मनुष्य की नैतिक, मनोवैज्ञानिक और बौद्धिक प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करेगा, ताकि वे विचार विमर्श प्रक्रिया में भागीदारी निभा सकें।
जनसंपर्क की अंतरराष्ट्रीय आचार संहिता में प्रमुख वर्जनाएं
1.      असत्य वर्जित है। ऐसे तथ्यों को नहीं प्रसारित किया जाएगा जिनकी पुष्टि न हो सके।
2.      किसी ऐसे कम में सहयोग देना वर्जित है जिसका संबंध अनैतिकता या हेरा-फेरी से हो।
3.      ऐसे असाधारण साधनों अथवा तकनीक का प्रयोग वर्जित है जो मानवीय प्रवित्तियों को इस प्रकार उकसाये कि मनुष्य स्वयं पर नियंत्रण न रह सके।
            21 अप्रैल, 1968 को अखिल भारतीय जनसंपर्क की पहली बैठक नई दिल्ली में आयोजित हुई। सम्मेलन में आचार संहिता के उपरोक्त सभी महत्त्वपूर्ण बिंदुओं पर सभी सदस्यों से अपेक्षा की गयी हैं।
अंतरराष्ट्रीय जनसंपर्क संघ6  ने भी एक नियमावली तैयार की है, जिसके अनुसार –
1.      जनसंपर्ककर्ता को अपने ग्राहकों, नियोक्ता और उससे संबंधित लोगों के साथ स्पष्टता व ईमानदारी से पेश आना चाहिए।
2.      जनसंपर्ककर्ता को जनहित अथवा जन-रुचि को ध्यान में रखते हुये अपने कार्य विशेष से जुड़ी गतिविधियों को आगे बढ़ाना चाहिए।
3.      कंपनी का जनसंपर्क किसी भी ऐसी गतिविधि में शामिल जिससे कंपनी और जनता के मध्य जनसंचार के माध्यमों को लेकर किसी तरह का तनाव उत्पन्न हो।
4.      जनसंपर्ककर्ता संस्थान या संथा का उपयोग घोषित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही करेगा।
5.      कंपनी से विवाद के क्षणों के बाद किसी भी ऐसे समाचार या तथ्य का प्रसारण नहीं करेगा जिसको कंपनी गुप्त रखना चाहती है।
6.      जनसंपर्ककर्ता किसी भी विभागीय सदस्य को व्यापार के प्रति आकर्षित करने के लिए विज्ञापन या गलत अनुमति नहीं देगा। सदस्य को किसी अन्य संस्था या संगठन से सम्बद्ध नहीं होना चाहिए जिसकी संस्था से कोई संबंध न हो।
            जनसंपर्क के क्षेत्र में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक आचार संहिताएँ बनीं हैं जिसके मूलतः लगभग एक जैसे दिशा निर्देश दिये गए हो। जनसंपर्क और मीडिया में जहां कई जगह इन आचार- संहिताओं का पालन हो रहा है तो कहीं धड़ल्ले से इसका उल्लंघन भी हो रहा है। आज आवश्यकता है कि जनसंपर्क और पत्रकारिता के क्षेत्र में आचार-संहिता का निष्ठापूर्वक पालन करते हुये व्यावसायिक और सामाजिक दयितत्व का निर्वहन किया जाए तभी आचार-संहिता की उपयोगिता सिद्ध हो पाएगी।
विज्ञापन संबधित कानून
विकसित एवं प्रोत्साहित करने के लिए आचार के निम्नलिखित मानक निर्धारित किए जाते हैं। इन नियमों के अनुपालन की जिम्मेदारी विज्ञापनकर्ता और विज्ञापन एजेंसी दोनों की समान रूप से है । उन सभी से, जो विज्ञापन कार्य में लगे हुए हैं, यह जोरदार सिफारिश की जाती है कि वे देश में विज्ञापनों पर प्रभाव डालने वाले विधानसे औरविशेष रूप से निम्नलिखित अधिनियमों और उनके अधीन बनाए गए नियमों की अच्छी प्रकार से जानकारी प्राप्त कर लें:-
औषधि और प्रसाधन अधिनियम,1940
औषधि नियंत्रण अधिनियम, 1950
औषधि और चमत्कारिक उपचार (आक्षेपणीय विज्ञापन) अधिनियम,1954प्रतिलिप्याधिकार अधिनियम,1957
व्यापार और पण्य वस्तु चिन्ह अधिनियम, 1958
खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954
 पुरस्कार प्रतियोगिता अधिनियम, 1955
संप्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोग निवारण) अधिनियम, 1950
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986
महिला अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986


विज्ञापन में आचार-संहिता के सामान्य नियम
विज्ञापन इस तरह डिजाइन किया जाना चाहिए कि वह देश की विधि केअनुरूप हो और लोगों की नैतिकता, शालीनता और धार्मिकभावनाओं पर आक्षेप न करता हो ।किसी भी ऐसे विज्ञापन के लिए अनुमति नही दी जाएगी जो
        I.            किसी प्रजाति, जाति, रंग, धर्म और राष्ट्रीयता का उपहास करता हो ।
     II.            भारत के संविधान के किसी निर्देशक सिद्धांत किसी अन्य उपबंध के विरुद्ध हो ।
   III.            लोगों को अपराध की ओर बढ़ावा देता है या अशान्ति, हिंसा या कानून भंगकरने को बढ़ावा देता है अथवा किसी भी प्रकार से हिंसा या अश्लीलता को महिमामंडित करता है;
  IV.            आपराधिक भावना को वांछनीय बतलाता है;
    V.             विदेशी राज्यों के साथ् मैत्रीपूर्ण संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है;
  VI.            राष्ट्रीय प्रतीक या संविधान के किसी भाग या किसी व्यक्ति या किसी राष्ट्रीय नेता या राज्य के उच्चाधिकारी के व्यक्तित्व का अनुचित लाभ उठाता हो;
VII.            सिगरेट और तम्बाकू उत्पादों, मदिरा, शराब और अन्य मादक पदार्थों के बारे में है या उन्हें बढ़ावा देता है;
VIII.            महिलाओं के चित्रण में सभी नागरिकों की स्थिति एवं अवसर की समानता तथा व्यक्तिगत मान मर्यादा की संवैधानिक गारंटी काउल्लंघन करता है । विशेषकर, किसी भी ऐसे विज्ञापन की अनुमति नहीं दी जाएगी जिसमें महिलाओं की अपमानजनक छविप्रस्तुत की गई हो । महिलाओं का चित्रांकन इस ढंग से कदापि नहीं किया जाना चाहिए जो निष्क्रियता एवं दब्बु स्वभाव पर बल देता हो और परिवार एवं समाज में उनकी अधीनस्थ और गौण भूमिका को प्रोत्साहित करता हो ।  
     संदर्भ ग्रंथ-

1.      राय,अ.कु. संचार के सात सोपान (2006). नई दिल्ली : यूनिवर्सिटी प्रकाशन नई दिल्ली. पृष्ठ संख्या-371
2.      कुमार, अमित जनसंपर्क (2006). नईदिल्ली : डायमंड पॉकेट बुक्स(प्रा.) लि X-30, ओखला मार्ग इंडस्ट्रियल एरिया, फेज-2,पृष्ठ संख्या -8
3.      मिश्र, शिवगोपाल  जनरल नॉलेज एनसाइक्लोपीडिया (2008). नई दिल्ली : प्रभात प्रकाशन, आसफ आली रोड़, पृष्ठ संख्या-124
4.      शर्मा, कुमुद जनसंपर्क प्रबंधन (2006). दिल्ली : ज्ञान गंगा, 205-सी चावडी बाज़ार, पृष्ठ संख्या -14 
5.      वही, पृष्ठ संख्या -187-188
6.      वही, पृष्ठ संख्या- 194

7.      डॉ. तिवारी अर्जुन, आधुनिक विज्ञापन कला एवं व्यवहार विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक वाराणसी   

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